सागर, नीलेश, अनामिका, संयम, अनुष्का, सुखमनी, आदित्य श्रीवास्तव, ज्योति, भविश्य, अब्दुल रहमान, सूरज भाह, भाहजान, जयनिज चक्रवर्ती, मोहम्मद अम्मार और सुमल्या. ये सिर्फ नाम नहीं हैं. ये वे 15 जिंदगी थीं जिनके अपने-अपने सपने थे. किसी ने करियर की शुरुआत की थी, कोई परिवार की उम्मीद था, कोई अपने माता-पिता का सहारा बनने की तैयारी कर रहा था. लेकिन कुछ मिनटों में सब खत्म हो गया.
सोमवार की दोपहर राजधानी लखनऊ के अलीगंज इलाके में जो हुआ, उसने सिर्फ एक इमारत को नहीं जलाया, बल्कि 15 परिवारों के सपनों, उम्मीदों और भविष्य को भी राख में बदल दिया. आग की लपटें कुछ घंटों में शांत हो गईं, लेकिन जिन घरों से बेटे-बेटियां हमेशा के लिए चले गए, वहां उठी चीखें शायद वर्षों तक नहीं थमेंगी. भीड़ में हर चेहरा एक कहानी कह रहा था. कोई बेटे की तस्वीर सीने से लगाए बैठा था, कोई बेटी का नाम पुकार-पुकारकर रो रहा था. किसी की आंखें सूख चुकी थीं तो किसी के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. यहां सिर्फ शव नहीं थे, यहां टूटे हुए सपने थे, बिखरे हुए परिवार थे और ऐसे सवाल थे जिनका जवाब हर कोई तलाश रहा है.
हर किसी को बस चमत्कार की उम्मीद थी
देर रात तक सैकड़ों लोग मौजूद रहे. किसी को उम्मीद थी कि शायद कोई चमत्कार हो जाए. लेकिन हर बार उम्मीद टूटती गई. एक मां अपने बेटे का नाम लेकर बार-बार बेहोश हो रही थी. परिजन संभालते, पानी पिलाते, लेकिन जैसे ही बेटे की तस्वीर सामने आती, उसका दर्द फिर फूट पड़ता. कई परिवार ऐसे थे जिन्हें अब तक यकीन नहीं हो रहा था कि सुबह घर से निकला उनका बच्चा अब कभी लौटकर नहीं आएगा. एक पिता लगातार यही दोहरा रहे थे, वह तो कहकर गया था कि शाम तक आ जाऊंगा. यह सुनते ही वहां मौजूद हर व्यक्ति के दिल को चीर रहा था. क्योंकि इस हादसे ने सिर्फ लोगों की जान नहीं ली, बल्कि उन सामान्य वादों और उम्मीदों को भी खत्म कर दिया जो हर परिवार रोज जीता है.
आदित्य की मां के सवाल, जिनका जवाब नहीं मिला
इस हादसे में जान गंवाने वालों में आदित्य श्रीवास्तव भी शामिल थे. आदित्य उसी एनीमेशन सेंटर में काम करते थे जहां आग लगी थी और अपने परिवार की उम्मीदों का जरिया थे. पोस्टमार्टम हाउस के बाहर उनकी मां कल्पना श्रीवास्तव का दर्द शब्दों में बयां करना मुश्किल है. उन्होंने दावा किया कि घटना के दौरान वह मौके पर मौजूद थीं और पूरा घटनाक्रम अपनी आंखों से देखा. उनका आरोप है कि यदि शुरुआती समय में रेस्क्यू सही दिशा में होता तो कई बच्चों की जान बच सकती थी. भावुक स्वर में उन्होंने कहा कि जहां से शुरुआत में धुआं निकल रहा था, अगर बचाव कार्य वहीं से शुरू किया जाता तो संभव है कि कई लोग सुरक्षित बाहर निकाल लिए जाते. उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि घायलों को अस्पताल पहुंचाने में तेजी क्यों नहीं दिखाई गई. उनके अनुसार समय पर उपचार मिलता तो शायद कुछ जिंदगियां बचाई जा सकती थीं. बेटे को याद करते हुए वह बार-बार रो पड़ती थीं और यही कहती थीं कि मेरा बच्चा वापस नहीं आएगा, लेकिन अगर समय पर मदद मिलती तो शायद आज वह हमारे बीच होता.
चीखें जो देर तक सुनाई देती रहीं
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, आग के बीच से लगातार मदद की आवाजें आ रही थीं. अंदर फंसे लोग बाहर निकलने का रास्ता खोज रहे थे, लेकिन मुख्य मार्ग आग और धुएं की चपेट में था. मौके पर मौजूद लोगों ने बताया कि कुछ क्षण ऐसे भी आए जब पूरा इलाका सिर्फ चीखों की आवाज से गूंज रहा था. कोई खिड़की से मदद मांग रहा था, कोई मोबाइल फोन पर अपने परिजनों को अंतिम बार कॉल कर रहा था. रेस्क्यू टीमों ने पूरी कोशिश की, लेकिन धुएं की सघनता और आग की तीव्रता ने अभियान को बेहद चुनौतीपूर्ण बना दिया.
दीवार तोड़कर शुरू हुआ जीवन बचाने का संघर्ष
जब सामने का रास्ता लगभग बेकार साबित होने लगा तो प्रशासन ने बगल की बिल्डिंग की दीवार तोड़कर अंदर पहुंचने का फैसला लिया. दीवार में छेद किए गए. लेकिन अंदर मौजूद धुआं इतना अधिक था कि बचावकर्मियों के लिए आगे बढ़ना भी कठिन हो गया. हर मिनट के साथ उम्मीद कम होती जा रही थी. बाहर खड़े परिजन लगातार प्रार्थना कर रहे थे कि उनके अपने सुरक्षित निकल आएं. लेकिन कुछ देर बाद जब एक के बाद एक बाहर आने लगे तो माहौल बदल गया. लोगों को समझ आने लगा कि अंदर का नुकसान अनुमान से कहीं ज्यादा बड़ा है.
रक्षा मंत्री और मुख्यमंत्री भी पहुंचे
घटना की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम स्थगित कर दिए और सीधे लखनऊ पहुंचे. उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण किया और अधिकारियों से विस्तृत जानकारी ली. मुख्यमंत्री ने मृतकों के परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए मामले की उच्चस्तरीय जांच के निर्देश दिए. साथ ही यह भी कहा गया कि यदि किसी स्तर पर लापरवाही पाई जाती है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. वहीं रक्षा मंत्री व लखनऊ के सांसद राजनाथ सिंह भी देर रात मौके पर पहुंचे.
जांच के घेरे में इमारत
हादसे के बाद भवन की स्वीकृतियों, निर्माण की स्थिति और सुरक्षा मानकों पर भी सवाल खड़े हो गए हैं. जानकारी के अनुसार, भवन का मूल मानचित्र आवासीय उपयोग के लिए स्वीकृत हुआ था. वर्ष 2016 में अनाधिकृत निर्माण के आरोपों को लेकर कार्रवाई की प्रक्रिया भी शुरू हुई थी. बाद में आपत्तियों के आधार पर ध्वस्तीकरण आदेश निरस्त कर दिया गया था. अब पूरे रिकॉर्ड की फिर से जांच की जा रही है. इसी क्रम में मुख्यमंत्री के निर्देश पर एलडीए के कुछ अधिकारियों को निलंबित भी किया गया है. एलडीए उपाध्यक्ष प्रथमेश कुमार ने पांच सदस्यीय जांच टीम गठित की है, जो भवन से जुड़े सभी पहलुओं की समीक्षा करेगी.
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