70 साल बाद सामने आया शहीद पति का चेहरा! 93 साल की पत्नी हुई भावुक

चीन की 93 वर्षीय झाओ कुइफेन ने करीब 70 साल बाद अपने शहीद पति झांग झिक्सिन का चेहरा पहली देखा. तस्वीर देखते ही वह भावुक होकर रो पड़ीं. कलाकारों ने परिवार की यादों और पुराने रिकॉर्ड की मदद से शहीद सैनिकों की तस्वीरें दोबारा तैयार की.

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लियुयांग शहर से भी 60 सैनिक इस लड़ाई में शामिल हुए, जिनमें झांग झिक्सिन भी थे. ( ITG) लियुयांग शहर से भी 60 सैनिक इस लड़ाई में शामिल हुए, जिनमें झांग झिक्सिन भी थे. ( ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 01 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 8:58 AM IST

मध्य चीन के हुनान प्रांत की 93 वर्षीय झाओ कुइफेन के लिए हाल ही में एक बेहद भावुक पल आया. करीब 70 साल पहले युद्ध में शहीद हुए अपने पहले पति का चेहरा उन्होंने पहली बार एक रीस्टोर की गई तस्वीर में देखा. जैसे ही तस्वीर उनके हाथ में आई, वह अपने आंसू नहीं रोक सकीं और फूट-फूटकर रो पड़ीं. इस भावुक पल का वीडियो अब सोशल मीडिया पर भी लोगों का दिल जीत रहा है. जुलाई 1953 में दक्षिण-पूर्वी चीन के तट पर स्थित डोंगशान द्वीप पर भीषण लड़ाई हुई. उस समय युद्धविराम की बातचीत चल रही थी, लेकिन हालात बेहद तनावपूर्ण थे. इसी दौरान पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के जवानों को अतिरिक्त सहायता के लिए वहां भेजा गया. 

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लियुयांग शहर से भी 60 सैनिक इस लड़ाई में शामिल हुए, जिनमें झांग झिक्सिन भी थे. करीब 36 घंटे तक चली इस लड़ाई में चीन ने जीत का दावा किया, लेकिन इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी. इस संघर्ष में 1,200 से ज्यादा सैनिक या तो शहीद हो गए या घायल हुए. झांग झिक्सिन भी केवल 20 साल की उम्र में शहीद हो गए. उनकी और झाओ की कोई संतान नहीं थी और सबसे दुखद बात यह थी कि उनके लाइफटाइम की कोई तस्वीर भी परिवार के पास नहीं बची थी.

दूसरी शादी हुई, लेकिन पहली मोहब्बत नहीं भूलीं
पति की मौत के बाद झाओ पूरी तरह टूट गई थीं. वह हर दिन रोती थीं, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अपने सास-ससुर की सेवा करना नहीं छोड़ा. उम्र बढ़ने के साथ झांग के माता-पिता को चिंता होने लगी कि झाओ अकेले पूरी जिंदगी कैसे गुजारेंगी. इसलिए बाद में परिवार ने उनकी शादी झांग के चचेरे भाई से करवा दी. दूसरी शादी के बाद झाओ के पांच बच्चे हुए और उन्होंने पूरे परिवार की जिम्मेदारी निभाई.

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हालांकि उन्होंने नई जिंदगी शुरू कर दी, लेकिन अपने पहले पति को कभी नहीं भूल पाईं. उनके दिल में झांग की याद हमेशा जिंदा रही. कई दशकों तक डोंगशान द्वीप की लड़ाई में शहीद हुए सैनिकों के नाम केवल पत्थरों पर लिखे रहे. उनके परिवारों के पास न तो उनकी तस्वीरें थीं और न ही ऐसा कोई चेहरा जिसे देखकर वे उन्हें याद कर सकें. इसी कमी को दूर करने के लिए इस साल एक खास पहल शुरू की गई. मई महीने में हुनान प्रशासन के सहयोग से नानजिंग यूनिवर्सिटी ऑफ इंडस्ट्री टेक्नोलॉजी की एक स्वयंसेवी कलाकार टीम ने शहीद सैनिकों के चेहरों को दोबारा बनाने का काम शुरू किया.

परिवार के लोगों के चेहरे, पुरानी यादों, उपलब्ध दस्तावेजों और ऐतिहासिक रिकॉर्ड की मदद से कलाकारों ने स्केच और डिजिटल तकनीक का उपयोग कर चार शहीद सैनिकों के चेहरे तैयार किए. 24 जून को इन चारों रिस्टोर तस्वीरों को उनके परिवारों को सौंपा गया. जब झाओ कुइफेन को उनके पहले पति झांग झिक्सिन की तस्वीर दी गई तो वह उसे देखते ही भावुक हो गईं. आसपास मौजूद लोगों ने उन्हें संभाला, लेकिन वह लगातार रोती रहीं. उन्होंने तस्वीर को अपने सीने से लगाया, पति का नाम पुकारा और काफी देर तक उसे निहारती रहीं. बाद में वह अगरबत्ती जलाकर तस्वीर के सामने घुटनों के बल बैठ गईं और अपने दिवंगत पति को श्रद्धांजलि दी.

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तस्वीर देखते ही छलक पड़े आंसू
झाओ की सबसे छोटी बेटी ने बताया कि उनकी मां पूरी जिंदगी बहुत मजबूत रहीं. उन्होंने मुश्किल से मुश्किल समय का सामना किया, लेकिन उन्होंने अपनी मां को जीवन में केवल दूसरी बार इस तरह रोते हुए देखा. परिवार के बच्चे आज भी झांग झिक्सिन को सम्मान से फादर झिक्सिन कहकर याद करते हैं. झाओ की दूसरी बेटी ने कहा कि अब उनके लिए झांग सिर्फ किसी स्मारक पर लिखा हुआ नाम नहीं है. अब उनके पास उनका चेहरा है, जिसे देखकर वे उन्हें याद कर सकते हैं, सम्मान दे सकते हैं और आने वाली पीढ़ियों को उनके बारे में बता सकते हैं.

इस समारोह में एक अन्य शहीद सैनिक लियू शिनफू की छोटी चचेरी बहन भी मौजूद थी.  जब उन्होंने अपने भाई की पुनर्स्थापित तस्वीर देखी तो उनकी आंखों से भी आंसू निकल आए. उन्होंने भावुक होकर कहा- भाई, 73 साल बाद आखिरकार हम तुम्हारा चेहरा देख पाए. इस घटना ने सोशल मीडिया पर भी लोगों को भावुक कर दिया. एक यूजर ने लिखा- इतिहास की किताबों में शहीदों का जिक्र सिर्फ कुछ पंक्तियों में होता है, लेकिन उनके परिवारों के लिए वे पति, बेटे और भाई थे. युद्ध उन्हें दुनिया से जरूर ले गया, लेकिन अपनों के दिलों से कभी नहीं मिटा सका. यही वजह है कि 70 साल बाद मिली यह तस्वीर सिर्फ एक फोटो नहीं, बल्कि एक परिवार की अधूरी यादों को पूरा करने वाली अमूल्य धरोहर बन गई. 
 

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