दिल्ली के बंग भवन में 22 मई को बागी TMC विधायक ऋतब्रत बनर्जी और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के बीच हुई एक इत्तेफाकन मुलाकात से जो सिलसिला शुरू हुआ था वह बुधवार को तब खत्म हुआ जब 58 विधायकों के गुट ने पार्टी पर अपना नियंत्रण जमा लिया. ऋतब्रत नेता चुने गए और विधानसभा अध्यक्ष से मान्यता भी हासिल कर ली.
टीएमसी में बगावत के बीज काफी पहले पड़ चुके थे.
4 मई को विधानसभा चुनावों में BJP के हाथों मिली हार के तुरंत बाद पार्टी के कुछ हिस्सों में बेचैनी उभरने लगी. कुछ विधायकों को ऐसा लगा कि पार्टी प्रमुख के भतीजे अभिषेक बनर्जी के हाथों में सत्ता का ज़्यादा से ज़्यादा केंद्रीकरण होता जा रहा है.
जब ममता ने विधायकों से कहा- अभिषेक की तारीफ की जानी चाहिए
6 मई को नए चुने गए विधायकों की बैठक हुई. पीटीआई के अनुसार इस बैठक में ममता बनर्जी ने कथित तौर पर नए चुने गए विधायकों से अभिषेक की वाहवाही करने को कहा. हालांकि इसका मकसद उनके योगदान को पहचान देना था, लेकिन इस कदम से विधायकों के एक तबके में फुसफुसाहट शुरू हो गई, उन्हें लगा कि पार्टी अब ज़्यादा से ज़्यादा एक ही परिवार के इर्द-गिर्द घूम रही है.
बगावत का पहला संकेत
विरोध के पहले सार्वजनिक संकेत 19 मई को सामने आए. एक अन्य बैठक में ऋतब्रत बनर्जी और एंटाली के विधायक संदीपान साहा ने सवाल उठाया कि फाल्टा के विधायक जहांगीर खान को चुनाव से अपनी उम्मीदवारी वापस लेने की सार्वजनिक घोषणा के बावजूद पार्टी से क्यों नहीं निकाला गया? चूंकि जहांगीर को अभिषेक का करीबी माना जाता था, इसलिए इस आलोचना को व्यापक रूप से TMC के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के लिए एक सीधी चुनौती के तौर पर देखा गया.
वरिष्ठ विधायक कुणाल घोष ने भी इसी तरह की चिंताएं ज़ाहिर कीं, हालांकि बाद में उन्होंने खुद को बागी खेमे से अलग कर लिया.
बंग भवन में शुभेंदु-ऋतब्रत की मुलाकात
तेजी से बदलते घटनाक्रम में तीन दिन बाद एक अहम मोड़ तब आया. जब 22 मई को ऋतब्रत दिल्ली में थे. वे राज्यसभा में अपना कार्यकाल खत्म होने के बाद की औपचारिकताएं पूरी करने के लिए राजधानी में थे.
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दोपहर के भोजन के लिए वे 'बंग भवन' गए. वहां उनकी मुलाक़ात मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी से हो गई.
इस मुलाकात ने टीएमसी में बंटवारे की स्टोरी लिख दी.
इसके बाद ऋतब्रत ने सार्वजनिक रूप से अधिकारी के उस फ़ैसले का स्वागत किया, जिसमें उन्होंने विपक्षी विधायकों और सांसदों को प्रशासनिक समीक्षा बैठकों में आमंत्रित किया था; उन्होंने इस कदम को एक स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा बताया. इन टिप्पणियों ने राजनीतिक गलियारों में तुरंत सबका ध्यान खींचा.
25 मई का नया विवाद
तीन दिन और गुजरे और TMC एक और विवाद में घिर गई. 25 मई को ऐसे आरोप सामने आए कि विधायी दल की लीडरशिप स्ट्रक्चर के संबंध में स्पीकर को सौंपे गए दस्तावेज़ों पर कई विधायकों के हस्ताक्षर जाली थे.
इस विवाद ने 27 मई को एक कानूनी रूप ले लिया, जब ऋतब्रत और संदीपन ने स्पीकर से औपचारिक रूप से शिकायत की और जालसाजी का आरोप लगाया. इसके बाद विधानसभा सचिवालय ने पुलिस से संपर्क किया और CID की जांच शुरू हो गई.
31 मई तक टीएमसी की केंद्रीय सत्ता की कमजोरी दिखने लगी. ममता बनर्जी ने अपने कालीघाट आवास पर नए चुने गए विधायकों की एक बैठक बुलाई थी, जिसमें कथित तौर पर बहुत कम विधायक आए. इससे पार्टी नेतृत्व को वह एकता दिखाने का मौका नहीं मिला जिसकी उन्हें उम्मीद थी.
असली टूट 1 जून को हुई. CM शुभेंदु अधिकारी ने जब सार्वजनिक रूप से यह बताया कि ऋतब्रत और संदीपन साहा की शिकायतों के आधार पर CID जांच शुरू की गई है, तो उसके कुछ ही घंटों बाद TMC ने इन दोनों नेताओं को पार्टी से निकाल दिया.
इस कदम से संकट थमने के बजाय विद्रोह और तेज हो गया.
पार्टी से निकाले गए नेताओं ने अभिषेक बनर्जी पर अपने हमले और तेज कर दिए और उन पर संगठन के भीतर सारी सत्ता अपने हाथों में लेने का आरोप लगाया. विद्रोही गुटों के बीच इस अभियान को जल्द ही एक नाम मिल गया "ऑपरेशन क्राउन प्रिंस."
भले ही पार्टी ने 2 जून को स्पीकर को विधायक दल के नेतृत्व के बारे में नए संदेश भेजकर स्थिति पर फिर से काबू पाने की कोशिश की, लेकिन बागियों के पक्ष में समर्थन बढ़ता ही गया.
आखिरी नतीजा बुधवार 3 जून को सामने आया. 58 विधायकों के एक समूह ने स्पीकर को एक पत्र सौंपा जिसमें ऋतब्रत बनर्जी को विधायक दल का नेता चुना गया था और एक नई नेतृत्व टीम का नाम प्रस्तावित किया गया था.
स्पीकर ने इस दावे को मान लिया और इस तरह बागी गुट को TMC के आधिकारिक विधायक दल के रूप में मान्यता दे दी.
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