न्यूजीलैंड के मिडफील्डर सरप्रीत सिंह ने फीफा विश्व कप में इतिहास रच दिया है. वह विश्व कप मैच में शुरुआती एकादश में जगह बनाने वाले पहले भारतीय मूल के फुटबॉलर बन गए. ईरान के खिलाफ 2-2 से ड्रॉ मुकाबले में सरप्रीत ने अपना विश्व कप डेब्यू किया और लगभग पूरा मैच खेला. इससे पहले ऑस्ट्रेलिया के निशान वेलुपिल्ले ने भी भारतीय मूल के खिलाड़ी के तौर पर इस टूर्नामेंट में पदार्पण किया था. अब सरप्रीत की उपलब्धि भारतीय फुटबॉल प्रेमियों के लिए गर्व का पल बन गई है.
फुटबॉल की दुनिया में भारतीय मूल के खिलाड़ियों की मौजूदगी अब सिर्फ चर्चा तक सीमित नहीं रही, बल्कि वे विश्व मंच पर अपनी पहचान भी बना रहे हैं. न्यूजीलैंड के मिडफील्डर सरप्रीत सिंहने फीफा विश्व कप में एक ऐसा इतिहास रच दिया, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेगा.
सरप्रीत सिंह विश्व कप के किसी मैच में शुरुआती एकादश में उतरने वाले पहले भारतीय मूल के फुटबॉलर बन गए हैं. उन्होंने ईरान के खिलाफ न्यूजीलैंड के ग्रुप मैच में यह उपलब्धि हासिल की. ऑकलैंड में पंजाबी माता-पिता के घर जन्मे 27 साल के सरप्रीत ने न सिर्फ विश्व कप में पदार्पण किया, बल्कि लगभग पूरा मुकाबला खेलकर अपनी छाप भी छोड़ी.
न्यूजीलैंड के मुख्य कोच डैरेन बेजले ने भरोसा जताते हुए सरप्रीत को शुरुआत से मैदान पर उतारा. दस नंबर की जर्सी में खेल रहे इस मिडफील्डर ने पूरे आत्मविश्वास के साथ मुकाबला खेला. उन्होंने ईरान के गोल पर तीन प्रयास किए, हालांकि वह गोल में तब्दील नहीं हो सके. 90वें मिनट में उन्हें स्थानापन्न खिलाड़ी से बदला गया.
मुकाबला 2-2 की बराबरी पर खत्म हुआ, लेकिन सरप्रीत के लिए यह स्कोरलाइन से कहीं बड़ी उपलब्धि थी. विश्व कप जैसे मंच पर शुरुआती एकादश में जगह बनाना किसी भी खिलाड़ी के करियर की बड़ी उपलब्धियों में गिना जाता है और सरप्रीत ने इसे अपने नाम कर लिया.
इससे पहले ऑस्ट्रेलिया की ओर से खेलने वाले भारतीय मूल के खिलाड़ी निशान वेलुपिल्ले ने भी इस विश्व कप में पदार्पण किया था. उन्होंने तुर्किए के खिलाफ ऑस्ट्रेलिया की 2-0 की जीत में मैदान पर कदम रखा. हालांकि वह शुरुआती एकादश का हिस्सा नहीं थे और 60वें मिनट में बतौर स्थानापन्न खिलाड़ी उतरे.
सरप्रीत की कहानी भी खास है. उन्होंने 2017 और 2019 फीफा अंडर-20 विश्व कप में न्यूजीलैंड का प्रतिनिधित्व किया था. क्लब फुटबॉल में भी उन्होंने यूरोप में अपना नाम बनाया और अब विश्व कप के सबसे बड़े मंच पर भारतीय जड़ों से जुड़ी अपनी पहचान को नई ऊंचाई दी है.
विश्व कप इतिहास में इससे पहले भारतीय मूल के सिर्फ एक खिलाड़ी को खेलने का मौका मिला था. फ्रांस के विकास दोरासू (Vikash Dhorasoo) ने 2006 विश्व कप में दो ग्रुप मैच खेले थे, लेकिन वह शुरुआती एकादश का हिस्सा नहीं थे.
अब इस टूर्नामेंट में भारतीय मूल के कुछ और खिलाड़ी इतिहास का हिस्सा बन सकते हैं. कांगो के सैमुअल मुतौसामी (Samuel Moutoussamy) और कतर के तमीम मोहम्मद जमील (Tameem Mohammed Jameel) को भी मैदान पर उतरने का मौका मिल सकता है.
सरप्रीत सिंह की यह कहानी सिर्फ एक फुटबॉलर की उपलब्धि नहीं है, बल्कि उस बदलती तस्वीर का हिस्सा है जहां भारतीय मूल की प्रतिभाएं दुनिया के सबसे बड़े खेल मंचों पर अपनी जगह बना रही हैं. विश्व कप में उनकी शुरुआती उपस्थिति यह संदेश देती है कि जड़ों से जुड़ी पहचान और वैश्विक सपने...दोनों साथ चल सकते हैं.
आजतक स्पोर्ट्स डेस्क