हिंदू धर्म में पूर्णिमा तिथि का विशेष महत्व बताया गया है. यह दिन भगवान विष्णु, चंद्र देव और पितरों की पूजा के लिए खास बताया गया है. मान्यता है कि ज्येष्ठ पूर्णिमा पर विधिवत पूजा से जीवन में सुख-शांति आती है और कुंडली के ग्रह दोषों का प्रभाव कम हो जाता है. इसमें भी अधिक पूर्णिमा का महत्व ज्यादा है, क्योंकि यह दुर्लभ संयोग तीन साल में एक बार ही बनता है. आइए जानते हैं कि इस बार ज्येष्ठ पूर्णिमा कब है और इस दिन पूजा की विधि क्या है.
ज्येष्ठ पूर्णिमा का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन चंद्रमा अपनी सभी 16 कलाओं से परिपूर्ण रहता है. इसे ऊर्जा और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक माना जाता है. कहते हैं कि इस दिन चंद्रमा को अर्घ्य देने से मानसिक शांति और पारिवारिक सुख-शांति का वरदान पाया जा सकता है. साथ ही, ज्येष्ठ अधिक पूर्णिमा पर भगवान विष्णु की पूजा से मनोवांछित फल की प्राप्ति की जा सकती है.
कब है ज्येष्ठ अधिक पूर्णिमा?
हिंदू पंचांग के अनुसार, पूर्णिमा तिथि 30 मई को सुबह 11.57 बजे से लेकर 31 मई को दोपहर 2.14 बजे तक रहने वाली है. ज्येष्ठ अधिक पूर्णिमा इस वर्ष 31 मई दिन रविवार को मनाई जाएगी.
स्नान-दान के शुभ मुहूर्त
ब्रह्म मुहूर्त- सुबह 4:34 बजे से सुबह 5:17 बजे तक
अभिजीत मुहूर्त- दोपहर 12:10 बजे से दोपहर 1:03 बजे तक
विजय मुहूर्त- दोपहर 2:48 बजे से दोपहर 3:41 बजे तक
कैसे करें ज्येष्ठ पूर्णिमा की पूजा?
अधिक ज्येष्ठ पूर्णिमा पर सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें. इसके बाद एक चौकी पर भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें. गंगाजल से अभिषेक करें और पीले रंग के फूल भगवान को अर्पित करें. भगवान के सामने एक घी का दीपक प्रज्वलित करें. भगवान को तुलसी का पत्ता डालकर खीर का भोग जरूर लगाएं. आप चाहें तो पीले रंग का भोग या पीली मिठाई भी भगवान को भोग के रूप में अर्पित कर सकते हैं. आखिर में विष्णु जी के मंत्रों का जाप करें.
चंद्रमा और पितृ पूजन का महत्व
ज्येष्ठ अधिक पूर्णिमा पर रात के समय चंद्रमा की पूजा करें. कच्चे दूध से अर्घ्य देकर चंद्रमा को प्रसन्न करें और सुख-समृद्धि की कामना करें. इस दिन दोपहर के समय पितरों की पूजा का भी विशेष महत्व बताया गया है. धार्मिक मान्यताओं में दक्षिण दिशा को पितरों की दिशा माना गया है. इस दिशा में पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करें. कहते हैं कि इससे पितरों का आशीर्वाद हमारे ऊपर बना रहता है.
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