₹2 Cr की जमीन, ₹18 Cr की डील और 'शीश महल'... अयोध्या के चिंटू तिवारी की आलीशान हवेली पर विवाद

राम मंदिर से महज कुछ दूरी पर बना एक आलीशान महलनुमा घर चर्चा में है. यह वही मामला है जिसमें रवि मोहन उर्फ चिंटू तिवारी और सुल्तान अंसारी की जमीन डील को लेकर सवाल उठे थे. 2 करोड़ की जमीन 18.5 करोड़ में ट्रस्ट को बेचने के आरोपों ने राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया था.

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10 मिनट में बदली जमीन की कीमत, ट्रस्ट को बेचने का आरोप और विवादित सौदा. (File Photo: ITG) 10 मिनट में बदली जमीन की कीमत, ट्रस्ट को बेचने का आरोप और विवादित सौदा. (File Photo: ITG)

समर्थ श्रीवास्तव

  • अयोध्या,
  • 30 जून 2026,
  • अपडेटेड 4:36 PM IST

अयोध्या में राम मंदिर जुड़े कई विवाद लगातार सामने आ रहे हैं. दान चोरी के अलावा प्रॉपर्टी विवाद को लेकर भी राम मंदिर ट्रस्ट का नाम चर्चा में है. राम मंदिर से महज एक किलोमीटर की दूरी पर रवि मोहन उर्फ चिंटू तिवारी का एक आलीशान महलनुमा घर बना है. सोशल मीडिया पर इस घर के वीडियो काफी वायरल हुए थे. कई लोगों ने इसे जमीन सौदे से जोड़कर सवाल उठाए थे.

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विवाद की शुरुआत साल 2021 में हुई एक जमीन डील से हुई थी. आरोप लगाया गया था कि रवि मोहन उर्फ चिंटू तिवारी और सुल्तान अंसारी ने अयोध्या के बाग बिजेसी इलाके में एक जमीन का टुकड़ा कुसुम पाठक और उनके पति से करीब 2 करोड़ रुपए में खरीदा था. इसके बाद महज 10 मिनट के अंदर इसी जमीन को राम मंदिर ट्रस्ट को करीब 18.5 करोड़ रुपए में बेच दिया. 

उस समय सवाल उठाया गया कि जब ट्रस्ट सीधे किसानों से जमीन खरीद सकता था, तो इतनी जल्दी और अधिक कीमत पर जमीन क्यों खरीदी गई. इस जमीन सौदे को लेकर विपक्ष ने कई गंभीर आरोप लगाए थे. आरोप यह भी लगाया गया कि इस अवैध कमाई का इस्तेमाल रवि मोहन ने अपने लिए आलीशान महलनुमा घर बनाने में किया. राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने मुद्दे को उठाया था. 

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संजय सिंह ने जमीन सौदे से जुड़े दस्तावेज पेश किए थे. दावा किया था कि राम मंदिर ट्रस्ट के नाम पर चंदे के पैसे की हेराफेरी की गई है. उन्होंने कहा था कि इन दस्तावेजों को SIT और जांच एजेंसियों को सौंपा जाएगा ताकि पूरे मामले की जांच हो सके. हालांकि, श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने इन सभी आरोपों को पूरी तरह खारिज किया था. चंपत राय ने इसे नियमानुसार बताया था.

उन्होंने कहा था कि जमीन का सौदा बाजार दर और विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार किया गया था. ट्रस्ट की ओर से यह तर्क दिया गया था कि जिस जमीन को खरीदा गया, उसका एग्रीमेंट पहले ही कई वर्षों से चल रहा था. इसलिए तत्कालीन बाजार मूल्य के आधार पर ही भुगतान किया गया. इस मामले में सरकार की ओर से जांच के आदेश दिए गए थे. जिला प्रशासन ने पूरे मामले की जांच की थी. 

इसके बाद में प्रशासन की ओर से कहा गया कि जमीन खरीद प्रक्रिया में नियमों का पालन किया गया है और किसी तरह की धांधली सामने नहीं आई. इस विवाद में अयोध्या के तत्कालीन मेयर ऋषिकेश उपाध्याय का नाम भी चर्चा में आया था. इसकी वजह जमीन की रजिस्ट्री प्रक्रिया में उनकी भूमिका थी. विवादित जमीन की रजिस्ट्री में ऋषिकेश उपाध्याय ने गवाह के तौर पर हस्ताक्षर किए थे.

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उनके गवाह बनने के बाद विपक्षी दलों ने सवाल उठाए थे कि एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति ने इस तरह के विवादित और करोड़ों रुपये के जमीन सौदे में गवाह की भूमिका क्यों निभाई. आरोप लगाया गया था कि ऋषिकेश उपाध्याय और रवि मोहन के बीच करीबी संबंध हैं. सांसद संजय सिंह ने सवाल उठाया था कि मेयर ने खुद गवाह बनकर इस सौदे को आगे बढ़ाने में मदद क्यों की थी.

विपक्ष ने आरोप लगाया था कि इस पूरी प्रक्रिया में मिलीभगत हो सकती है, जिससे जमीन को ऊंची कीमत पर ट्रस्ट को बेचा गया. हालांकि, ऋषिकेश उपाध्याय और स्थानीय बीजेपी नेतृत्व ने इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया था. उन्होंने कहा था कि इस सौदे से उनका कोई व्यक्तिगत वित्तीय लाभ नहीं हुआ और जमीन की कीमत तय करने में उनकी कोई भूमिका नहीं थी.

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