Sri Sorakayala Swamy Temple: अगर आप इस बार आंध्र प्रदेश के तिरुपति घूमने का प्लान कर रहे हैं तो श्री सोराकायला स्वामी मंदिर आपकी लिस्ट में शामिल जरूर होना चाहिए. भीड़-भाड़ वाले प्रसिद्ध मंदिरों से हटकर यह जगह आपको सुकून और सादगी का एहसास कराएगी. यहां की सबसे खास बात है भगवान को चढ़ाई जाने वाली लौकी, जो इस मंदिर को बाकी मंदिरों से बिल्कुल अलग बनाती है. साथ ही, इस मंदिर के आसपास की खूबसूरत जगह आपको एक परफेक्ट ऑफबीट ट्रैवल डेस्टिनेशन का भी एक्सपीरियंस कराएगी. तो चलिए जानते हैं इस मंदिर की मान्यता और आसपास घूमने वाली जगहों के बारे में.
संत की कहानी और लौकी की परंपरा
आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में पुत्तूर के पास नारायणवरम नाम की जगह पर स्थित श्री सोराकायला स्वामी मंदिर अपनी अलग पहचान के लिए जाना जाता है. मान्यता है कि यहां भगवान अवदूत रूप में धरती पर विराजमान हैं, जिनकी पूजा-उपासना श्री सोराकाया स्वामी के रूप में की जाती है. कहा जाता है कि श्री सोराकाया स्वामी का जन्म करीब 1875 के आसपास हुआ था. वे नारायणवरम के एक संत थे, जो देखने में बेहद साधारण और सरल थे. लेकिन, उनके पास गहरा ज्ञान था. लोगों का मानना है कि उन्होंने कई बीमारियों को ठीक किया था और जरूरतमंदों की मदद की थी.
ऐसे भी लोगों की मान्यता है कि स्वामी जी नीम के पत्ते, हल्दी और जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करके लोगों के जीवन से नकारात्मकता और बुरी शक्तियों का असर दूर करते थे. उनकी पहचान एक ऐसे संत की थी, जिनके पास चमत्कारी शक्ति और जो लोगों के दुख दूर करते थे. वहीं, लोग स्वामी जी को प्रसाद के रूप में लौकी भी चढ़ाते हैं क्योंकि यह परंपरा उन्हीं के जीवन से जुड़ी हुई है. बताया जाता है कि स्वामी जी जहां भी जाते थे, अपने साथ एक लौकी जरूर रखते थे. उनका जीवन बेहद सादा और सेवा से भरा हुआ था. वे अपने लिए नहीं, बल्कि गरीब और जरूरतमंद लोगों के लिए भिक्षा मांगते थे. इस साधारण सी लौकी को उन्होंने अपने तपस्वी जीवन का हिस्सा बना लिया था.
समय के साथ श्रद्धालुओं ने भी उनके इसी त्याग और सादगी को याद करते हुए मंदिर में लौकी चढ़ाना शुरू कर दिया. आज मंदिर की छतों पर लटकी हुई और दीवारों व रेलिंग पर बंधी लौकियां यहां की सबसे बड़ी व खास पहचान बन चुकी हैं. यहां का नजारा साफ बताता है कि सच्ची आस्था के लिए महंगे चढ़ावे से नहीं, बल्कि सच्चे मन से होती है.
श्री सोराकायला स्वामी मंदिर की मान्यता
मान्यता है कि इस मंदिर के दर्शन करने से शरीर और मन की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है. यही वजह है कि यह जगह सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और सुकून पाने का एक खास ठिकाना भी मानी जाती है. दरअसल, 'सोरकाया' तेलुगु भाषा में लौकी को कहते हैं. समय के साथ श्रद्धालु भी उनके त्याग, दया और आध्यात्मिक शक्ति को याद करते हुए यहां लौकी चढ़ाने लगे.
कैसे पहुंचें और क्यों है खास?
अगर आप यहां जाना चाहें, तो यह मंदिर तिरुपति से करीब 38 किलोमीटर दूर है. बेंगलुरु से इसकी दूरी लगभग 250 किलोमीटर और हैदराबाद से करीब 585 किलोमीटर है. सबसे नजदीकी शहर पुत्तूर है, जो यहां से सिर्फ 4 से 5 किलोमीटर दूर पड़ता है. यहां पहुंचने के लिए सबसे पहले तिरुपति जाना सबसे आसान रहता है, जहां से आप बस, ट्रेन या फ्लाइट से पहुंच सकते हैं. तिरुपति से नारायणवरम तक सड़क मार्ग से बस या टैक्सी आसानी से मिल जाती है.
श्री सोराकायला स्वामी मंदिर के आसपास घूमने की जगह
श्री सोराकायला स्वामी मंदिर के आसपास भी कई ऐसी जगहें हैं, जहां आप घूम सकते हैं. जैसे तिरुपति बालाजी मंदिर (तिरुमला), श्री पद्मावती अम्मावारी मंदिर, चंद्रगिरी किला, तलाकोना वॉटरफॉल, श्री कालहस्ती मंदिर
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