40 लाख की नौकरी या पहाड़ों का सुकून? IITian की पोस्ट पर छिड़ी बहस

क्या 40 लाख की जॉब ही खुशहाल जिंदगी की गारंटी है? IIT कानपुर के पूर्व छात्र अरजव मोदी की वायरल लिंक्डइन पोस्ट में बेंगलुरु और पहाड़ों की जिंदगी की तुलना ने सोशल मीडिया पर नई बहस छेड़ दी है.

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पोस्ट वायरल होने के बाद लोगों ने भी अपनी राय रखी ( सांकेतिक तस्वीर- हिमाचल के शिमला का एक नजारा-Pexel) पोस्ट वायरल होने के बाद लोगों ने भी अपनी राय रखी ( सांकेतिक तस्वीर- हिमाचल के शिमला का एक नजारा-Pexel)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 14 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 11:01 AM IST

क्या ज्यादा सैलरी और बड़े शहर की चमक-दमक ही खुशहाल जिंदगी की गारंटी है? IIT कानपुर के पूर्व छात्र अरजव मोदी की एक लिंक्डइन पोस्ट ने इसी सवाल पर सोशल मीडिया पर नई बहस छेड़ दी है. बेंगलुरु की हाई-फाई लाइफ छोड़कर पिछले चार महीने से एक छोटे पहाड़ी कस्बे में रह रहे अरजव का कहना है कि जगह बदलने से सिर्फ पता नहीं बदलता, बल्कि सोचने का तरीका भी बदल जाता है.

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अरजव मोदी ने अपनी पोस्ट में 27 साल के दो युवाओं की जिंदगी की तुलना की. पहला युवक बेंगलुरु में रहता है. उसके पास 3BHK फ्लैट है, सालाना करीब 40 लाख रुपये की नौकरी है, रोज Uber से ऑफिस जाता है और Zepto जैसी ऐप से घर का सामान मंगाता है. देखने में यह जिंदगी किसी सपने से कम नहीं लगती.

लेकिन अरजव का कहना है कि इस लाइफस्टाइल का एक दूसरा पहलू भी है. उन्होंने लिखा कि ऐसे माहौल में हर दिन खुद की तुलना दूसरों से होने लगती है. आसपास 21-22 साल की उम्र में बड़ी सफलता हासिल करने वाले लोग दिखाई देते हैं. तब महसूस होता है कि शायद जिंदगी के सबसे अच्छे साल निकल चुके हैं. धीरे-धीरे यह तुलना अकेलेपन, तनाव और खुद पर शक में बदलने लगती है.

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पहाड़ों में रहकर बदला नजरिया

अरजव ने बताया कि पिछले चार महीनों से वह एक छोटे पहाड़ी कस्बे में रह रहे हैं. यहां उनकी कमाई बेंगलुरु की तुलना में काफी कम है. वे कई बार स्कूटी से या पैदल बाजार जाते हैं और शाम के खूबसूरत नजारों के बीच अपने पार्टनर के साथ समय बिताते हैं.

उनके मुताबिक, यहां रहने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि जिंदगी की रफ्तार धीमी जरूर है, लेकिन लोग ज्यादा सुकून में हैं. उनके आसपास 30-35 साल की उम्र के ऐसे लोग हैं, जो अपने काम और जीवन से खुश हैं. उन्हें देखकर लगता है कि जिंदगी की दौड़ खत्म नहीं हुई, बल्कि अच्छे दिन अभी भी सामने हो सकते हैं.

'शहर छोड़ने की नहीं, तुलना छोड़ने की बात कर रहा हूं'

अरजव ने अपनी पोस्ट में यह भी साफ किया कि उनका मकसद लोगों को पहाड़ों में जाकर बसने की सलाह देना नहीं है. उनका कहना है कि असली समस्या शहर नहीं, बल्कि लगातार होने वाली तुलना है.

उन्होंने लिखा कि जब भी लगे कि आप दूसरों से पीछे हैं, तो उन लोगों के बारे में सोचिए जिन्होंने 35 या 40 साल की उम्र में बड़ी सफलता हासिल की. सोशल मीडिया और मीडिया अक्सर 20 साल की उम्र में करोड़ों की कंपनी बनाने वालों की कहानियां दिखाते हैं, लेकिन परिवार के साथ संतुलित और खुशहाल जिंदगी जीने वाले लोगों की चर्चा कम होती है.

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सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

अरजव की पोस्ट वायरल होने के बाद लोगों ने भी अपनी राय रखी. एक यूजर ने लिखा कि मैंने भी 10 साल पहाड़ों में बिताए हैं. वे मेरी जिंदगी के सबसे खूबसूरत साल थे.वहीं दूसरे यूजर ने कहा कि खुशी किसी शहर या गांव में नहीं, बल्कि संतोष और आभार की भावना में होती है.

एक अन्य यूजर ने लिखा कि अगर हम हर समय खुद की तुलना करते रहेंगे, तो दुनिया की कोई भी जगह हमें खुश नहीं रख सकती.

अरजव की पोस्ट ने एक बार फिर उस सवाल को चर्चा में ला दिया है, जिससे आज का युवा सबसे ज्यादा जूझ रहा है-क्या सफलता सिर्फ मोटी सैलरी और बड़े शहर से तय होती है, या फिर मानसिक शांति, रिश्ते और संतुलित जीवन भी उतने ही जरूरी हैं?

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