बंगाल में सत्ता बदलाव के 30 दिन... ममता खेमे में बिखराव से शुभेंदु के फैसलों तक की कहानी
पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के एक महीने पूरे हो गए हैं. चुनाव नतीजे आने के बाद से तृणमूल कांग्रेस के भीतर सियासी संकट गहरा गया है और ममता बनर्जी के हाथों से पार्टी निकलती जा रही है. वहीं, पहली बार सत्ता में आई बीजेपी ने शुभेंदु अधिकारी को सीएम बनाकर तबड़तोड़ फैसले ले रही है.
पश्चिम बंगाल में मई 2026 में हुए ऐतिहासिक चुनावी उलटफेर और सत्ता परिवर्तन को 30 दिन पूरे हो चुके हैं. 15 साल की ममता बनर्जी सरकार के पतन और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में राज्य की पहली भाजपा सरकार के गठन ने बंगाल की राजनीति की दिशा पूरी तरह बदल दी है.
बंगाल चुनाव के 4 मई को आए नतीजे से लेकर 4 जून तक. इन 30 दिनों में जहां एक तरफ टीएमसी बगावत और बिखराव के सबसे गहरे दौर से गुजर रही है, वहीं दूसरी तरफ शुभेंदु सरकार ताबड़तोड़ फैसले ले रही है.
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ममता बनर्जी से सत्ता से बाहर होते और बीजेपी सरकार बनने एक महीने में बंगाल की सियासत कितनी बदल गई. सिलसिलेवार तरीके से देखते हैं कि 4 मई को बंगाल के विधानसभा चुनाव के नतीजे से सुभेंदु सरकार तक क्या-क्या बंगाल में हुआ?
आज से ठीक एक महीने पहले पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक तूफान आया. बीजेपी ने डेढ़ दशक तक सत्ता में रही टीएमसी को चुनावी हार का सामना करना पड़ा. ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी को सिर्फ 80 सीटें मिलीं जबकि बीजेपी ने 207 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया.
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को उनके अपने गढ़ भवानीपुर सीट पर भाजपा के शुभेंदु अधिकारी के हाथों 15 हजार से अधिक वोटों से करारी शिकस्त झेलनी पड़ी.
संदेशखाली आंदोलन का चेहरा रहीं भाजपा उम्मीदवार रेखा पात्रा ने हिंगलगंज सीट से बड़ी जीत दर्ज की, जिसने टीएमसी की चुनावी जमीन हिला दी.
बंगाल चुनावी हार बाद भी ममता बनर्जी ने राज्यपाल को अपना इस्तीफा नहीं सौंपा था. ऐसे में गवर्नर ने विधानसभा भंग कर दी, जिसके चलते 15 साल लंबे टीएमसी शासन का अंत हो गया.
विधानसभा चुनाव हार के अगले ही दिन 5 मई को टीएमसी के वरिष्ठ नेताओं ने अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली और रणनीतियों पर दबे स्वर में सवाल उठाने शुरू कर दिए.
विधानसभा चुनाव हार के बाद, 6 मई को ममता बनर्जी ने कालिघाट में अपने घर के पास वाले दफ्तर में चुनाव जीतने वाले विधायकों को बैठक बुलाई. इसी बैठक में ममता ने सभी को खड़े होकर अभिषेक बनर्जी की भूमिका के सम्मान में तालियां बजाने का निर्देश दिया, यहीं से टीएमसी के खेमे में नाराजगी का गुबार देखने को मिला.
टीएमसी के भीतर पुराने दिग्गजों ने 'टीम अभिषेक' के युवा नेताओं को हार का जिम्मेदार ठहराया, जिसके चलते आंतरिक कलह खुलकर सड़क पर आ गई.
डैमेज कंट्रोल के लिए ममता बनर्जी ने पार्टी की कोर कमेटी की बैठक बुलाई, लेकिन कई बड़े चेहरों ने खराब सेहत का बनाकर बैठक में शामिल नहीं हुए. टीएमसी के कई नवनिर्वाचित विधायकों और पूर्व मंत्रियों ने ममता और अभिषेक से दूरी बनाना शुरू कर दिया. ममता बनर्जी की पहली ही बैठक से करीब 13 विधायक नदारद रहे.
लोकसभा और राज्यसभा में टीएमसी के सांसदों के बीच केंद्रीय नेतृत्व को लेकर अविश्वास बढ़ा, कई सांसदों के पाला बदलने की सुगबुगाहट शुरू हुई. काकोली घोष दस्तीदार उन शुरुआती करीबी नेताओं में थीं, जिन्होंने पार्टी लाइन के खिलाफ आवाज उठाई. इसके बाद सांसद सुखेंदु शेखर रॉय के सुर उठने लगे,
टीएमसी के चुनाव हारने का सबसे पहले साइड इफेक्ट मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर बंगाल में दिखा, जहां पर के कई स्थानीय टीएमसी नेताओं और पार्षदों ने सामूहिक रूप से पार्टी छोड़ दी.
फलता विधानसभा सीट पर दोबारा से चुनाव हो रहे थे, वोटिंग से दो दिन पहले टीएमसी के प्रत्याशी जहांगीर खान ने चुनावी मैदान से अपने कदम पीछे खींच लिए. इसके बाद फालता सीट पर बीजेपी ने एकतरफा जीत दर्ज की और टीएमसी की जमानत जब्त हो गई. बीजेपी के विधायक 208 पर पहुंच गए.
कालिघाट की बैठक में ऋतब्रत बनर्जी और एंटाली के विधायक संदीपन साहा ने अभिषेक बनर्जी के खिलाफ मोर्चा खोला. ऐसे में ममता बनर्जी ने उन्हें टीएमसी से बाहर का रास्ता दिखा दिया.
टीएमसी में हस्ताक्षर विवाद को लेकर विवाद शुरू हुआ. ऐसे में आरोप लगे कि विधानसभा में स्पीकर को भेजे गए दस्तावेजों में फर्जी हस्ताक्षर किए गए थे, जिसमें विपक्ष के नेता को लेकर प्रस्ताव थे. फर्जी हस्ताक्षर के आरोपों को लेकर ऋतब्रत और संदीपन ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखा. इसके आधार पर विधानसभा सचिवालय ने हेयर स्ट्रीट थाने में शिकायत दर्ज कराई.
सोनारपुर दौरे के दौरान अभिषेक बनर्जी पर हमला हुआ. स्थानीय लोगों ने उन्हें घेर लिया और उनके साथ धक्का-मुक्की की गई. उन पर अंडे और पत्थर फेंके गए. उनकी शर्ट और कलाई में पहना फिटनेस बैंड भी टूट गया. अभिषेक बनर्जी पर हमले के दूसरे दिन टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी पर भी हमला हो गया.
बगावत की लहर का असर इस दिन ममता के आवास पर साफ दिखा. ममता ने एक बार फिर विजयी विधायकों की बैठक बुलाई थी, लेकिन 80 में से सिर्फ 20 विधायक ही पहुंचे. पर्याप्त संख्या न होने के कारण बैठक रद्द करनी पड़ी.
टीएमसी से निष्कासित होने के बाद ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने टीएमसी विधायकों के साथ संपर्क बढ़ाना शुरू किया. ऐसे में टीएमसी के कुछ विधायक रथिन घोष के घर पर मिले. टीएमसी के 50 विधायक कोलकाता के एक फाइव स्टार होटल ठहरे थे, जहां पर ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा मिले.
टीएमसी के प्रतिनिधि के रूप में दो विधायक कुंतल और असिमा पात्रा विधानसभा पहुंचे और फिर से स्पीकर सचिवालय को पत्र सौंपा, जिस पर अभिषेक के हस्ताक्षर थे. जिसमें दोबारा शौभंदेब को विपक्ष का नेता बनाने, नयना और असिमा को उपनेता और फिरहाद हकीम को चीफ व्हिप बनाने की मांग दोहराई गई. लेकिन स्पीकर सचिवालय ने इस पत्र को औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया.
टीएमसी के विधायक 3 जून सुबह 10 बजे विधानसभा पहुंचे. ऋतब्रत, संदीपन और उनके सहयोगियों ने स्पीकर को 58 सदस्यों के हस्ताक्षर वाला पत्र सौंपा, जिसमें बाकी सदस्यों ने ऋतब्रत को विपक्ष का नेता स्वीकार किया. चार उपनेताओं में जावेद खान, सबीना यास्मीन, संदीपन और शिउली साहा शामिल थे. अखरुज्जमान को चीफ व्हिप बनाया गया. इसके बाद ऋतब्रत, संदीपन और उनका गुट राज्य सचिवालय नबान्ना पहुंचे. इस तरह से टीएमसी दो गुटों में बंट गई.
शुभेंदु अधिकारी की नई सरकार का गठन
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बंगाल की चुनावी जंग जीतने के बाद बाद सुभेंदु अधिकारी बीजेपी विधायक दल के नेता चुने ग. सर्वसम्मति से शुभेंदु अधिकारी को बंगाल भाजपा विधायक दल का नेता चुना गया और उन्होंने सरकार बनाने का दावा पेश किया.
राजभवन में आयोजित भव्य समारोह में शुभेंदु अधिकारी ने पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री के रूप में पद और गोपनीयता की शपथ ली. शुभेंदु के साथ पांच अन्य नेताओं ने मंत्री पद की शपथ ली.
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने अपनी कैबिनेट का विस्तार किया, जिसमें 35 नए मंत्रियों ने शपथ ली. इस करह से अब कुल मंत्रियों की संख्या 41 हो गई है।
भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व तेज गेंदबाज और मैना सीट से भाजपा विधायक अशोक डिंडा को बंगाल कैबिनेट में शामिल कर खेल मंत्रालय की जिम्मेदारी की ओर कदम बढ़ाए गए.
चार घरों में घरेलू सहायिका (रसोइया) का काम करने वाली आउसग्राम की विधायक कलिता मांझी को मंत्री बनाया गया, जो इस सरकार का सबसे चर्चित चेहरा बनीं. टीएमसी से भाजपा में आए कद्दावर नेता अर्जुन सिंह को कैबिनेट मंत्री बनाकर बैरकपुर और जूट मिल बेल्ट को साधने की कोशिश की गई.
शुभेंदु सरकार की नई कैबिनेट में ब्राह्मण, ओबीसी (OBC), आदिवासी, मतुआ और राजबंशी समुदायों को उनकी आबादी के लिहाज से उचित प्रतिनिधित्व दिया गया. इसके अलावा जातीय और क्षेत्रीय समीकरण साधने की कवायद की गई.
सत्ता संभालते ही शुभेंदु सरकार ने प्रशासनिक सर्जरी करते हुए राज्य के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक (DGP) को बदल दिया.
बीजपी कार्यकर्ताओं द्वारा राज्य सचिवालय 'नबन्ना' के बाहर गंगाजल छिड़ककर प्रतीकात्मक शुद्धिकरण किया गया, जो राजनीतिक बदलाव का प्रतीक बना.
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी स्पष्ट किया कि पिछली सरकार द्वारा रोकी गई सभी केंद्रीय योजनाएं अब बंगाल में तत्काल प्रभाव से लागू की जाएंगी.
शुभेंदु सरकार के बड़े और कड़े फैसले
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शुभेंदु सरकार ने कैबिनेट की पहली ही बैठक में पश्चिम बंगाल में केंद्र सरकार की 'आयुष्मान भारत स्वास्थ्य योजना' को पूरी तरह लागू करने की मंजूरी दी गई.
पीएम किसान सम्मान निधि को लागू किया. राज्य के सभी पात्र किसानों को पीएम किसान सम्मान निधि का बकाया और वर्तमान लाभ सीधे बैंक खातों में ट्रांसफर करने का आदेश.
संदेशखाली में महिलाओं के साथ हुए उत्पीड़न और जमीन हड़पने के मामलों की जांच के लिए एक विशेष टास्क फोर्स (STF) का गठन किया गया और मामलों को फास्ट ट्रैक कोर्ट में भेजने का फैसला हुआ.
पश्चिम बंगाल की सीमावर्ती इलाके में बीएसएफ को तारबंदी के लिए जमीन दे दी.
शिक्षा विभाग (SSC) और नगर पालिकाओं में हुए कथित शिक्षक व सरकारी भर्ती घोटालों की फाइलों को री-ओपन कर दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए गए.
ममता सरकार की लोकप्रिय 'लक्ष्मी भंडार' योजना को बंद न करते हुए, उसका नाम बदलकर और राशि को बढ़ाकर सीधे महिलाओं के खातों में भेजने का निरंतरता संबंधी फैसला लिया गया.
सरकारी स्तर पर होने वाले धार्मिक भेदभाव को खत्म करने और बहुसंख्यक व अल्पसंख्यक सभी वर्गों के लिए 'सबका साथ, सबका विकास' नीति के तहत काम करने का शासनादेश.
बंगाल में गाय की कुर्बानी और गौहत्या पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई. शुभेदु सरकार ने कुर्बानी को भी सार्वजनिक जगह पर यानि खुली जगह पर करने के खिलाफ सख्त आदेश दिया.
बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद होने वाली हिंसा को रोकने के लिए गृह मंत्रालय (जो खुद सीएम के पास है) ने उपद्रवियों के खिलाफ सीधे रासुका (NSA) लगाने और कड़े एक्शन का आदेश दिया.
राज्य पर चढ़े भारी कर्ज और खजाने की स्थिति को जनता के सामने लाने के लिए वित्त विभाग को एक विस्तृत 'श्वेत पत्र' जारी करने का निर्देश दिया गया.
बंगाल में दशकों से चल रहे जबरन वसूली (कट-मनी) और निर्माण क्षेत्र में 'सिंडिकेट राज' को खत्म करने के लिए एक नया सख्त कानून लाने का प्रस्ताव कैबिनेट में पास हुआ.
सीबीआई (CBI) और ईडी (ED) को राज्य में जांच करने के लिए पिछली सरकार द्वारा वापस ली गई 'जनरल कंसेंट' (सामान्य सहमति) को शुभेंदु सरकार ने बहाल कर दिया, जिससे अब केंद्रीय एजेंसियां बिना राज्य की अनुमति के भ्रष्टाचार के मामलों की सीधी जांच कर सकेंगी.
कुबूल अहमद