पेट ट्रैवल का बढ़ता क्रेज, पालतू जानवरों के साथ हवाई सफर सुहाना या सजा

भारत में पालतू जानवरों के साथ हवाई यात्रा का ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन एयरलाइंस की नई नीतियां पेट पेरेंट्स के लिए चुनौतियां खड़ी कर रही हैं. कैरियर का छोटा साइज और केवल इकोनॉमी की आखिरी सीट पर बैठने की पाबंदी जानवरों के आराम पर सवाल उठा रही है.

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7500 की फीस और आखिरी सीट की मार (Photo: Getty) 7500 की फीस और आखिरी सीट की मार (Photo: Getty)

aajtak.in

  • नई दिल्ली ,
  • 02 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 12:48 PM IST

हॉलिडे पर जाते समय जब हम घर के दरवाजे पर ताला लगाते हैं, तो सबसे ज्यादा दुख उस बेजुबान साथी को पीछे छोड़ने में होता है जो हमारी आहट पहचानता है. वह शायद बोल नहीं सकता, लेकिन उसकी उदास आंखें सब कह देती हैं. हर पेट पेरेंट की यह दिली ख्वाहिश होती है कि उनका प्यारा कुत्ता या बिल्ली परिवार के हर जश्न और हर ट्रिप का हिस्सा बने. सच तो यह है कि अब यह मुमकिन भी हो रहा है. आज के समय में होटल, कैफे और यहां तक कि एयरलाइंस भी पालतू जानवरों के लिए अपने दरवाजे खोल रही हैं.

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इंडिया ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन 2025 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पालतू जानवरों के साथ फ्लाइट और होटलों की बुकिंग में जबरदस्त बढ़ोत्तरी हुई है. इसी बदलाव को देखते हुए एअर इंडिया ने हाल ही में अपनी नीतियों को अपडेट किया है ताकि जानवरों के साथ उड़ान भरना थोड़ा और आसान हो सके. लेकिन कई लोगों के मन में सवाल अब भी वही है कि क्या यह वास्तव में पर्याप्त है? दरअसल, एक इन्फ्लुएंसर द्वारा अपने पालतू जानवर के साथ उड़ान भरने के अनुभव को साझा करने के बाद यह बहस ऑनलाइन फिर से शुरू हो गई है. इसने एक बार फिर सबका ध्यान इस बात पर खींच लिया है कि भारत का हवाई सफर पालतू जानवरों के लिए वास्तव में कितना अनुकूल है.

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पालतू जानवरों के लिए हवाई यात्रा: क्या है असली स्थिति?

एक समय था जब लोग इस बारे में जानते तक नहीं थे कि उनका कुत्ता या बिल्ली भी उनके साथ हवाई जहाज में जा सकते हैं. लंबे समय तक सिर्फ एयर इंडिया ही ऐसी एयरलाइन थी जो इसकी इजाजत देती थी. लेकिन कोरोना काल के बाद माहौल बदला और लोगों ने अपने पालतू जानवरों को भी साथ ले जाने की जिद पकड़ ली. आंकड़ों की मानें तो पिछले कुछ सालों में पालतू जानवरों से जुड़ी बुकिंग में 26 से 43 प्रतिशत तक का उछाल आया है.

आज एयरपोर्ट पर बोर्डिंग गेट के पास किसी छोटे कुत्ते को देखना अब आम बात हो गई है. उदाहरण के तौर पर, 'बन्नू' नाम का एक शिह त्जा कुत्ता है जो महज छह महीने की उम्र से ही उड़ान भर रहा है. वह अब तक 24 बार फ्लाइट से सफर कर चुका है और एयर इंडिया के क्रू का पसंदीदा यात्री बन गया है. एयर इंडिया के बाद 2022 में अकासा एयर ने भी 'पेट्स ऑन अकासा' नाम की सुविधा शुरू की, जिसे लोगों ने हाथों-हाथ लिया. देखा जाए तो पिछले एक साल में एयर इंडिया ने 7,000 से ज्यादा पालतू जानवरों को सफर कराया. यह सब सुनने में बहुत अच्छा लगता है, लेकिन जब आप असलियत में सफर करने पहुंचते हैं, तो कुछ ऐसी अड़चनें सामने आती हैं जो मजे को किरकिरा कर देती हैं.

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सुविधाओं के नाम पर समझौता

प्रगति तो हुई है, लेकिन पालतू जानवरों के मालिकों को हर कदम पर बाधाओं का सामना करना पड़ता है. सबसे बड़ी समस्या है वजन और पिंजरे का साइज. एयरलाइंस ने नियम बना रखा है कि केबिन में (यानी आपके साथ सीट के पास) सिर्फ वही जानवर जा सकता है जिसका वजन पिंजरे के साथ 10 किलो से कम हो.

बन्नू की मालकिन सतरूपा चौधरी बताती हैं कि एयरलाइंस ने वजन की सीमा तो बढ़ा दी, लेकिन पिंजरे  का साइज छोटा कर दिया है. वह कहती हैं, "मेरा कुत्ता सिर्फ 5 किलो का है, लेकिन वह भी नए साइज वाले बैग में मुश्किल से समा पाता है. अब सोचिए कि 7 या 10 किलो का कुत्ता उस छोटे से बैग में कैसे बैठेगा? वह तो एक छोटे पिल्ले के बैग जैसा है." जब जानवर पिंजरे में ठीक से हिल-डुल भी नहीं पाता, तो वह पूरे सफर में बेचैन रहता है. ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या सुविधाएं देते वक्त जानवरों के आराम का ख्याल रखा गया है?

वजन और कैरियर के आकार के बीच सही अनुपात जरूरी है (Photo: Getty)

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आखिरी सीट की पाबंदी और भारी खर्च

दिक्कत सिर्फ पिंजरे तक सीमित नहीं है, बात बैठने की जगह की भी है. एयर इंडिया ने अब नियम बना दिया है कि पालतू जानवरों को सिर्फ इकोनॉमी क्लास की आखिरी लाइन वाली सीट (जो वॉशरूम के पास होती है) पर ही बैठना होगा. सतरूपा चौधरी कहती हैं कि यह जगह विमान में सबसे ज्यादा हलचल वाली होती है. लोग बार-बार वॉशरूम के लिए आते-जाते हैं, जिससे जानवर डर जाते हैं और शांत नहीं रह पाते. पहले उन्हें खिड़की वाली सीट (विंडो सीट) मिलती थी जहां वे शांति से बैठ सकते थे, लेकिन अब उस पर भी रोक है.

इसके अलावा, हवाई सफर अब बहुत महंगा भी हो गया है. पहले जहां वजन के हिसाब से पैसे लगते थे, अब 7,500 रुपये का भारी भरकम शुल्क तय कर दिया गया है. इसके ऊपर से डॉक्टर का सर्टिफिकेट, कागजी कार्यवाही और खास तरह के पिंजरे का अलग से खर्च. इतना सब करने के बाद भी यह सुविधा सिर्फ छोटे कुत्तों या बिल्लियों के लिए है. अगर आपके पास लैब्राडोर या गोल्डन रिट्रीवर जैसा बड़ा कुत्ता है, तो आपके पास उसे 'कार्गो' (जहां सामान रखा जाता है) में भेजने के अलावा कोई रास्ता नहीं है. कई लोग अपने लाडले जानवर को अकेले कार्गो में भेजने के नाम से ही डर जाते हैं.

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