रात का आसमान फ्लडलाइट्स की सफेद आग में डूबा हुआ… स्टेडियम का शोर अब सामान्य भीड़ की आवाज नहीं लग रहा, बल्कि इतना तेज, दबाव वाला और आक्रामक कि ऐसा महसूस हो रहा जैसे पूरा माहौल मिलकर उस खिलाड़ी पर एक साथ 'हमला' कर रहा हो.
सामने विरोधी टीम का सबसे घातक स्पीड अटैक… रन-अप लेता है. और क्रीज पर खड़ा है- 15 साल का एक शांत-सा लड़का. तेज रफ्तार से गेंद हवा को चीरती हुई आती है. फिर बस एक पल बदलता है सब कुछ…
एक झटका…एक आवाज… धाऽऽऽक!
गेंद सीधा स्टेडियम की छत पर जाकर गिरती है. कॉमेंट्री बॉक्स में बैठे लोग अचानक खड़े हो जाते हैं.' यह बच्चा नहीं… आने वाले वक्त का यूनिवर्स बॉस है!'
आज वैभव सूर्यवंशी सिर्फ एक क्रिकेटर नहीं रह गया है. वह भारतीय क्रिकेट की सबसे रोमांचक कहानी बन चुका है. लेकिन उसकी कहानी IPL की चमकदार रोशनी में शुरू नहीं हुई थी. उसकी शुरुआत बिहार के समस्तीपुर जिले के ताजपुर की उन गलियों में हुई थी, जहां बड़े सपने देखना भी कभी-कभी विलासिता माना जाता है.
पिता का सपना… जो बेटे की आंखों में बस गया
वैभव की कहानी असल में उसके पिता संजीव सूर्यवंशी की कहानी है. संजीव खुद क्रिकेटर बनना चाहते थे.लेकिन जिस दौर में वह बड़े हो रहे थे, उस समय बिहार क्रिकेट व्यवस्था लगभग खत्म-सी थी. BCCI से ढांचा और पहचान नहीं होने की वजह से प्रतिभाएं अक्सर गांव-कस्बों में ही दम तोड़ देती थीं.
फिर भी संजीव ने हार नहीं मानी. वह मुंबई पहुंचे.दिल में क्रिकेट था, जेब में संघर्ष. मुंबई में उन्होंने शिपयार्ड में काम किया. डबल शिफ्ट में बाउंसर की नौकरी की. एक्टर बनने की कोशिश भी की.
...लेकिन जिंदगी ने हर मोड़ पर उन्हें रोका. आखिरकार वह बिहार लौट आए. फिर शादी हुई. कुछ साल बाद घर में एक बेटा पैदा हुआ- वैभव. संजीव कहते हैं कि उसी दिन उन्होंने तय कर लिया था- 'अब मेरा सपना मेरा बेटा पूरा करेगा.'
चार साल की उम्र… और बल्ला हाथ में
चार साल का बच्चा अक्सर खिलौनों से खेलता है. लेकिन वैभव के हाथ में उस उम्र में कश्मीर विलो का बल्ला था. ताजपुर के म्यूनिसिपल ग्राउंड पर उसकी क्रिकेट यात्रा शुरू हुई. यह वही मैदान था, जहां क्रिकेट से ज्यादा लोग वॉलीबॉल और 'लगोरी' खेलते थे, जिसे ग्रामीण क्षेत्रों में इसे 'पिट्ठो' के नाम से भी पुकारा जाता है.
कोच ब्रजेश झा ने जल्दी ही महसूस कर लिया कि यह लड़का अलग है. उसके अंदर गेंद को सिर्फ खेलने की नहीं, उस पर हावी होने की भूख थी. संजीव उसे रोज मैदान ले जाते. घंटों अभ्यास होता. धीरे-धीरे क्रिकेट वैभव की जिंदगी नहीं, उसकी दुनिया बन गया.
7 साल के वैभव को घर से 200 KM दूर बिहार और झारखंड के पुराने प्लेयर मनीष कुमार ओझा की एकेडमी में दाखिला मिला. सुबह 4 बजे उठना, तैयार होना...मां टिफिन पैक करती थीं- बाप-बेटे और कभी-कभी साथ में जाने वाले मुहल्ले के नेट बॉलर्स के लिए... और रोज सुबह 6 बजे गाड़ी निकलती थी. यह लगभग हर रोज की कहानी थी.
600 गेंदें रोज… तभी बना यह तूफान
वैभव की बल्लेबाजी जितनी विस्फोटक दिखती है, उसके पीछे उतनी ही क्रूर मेहनत छिपी है. उसने 10 साल के उम्र में ही रोज लगभग 600 गेंदें खेलने की आदत डाल ली थी. बिहार के पूर्व क्रिकेटर समर कादरी जब पहली बार उसे देखने पहुंचे, तो कुछ ही मिनटों में समझ गए कि यह साधारण प्रतिभा नहीं है. कादरी राजस्थान रॉयल्स से नेट बॉलर के तौर पर जुड़े हुए थे. उन्होंने यह खबर जुबिन भरूचा तक पहुंचाई.
वो ट्रायल… जिसने इतिहास बदल दिया
राजस्थान रॉयल्स के हाई-परफॉर्मेंस सेंटर में ट्रायल चल रहा था. 13 साल का वैभव नेट्स में उतरा. एक लेफ्ट आर्म स्विंग बॉलर को लगाया गया. जुबिन भरूचा को लगा- एक 'एज' लगेगा और यह बच्चा आउट हो जाएगा. हुआ क्या- पहली गेंद पर एक्स्ट्रा कवर के ऊपर छक्का. कोच हैरान रह गए.
... लेकिन असली इम्तिहान अभी बचा था. बच्चा ज्यादा परेशान न हो.. इसलिए बाकी के नेट्स खत्म होने का इंतजार किया. और फिर वैभव को कहा- अब बैटिंग करो.
कोच जुबिन भरूचा ने उसे चेतावनी दी -
'बॉल बहुत तेज आएगी.' वैभव मुस्कुराया- 'नो प्रॉब्लम, सर.'
फास्ट बॉलर्स को पूरी ताकत लगाने को कहा गया. विकेटकीपर 30 गज पीछे खड़ा था.
पहली कुछ गेंदें उसने आराम से छोड़ीं. फिर एक गेंद थोड़ी फुल आई और अगले ही पल… गेंद साइटस्क्रीन के ऊपर. स्पीड गन 150 kmph से ऊपर दिखा रही थी.
नेट्स के बाहर खड़े लोग एक-दूसरे को देखने लगे. जुबिन भरूचा समझ चुके थे- यह लड़का अलग है. कहते हैं, उसी वक्त उन्होंने राजस्थान रॉयल्स से कहा गया, 'ऑक्शन में इसके लिए कम से कम 10 करोड़ तैयार रखना.'
13 साल का लड़का… लगी तगड़ी बोली
फ्रेंचाइजी ने रिस्क लिया. 13 साल के लड़के पर दांव लगाया. 1.10 करोड़ रुपये में उसे खरीदा. IPL ऑक्शन में जब वैभव सूर्यवंशी का नाम आया, तो कई लोग चौंक गए. इतनी छोटी उम्र. इतना बड़ा दांव...लेकिन राजस्थान रॉयल्स ने अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगा दी. क्योंकि उन्हें सिर्फ एक खिलाड़ी नहीं दिख रहा था. उन्हें भविष्य दिख रहा था.
अब निशाने पर है ‘यूनिवर्स बॉस’ का रिकॉर्ड
आज वैभव सूर्यवंशी IPL में छक्कों की बारिश कर रहा है. मंगलवार (19 मई) तक 53 छक्के… यह आंकड़ा सिर्फ एक नंबर नहीं है. यह बताता है कि यह लड़का किस स्तर की बल्लेबाजी कर रहा है. क्रिस गेल ने 2012 IPL में 59 छक्के लगाए थे. तब वह 32 साल के थे और दुनिया उन्हें 'यूनिवर्स बॉस' कहती थी. लेकिन सिर्फ 15 साल का लड़का उस रिकॉर्ड की तरफ बढ़ रहा हैं.
उसकी बल्लेबाजी में डर नहीं है. नाम का दबाव नहीं है. सिर्फ हमला है. और यही वजह है कि क्रिकेट फैन्स उसे अब 'बॉस बेबी' कहने लगे हैं.
ताजपुर अब बदल चुका है
जिस म्यूनिसिपल ग्राउंड पर कभी क्रिकेट मुश्किल से खेला जाता था, वहां अब बच्चों की लाइन लगती है. जिस एकेडमी में कभी गिने-चुने खिलाड़ी आते थे, वहां अब 4 से 7 साल के बच्चों के लिए स्पेशल बैच शुरू हो चुके हैं.
हर बच्चा छक्का मारना चाहता है. हर बच्चा वैभव बनना चाहता है. और शायद यही किसी खिलाड़ी की सबसे बड़ी सफलता होती है-
जब वह आंकड़ों से आगे बढ़कर उम्मीद बन जाए. वैभव सिर्फ क्रिकेटर नहीं… एक कहानी है
क्रिकेट में रिकॉर्ड टूटते रहेंगे. नए सितारे आते रहेंगे. लेकिन वैभव सूर्यवंशी की कहानी शायद हमेशा अलग रहेगी. क्योंकि यह कहानी सिर्फ एक बल्लेबाज की नहीं है. यह कहानी है- एक पिता के अधूरे सपने की, एक छोटे शहर की जिद की. एक बच्चे की निडरता की.
और शायद इसीलिए जब वैभव बल्ला उठाता है, तो सिर्फ गेंद स्टेडियम के बाहर नहीं जाती… उसके साथ छोटे शहरों के करोड़ों सपने भी उड़ान भरते हैं.
विश्व मोहन मिश्र