नौकरी की तलाश कर रहे लोगों के लिए सैलरी सबसे महत्वपूर्ण बातों में से एक होती है. लेकिन कई बार कंपनियां नौकरी के विज्ञापन में वेतन का जिक्र नहीं करतीं. इससे उम्मीदवार और कंपनी दोनों का समय बर्बाद हो सकता है. हाल ही में ऐसा ही एक मामला सामने आया, जिसने सोशल मीडिया पर सैलरी ट्रांसपेरेंसी को लेकर नई बहस छेड़ दी. यह मामला एक स्टार्टअप कंपनी के फाउंडर अभिषेक अग्रवाल से जुड़ा है. उन्होंने लिंक्डइन पर एक पोस्ट शेयर करते हुए बताया कि उनकी कंपनी ने एक उम्मीदवार को 20 लाख रुपये सालाना का ऑफर दिया था, लेकिन उम्मीदवार ने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया. दिलचस्प बात यह है कि इस उम्मीदवार ने कंपनी की भर्ती प्रक्रिया के चार इंटरव्यू राउंड पूरे किए थे, जिसमें करीब तीन सप्ताह का समय लगा था.
अभिषेक अग्रवाल ने अपनी पोस्ट में माना कि इस पूरी स्थिति के लिए काफी हद तक वह खुद जिम्मेदार थे. उन्होंने बताया कि नौकरी के विज्ञापन में सैलरी की जिक्र नहीं किया गया था. केवल इतना लिखा गया था कि कंपनी कंपटीटिव सैलरी देगी. इस वजह से उम्मीदवार और कंपनी के बीच सैलरी को लेकर अलग-अलग उम्मीदें बन गईं. जब भर्ती प्रक्रिया शुरू हुई तो उम्मीदवार ने अपनी योग्यता और अनुभव के आधार पर करीब 28 लाख रुपये सालाना वेतन की उम्मीद लगा रखी थी. दूसरी तरफ कंपनी का बजट केवल 20 लाख रुपये सालाना था. शुरुआत में सैलरी पर कोई स्पष्ट चर्चा नहीं हुई, इसलिए दोनों पक्ष इंटरव्यू के आखिरी चरण तक पहुंच गए. लेकिन जब ऑफर दिया गया, तब पता चला कि उम्मीदवार की अपेक्षा और कंपनी के बजट में बड़ा अंतर है. आखिरकार उम्मीदवार ने ऑफर ठुकरा दिया और तीन सप्ताह की पूरी प्रक्रिया बेकार चली गई.
फाउंडर ने माना- गलती हमारी थी
अभिषेक अग्रवाल ने अपनी पोस्ट में यह भी कहा कि एक ही पोस्ट वाली नौकरी के लिए अलग-अलग कंपनियों में वेतन काफी अलग हो सकता है. उदाहरण के तौर पर उन्होंने बताया कि किसी कंपनी में सेल्स एग्जीक्यूटिव की सैलरी एक स्तर की हो सकती है, जबकि दूसरी बड़ी कंपनी में उसी पद के लिए कहीं ज्यादा वेतन दिया जा सकता है. इसलिए केवल पोस्ट देखकर वेतन का अनुमान लगाना सही नहीं होता. इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने अपनी राय रखी. अधिकांश लोगों का मानना था कि कंपनियों को नौकरी के डिटेल में सैलरी रेंज जरूर बतानी चाहिए। इससे उम्मीदवार पहले ही तय कर सकते हैं कि नौकरी उनके लिए उपयुक्त है या नहीं. साथ ही कंपनी को भी केवल उन्हीं लोगों के आवेदन मिलेंगे, जो उसके बजट के अनुसार काम करने को तैयार हों.
सैलरी को लेकर नहीं हुई शुरुआती चर्चा
एक यूजर ने लिखा कि ट्रांसपेरेंसी से सभी का समय बचता है. चार इंटरव्यू राउंड और तीन सप्ताह की मेहनत के बाद वेतन के कारण नौकरी के लिए न कहना काफी निराशाजनक होता है. वहीं दूसरे यूजर ने कहा कि अगर नौकरी के विज्ञापन में सिर्फ एक लाइन जोड़ दी जाती, तो कंपनी और उम्मीदवार दोनों का समय बच सकता था. कई लोगों ने अपने अनुभव शेयर करते हुए बताया कि भर्ती प्रक्रिया की शुरुआत में ही वेतन पर चर्चा कर लेना सबसे अच्छा तरीका है. इससे बाद में किसी तरह की गलतफहमी नहीं होती और दोनों पक्ष सही निर्णय ले पाते हैं.
क्यों जरूरी है सैलरी ट्रांसपेरेंसी?
यह मामला इस बात की याद दिलाता है कि नौकरी की भर्ती प्रक्रिया में सैलरी ट्रांसपेरेंसी कितनी जरूरी है. यदि कंपनियां शुरुआत में ही वेतन सीमा स्पष्ट कर दें, तो उम्मीदवारों और भर्ती कर्ताओं दोनों का समय, मेहनत और संसाधन बच सकते हैं. साथ ही भर्ती प्रक्रिया भी अधिक प्रभावी और सफल बन सकती है.
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