बुंदेलखंड के ज्यादातर हिस्सों में भले ही सरकारी योजनाएं पहुंचने लगी हों, लेकिन महोबा के कबरई नगर पंचायत के कई इलाकों में अभी तक न ही योजना पहुंची और न ही पानी कुछ पहुंचा है. सालों से रोज सुबह आने वाले पानी के टैंकरों का वो इंतजार जो बुंदेलखंड के निवासियों को ये सोचने पर मजबूर करता है कि 'अगले जनम मोहे बुंदेलखंड में जनम न दीजो.'
आजतक मामले को ग्राउंड से समझने लखनऊ से साढ़े 5 घंटे की दूरी पर बसे महोबा के कबरई पहुंचा. सुबह 6 बजे का समय है, कस्बे की महिलाएं अपने अपने घरों के बाहर तमाम बाल्टियां रखे एक ओर नजर किए बैठी हैं, इस इंतजार में कि अब पानी का टैंकर आएगा. लेकिन टैंकर नहीं आता.
आजतक उन महिलाओं से बात करता है तो वो अपना दर्द साझा करती हैं. एक महिला का कहना है कि सालों से यहां पानी नहीं पहुंचा है, योजनाएं सिर्फ कागज पर हैं. इस उम्र में सिर पर बाल्टी रख कर घर के लिए पानी लाने दूर जाना पड़ता है. एक ने कहा कि टैंकर आते ही भीड़ लग जाती है, जिसके चलते कई बार आपस में लड़ाई भी हो जाती है. वो वृद्ध हैं और कई बार वो बाल्टी लेकर जब तक पहुंचती हैं तो पानी खत्म हो जाता है.
भीषण गर्मी के बीच पानी की किल्लत
एक ने बताया कि उन्हें अपने बच्चों से पानी भरवाना पड़ता है. बेटा नवीं कक्षा में है, वो पहले कंधे पर टांग कर भरी बाल्टी लाता है और फिर उसी कंधे पर किताबों से भरा हुआ भारी बसता लेकर स्कूल जाता है. एक तरफ हीटवेव और बढ़ते तापमान के चलते गर्मी की मार, दूसरी तरफ पानी की किल्लत. पूरा उत्तर भारत जिस वक्त गर्मी से कराह रहा है, इन कबरई वासियों के लिए शायद गर्मी से बचने से ज्यादा जरूरी है पानी. कबरई के करीबी आधा दर्जन से ज्यादा मोहल्ले और लगभग 35 हजार की आबादी इस समस्या से परेशान है.
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सूखा कबरई और खाली हैंडपंप
इस कस्बे में एक बात आम है कि यहां किसी घर में नल नहीं लगा है और न ही हैंडपंप. जब पाइपलाइन ही नहीं बिछ पाई हो तो नल क्या ही करे. एक हैंडपंप जरूर लगा है, लेकिन वो भी एक शोपीस है.
जब नहीं मिला पानी, तो लगाया जुगाड़ वाला हैंडपंप
इंसानी अविष्कार अक्सर किसी चीज की कमी के चलते हो जाया करते हैं. कबरई में हालांकि कोई आविष्कार तो नहीं हुआ लेकिन एक जुगाड़ वाले हैंडपंप से अपनी मुसीबतों में कुछ कमी लाने की कोशिश जरूर हुई. इस जुगाड़ वाले हैंडपंप को खिच्छु हैंडपंप कहते है.
कस्बे में लोगों ने बताया कि दिन में आधे से एक घंटे के लिए सप्लाई का पानी आता है और इस बीच अगर बिजली चली जाए तो इस खिच्चू से पानी ये लोग अपनी बाल्टियों में भरने का काम करते हैं. लेकिन ये पूरे कस्बे के सिर्फ दो से चार घरों में मौजूद है. एक घर में अगर खिच्छु चला तो आस पास के कुछ घर भी अपनी बाल्टियों लेकर पहुंच जाते हैं.
(नोट: खिच्छु हैंडपंप' (या खींचने वाला हैंड पंप) एक ऐसा साधारण पंप है जो दबाव के सिद्धांत पर काम करता है. ये बिजली के बिना, मैनुअल तरीके से काम करता है और आमतौर पर गहरे कुओं या बोरवेल से पानी खींचने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.)
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एक 10 साल का लड़का अपनी मां का हाथ बांटने के लिए पढ़ाई और स्कूल जाने की उम्र में आजतक संवाददाता के सामने ही 10 से ज्यादा बाल्टियां भर देता है. मौजूद महिला ने कहा एक हजार रुपये का ये खिच्चू ले लिया था, अब ये दिमाग लगाया जाता है कि कब बिजली जाएगी और कब पानी भरेंगे.
पाइपलाइन है पर पानी नहीं, पानी के बिल हैं लेकिन समस्या का हल नहीं
इस कस्बे के इंद्रानगर इलाके में अगर देखा जाए तो जगह-जगह पाइप तो लगे हैं लेकिन पानी नहीं है. एक व्यक्ति इस बीच 2025 में दिए पानी का बिल भी दिखाता है तो वहीं दूसरा व्यक्ति कहता है कि पानी तो दिया नहीं टैंकर भेजने का बिल ले रहे हैं.
हर घर नल तो नहीं तो पर हर घर नीला ड्रम!
इंदिरानगर और राजेन्द्र नगर में हर घर नल तो नहीं पहुंच पाए लेकिन हर घर नीले ड्रम जरूर पहुंच गए. यहां हर घर के बाहर नीले रंग के ड्रम रखे हैं जिनमें टैंकर आने पर पानी भरा जाता है. क्राइम की कहानियों के बीच कम से कम यहां तो नीले ड्रम पानी भरने के काम आ रहे हैं.
एक रात बिजली नहीं तो पानी का टैंकर नहीं
माननीयों के दफ्तर में अगर बिजली चली जाए और एसी बंद हो जाए तो तुरंत ही इनवर्टर नहीं तो जनरेटर चल जाया करते हैं. लेकिन आम जनता की हलक भले सूख जाए लेकिन उसके लिए बिजली जाने पर कोई बैकअप प्लान नहीं.
बुंदेलखंड एक तमाम इलाकों में कल तेज आंधी आई जिसके चलते बिजली नहीं आई, नतीजा ये रहा कि न टैंकर भर पाए और न कबरई कस्बे में पहुंच पाए. महिलाओं की बाल्टियां खाली की खाली रह गईं, जो हिम्मत दिखा पाए दूर जाकर भर कर ले आए जो नहीं वो भीषण गर्मी में बंद बिजली में हलक सुखाये बैठे रहे.
जहां पर वाटर टैंकर बोरिंग के जरिये भरे जाते हैं आजतक वहां भी पहुंचा, वाटर टैंकर तो थे लेकिन खाली. जल शक्ति विभाग के ऑपरेटर से पूछा तो उसने कहा बिजली नहीं आई भर नहीं पाए, इसके अलावा कोई बैकअप नहीं, जनरेटर होता तो भर सकता था लेकिन वो है नहीं.
2020 में हुआ शिलान्यास, अब तक ठप पड़ी पानी की टंकी
शायद अगर दो बार के लगातार बीजेपी विधायक की विधायक निधि से बने कबरई के पानी की टंकी 2020 में हुए शिलान्यास के बाद चल गई होती तो कबरई कस्बे की आधी से ज्यादा पानी समस्या खत्म हो गई होती. ये टंकी अभी भी नहीं चल पाई है जबकि इसे बने 5 से 6 साल हो गए. इतना ही नहीं टंकी के बाहर शिलान्यास का शिलापट्ट भी लगा है.
कुछ लोगों का कहना है कि ये चुनावी के लुभावने वादों में से एक है, ये चल गई तो चुनावी मुद्दा भी खत्म हो जाएगा. कई कस्बे में लोगों का ये भी कहना है कि नेता नगरी आती है और वोट मांगकर, पानी की समस्या हल करेंगे बोलकर वोट लेते हैं और फिर भूल जाते हैं. सरकारें आई और गई लेकिन कबरई के कई मोहल्लों में पानी नहीं आ पाया.
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प्रशासन दे रहा आश्वासन
महोबा के कबरई नगर पंचायत के एक्जीक्यूटिव ऑफिसर (EO) संजीव कुमार ने बताया कि जल्दी ही यहां की समस्या खत्म हो जाएगी. तब तक लगातार पानी के टैंकर भेजे जा रहे हैं. उनका कहना है कि पानी की टंकी एक महीने में बनकर तैयार होने वाली है, उसके बाद पानी पहुंचेगा.
उनका कहना है कि कबरई के मोहल्लों में पानी का जलस्तर बहुत नीचे है जिसके चलते वहां नल या हैंडपंप काम नहीं करता. उन्होंने जल्द ही समाधान निकालने का वादा किया. वहीं, उप-जिलाधिकारी शिवध्यान पांडे भी कबरई की मुसीबत को मानते हैं और कहते हैं कि पानी की टंकी जल्दी ही शुरू होगी जिससे स्थाई समाधान होगा तब तक पानी के टैंकर पहुंच रहे हैं.
समर्थ श्रीवास्तव