औरंगज़ेब की कब्र का मुद्दा क्यों बाबरी मस्जिद से भी खतरनाक रूप ले सकता है?

औरंगजेब, याकूब मेनन, अफजल गुरु, सालार गाजी जैसे लोगों से मुस्लिम समुदाय का एक तबका जितना अपनापन दिखाएगा उतना ही देश में सांप्रदायिक एकता को खतरा पैदा होगा. जाहिर है कि इसका लाभ उठाने के लिए देश की सियासी पार्टियां इसे जहां तक संभव होगा, खींच तानकर लंबा करेंगी.

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औरंगजेब की कब्र का मुद्दा अभी और गहराएगा. औरंगजेब की कब्र का मुद्दा अभी और गहराएगा.

संयम श्रीवास्तव

  • नई दिल्ली,
  • 18 मार्च 2025,
  • अपडेटेड 3:11 PM IST

महाराष्ट्र में औरंगजेब की कब्र को लेकर सियासत गरमा गई है. हिंदू संगठनों ने महाराष्ट्र सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर सरकार द्वारा कब्र को नहीं हटाया जाएगा तो हम अयोध्या बाबरी मस्जिद की तरह खुद हटा देंगे. इसके बाद से छत्रपति संभाजी नगर में स्थित औरंगजेब की कब्र की सुरक्षा बढ़ा दी गई और बड़ी संख्या में पुलिस बलों की तैनाती कर दी गई.औरंगजेब की कब्र को लेकर माहौल बहुत कुछ उस तरह ही गर्म हो रहा है जिस तरह राम जन्मभूमि को लेकर शुरू हुई कार सेवा शुरू होने के पहले यूपी के कई शहरों में दंगे शुरू हो गए थे. सोमवार को नागपुर के महाल में दो गुटों के बीच विवाद के बाद हिंसा भड़क गई थी. महाल के बाद देर रात हंसपुरी में भी हिंसा हुई. अज्ञात लोगों ने दुकानों में तोड़फोड़ की और वाहनों में आग लगा दी. इस दौरान जमकर पथराव भी हुआ. हिंसा के बाद कई इलाकों में कर्फ्यू लगा दिया गया है. हिंसक भीड़ के हमले में 25 से 30 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं. सोमवार को कब्र की आग यूपी तक पहुंच गई है. श्री कृष्ण जन्मभूमि संघर्ष न्यास ने मुगल शासक औरंगजेब की कब्र पर बुलडोजर चलाने वाले को 21 लाख रुपए इनाम के तौर पर देने का ऐलान किया है. उन्होनें कहा ऐसी कब्र हिंदुस्तान में नहीं होनी चाहिए. अगर किसी को कब्र की जरूरत है तो पाकिस्तान ले जाए. जाहिर है कि कब्र की आग अभी और फैलेगी. बाबरी मस्जिद से भी यह मामला गंभीर होता जा रहा है. आइए देखते हैं कि ऐसा क्यों है?

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1-अफजल खान और याकूब मेमन तक की कब्र का सौंदर्यीकरण कौन करवाता है?

भारत में औरंगजेब की कब्र क्यों मुद्दा बन रहा है इस सवाल का उत्तर समझने के लिए हमें भारतीय मुस्लिम समुदाय के एक तबके की भावनाओं को समझना होगा. जर्मनी में हिटलर को आज कौन याद करता है. उसकी कब्र पर कौन फूल चढ़ाने जाता है? जर्मनी की कोई घोर दक्षिणपंथी पार्टी भी हिटलर को याद नहीं करना चाहती. कोई अपने बच्चों का नाम हिटलर नहीं रखता है. पर भारत में अलग मामला है. तैमूर लंग ने दिल्ली ने भयंकर लूटपाट की. उसने लूट पाट करते हुए यह नहीं देखा कि हिंदू मुसलमान में भेद भाव नहीं किया. मगर आज की तारीख में लोग तैमूर को नाम पर अपने बच्चे का नामकरण करते हैं. औरंगजेब और बाबर सबसे पसंदीदा नाम में से एक है. अफजल खान जिसे शिवाजी ने अपने बघनखे से मार गिराया था. उसकी कब्र को अभी पिछले 20 सालों में स्थानीय मुस्लिमों ने सजा सवांरकर मस्जिद का रूप देने की कोशिश की. मुंबई बमकांड के आरोपी याकूब मेनन की कब्र को स्थानीय मुस्लिम समुदाय द्वारा सजाया संवारा गया. तब स्थानीय मुस्लिम जनता अगर विरोध के लिए आगे आई होती तो जाहिर है कि उसे सांप्रदायिक एकता का मिसाल माना जाता. 

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2-ईसाई समुदाय से सीखने की जरूरत

पत्रकार और राजनीतिक विचारक दिलीप मंडल लिखते हैं कि भारतीय ईसाई कभी डायर, डलहौज़ी या क्लाइव की कब्र पर फूल या चादर नहीं चढ़ाते. समस्या इसलिए है क्योंकि कुछ लोग मजहब को राष्ट्र के ऊपर मानते हैं. औरंगजेब उनका हीरो है. दिलीप मंडल की बातों से सहमत हुआ जा सकता है. हालांकि डलहौजी और क्लाइव की कब्र भारत में नहीं है. पर भारत लॉर्ड कॉर्नवालिस, लॉर्ड एल्गिन, लॉर्ड मेयो सहित बहुत से वायसरॉय और गवर्नर जनरलों की कब्र भारत में धूल फांक रही हैं. कभी उन पर कोई मोमबत्ती लेकर भी नहीं पहुंचता है. इंग्‍लैंड में भी डायर और डलहौजी के प्रति बहुत सम्मान की भावना नहीं दिखाई जाती है.

मगर भारत में मुस्लिम समुदाय के बीच आतंकी बुरहान वानी और अफजल गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा दिखाई जाती है.अमेरिका में ओसामा बिन लादेन की कब्र हो या स्मारक की मांग तो छोड़िए किसी की इतनी हिम्मत नहीं है कि उसके नाम का फातिहा भी पढ़ ले. पर भारत में तुष्टिकरण की राजनीति के चलते उदारवादियों का पूरा गिरोह आतंकवादियों तक के लिए सम्मान दिखाने लगता है. यही कारण है कि कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह को ओसामा जी और हाफिज सईद जी बोलना पड़ जाता है. 

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3-क्यों मिले नेजा मेले को मंजूरी?

भारत ही एक ऐसा देश है जो 17 बार आक्रमण करने लाले महमूद गजनी के भांजे हत्यारे सालार मसूद गाजी के सम्मान में हर साल मुस्लिम समुदाय संभल में मेले का आयोजन करता रहा है. जब संभल में माहौल इतना खराब है कि होली पर रंग से मस्जिद न गंदी हो जाए इसलिए तिरपाल से ढंकी जाती है. पर स्थानीय समुदाय की डिमांड है कि सालार गाजी की याद में नेजा मेला हर साल की तरह इस साल भी मनाई जाए. स्थानीय हिंदुओं का कहना है कि सालार गाजी एक लुटेरा था. वो महमूद गजनी का सेनापति था, जिसने सोमनाथ मंदिर को लूटा था. सालार गाजी ने पूरे देश में कत्लेआम किया था, जिसे राजा सुहेलदेव ने मार डाला था. इसके ही आधार पर एडिश्नल एएसपी श्रीश चंद्र कह रहे हैं कि मेला नहीं लगेगा.'लुटेरे की याद में बिल्कुल मेला नहीं लगेगा. अगर लगा तो आप राष्ट्रद्रोही हैं. अगर इस देश के हैं, तो ऐसी इजाजत नहीं मांगेंगे. आप ही कह रहे हैं कि सोमनाथ को लूटा था, तो ऐसे आदमी की याद में आप कार्यक्रम क्‍यों कर रहे हैं. बिल्कुल नहीं होगा, बिल्कुल नहीं होगा... फिर भी आपको लगता है कि नेजा मेला लगाना है, तो पहले जाकर एप्लिकेशन दीजिएगा.' . जाहिर है कि सांप्रादायिक सौहार्द की बात ऐसे कैसे हल होगी? एक तरफ हम कहेंगे कि होली के रंग से हमको दिक्कत है दूसरी तरफ हम चाहेंगे कि विदेशी आक्रांताओं की याद में मेला भी हम मना लें. 

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4-बाबरी मस्जिद से तुलना तो होगी ही

बाबरी मस्जिद से औरंगजेब की तुलना तो होगी ही. औरंगजेब के हाथ भारत में कई महान गुरुओं और राजाओं के खून से रंगे हुए हैं. वही औरंगजेब जिसने अपने पिता और भाइयों की हत्याकर गद्दी हथियाई. औरंगजेब को कोई संत या फकीर नहीं था कि उसकी कब्र पर फातिहा पढ़ने की मजबूरी हो. औरंगजेब का नाम हिंदुओं के मंदिर तोड़ने और हिंदू तीर्थ पर जजिया कर लगाने के लिए ही जाना जाता है. हिंदुओं के साथ सौहार्द दिखाने के लिए मुस्लिम समुदाय को ऐसे आतताइयों से दूरी बनानी ही चाहिए. आखिर गाजा में जब इजरायल अत्याचार करता है तो लाखों हिंदू इजरायल की कार्रवाई की निंदा करते हैं. औरंगजेब, याकूब मेनन, अफजल गुरु, सालार गाजी जैसे लोगों से समुदाय जितना अपनापन दिखाएगा उतना ही इस मुद्दे पर सियासत करने वालों के लिए खाद पानी मिलता जाएगा.

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