सीएम चुनने का क्या है मोदी-शाह फॉर्मूला, आज बीजेपी में सिर्फ एक पॉइंट पर होता है फैसला

बीजेपी में नेताओं को अब समझ लेना चाहिए कि पॉलिटकल शो बाजी की जगह कार्यकर्ता की तरह काम करने में ही भलाई है. नेता बने, समझो निबटे. कुर्सी के लिए इमेज ब्रैंडिंग करने की जरूरत नहीं है.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह

संयम श्रीवास्तव

  • नई दिल्ली,
  • 12 दिसंबर 2023,
  • अपडेटेड 5:44 PM IST

छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में सीएम का फैसला हो चुका है. जिस तरह सीएम के नए नाम सामने आए हैं उसके बाद राजनीतिक हलकों में बीजेपी के मोदी-शाह युग की कार्यशैली पर खूब चर्चा हो रही है.जाहिर है कि विरोधी बीजेपी का मजे ले रहे हैं कि मध्यप्रदेश में किस तरह जनभावनाओं का निरादर किया गया है. लोगों का कहना है कि शिवराज चौहान मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री बनने के असली हकदार थे. उन्हें जानबूझकर किनारे लगाया गया है.

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पर बीजेपी ऐसी आलोचनाओं से दबाव में नहीं आती है. बीजेपी आज फैसले लेने में किसी भी तरह का प्रेशर नहीं लेती है. आज फैसले का आधार सिर्फ एक और एक बिंदु पर होता है. उस एक बिंदु के इतर न कोई दोस्ती काम आती है न किसी भी शख्स का शक्ति प्रदर्शन. आज की बीजेपी में फैसले का आधार सिर्फ पार्टी हित है. पार्टी हित का मतलब आगे आने वालों चुनावों में किसी फैसले से कितना जनसमर्थन बढेगा ? अगर कोई इस कसौटी पर खरा उतरता है तो फिर उसके नाम पर दाग भी उजले हो जाते हैं. आइये देखते हैं किस तरह आज पार्टी हित के आगे सब कुछ बेमानी है.

बड़े नेता नहीं, गुपचाप काम करने वाले जमीनी कार्यकर्ता की जय

बीजेपी में नेताओं को अब समझ लेना चाहिए कि पॉलिटकल शो के बजाय कार्यकर्ता की तरह काम करने वालों को ही कुर्सी मिलेगी. पीआर एजेंसी हायर कर या इमेज ब्रैंडिंग करने वाली कंपनियों पर पैसा खर्च करने की बेवकूफी करने की जरूरत नहीं है. पार्टी आलाकमान के समानांतर अपनी अलग इमेज चमकाने की कोशिश करके आप अपना नुकसान कर सकते हैं. हरियाणा के सीएम मनोहर लाल खट्टर, झारखंड के पूर्व सीएम रघुबर दास, बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम ताराकिशोर प्रसाद और उमा देवी आदि को कोई जानता नहीं था. इन्हें पार्टी ने इनके जमीनी स्तर के कार्य और उनकी जाति के समीकरण के आधार पर जिम्मेदारी सौंप दी.शिवराज सिंह चौहान भले नेता थे पर उनको भी गुमान हो गया था कि उनकी लाडली बहना योजना के चलते बीजेपी राज्य में सत्ता में आई है. जैसा कि मध्यप्रदेश के ही कद्दावर बीजेपी नेता कैलाश विजय वर्गीय ने कहा था कि छिंदवाड़ा में क्यों नही लाडली बहना को वोट मिला ? छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी तो लाडली बहना योजना नहीं था फिर भी बीजेपी वहां भारी बहुमत कैसे जीत कर आई.

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जातिगत समीकरण सबसे ऊपर, जो फिट बैठा उसकी किस्‍मत चमकी

भारतीय जनता पार्टी में अब महत्वपूर्ण पोस्टों का सबसे खास आधार जातिगत समीकरण हैं. जिसकी जितनी आबादी-उसकी उतनी हिस्सेदारी की बात तो विपक्ष करता रहा है पर उसे सही तरीके से लागू बीजेपी ने ही किया है. मनोहर लाल खट्टर हरियाणा में बने हुए हैं क्योंकि वो पंजाबी हैं. हरियाणा में जाटों के बाद सबसे अधिक संख्या में पंजाबी ही हैं. यूपी में योगी आदित्यनाथ की कोई जाति नहीं है. वे संत हैं इसलिए सभी जातियों के प्रिय हैं. हालांकि पूर्वी यूपी में उनको एक राजपूत नेता के चश्मे से ही देखा जाता है. पर पश्चिम में बिल्कुल ऐसा नहीं है. यूपी के दोनों डिप्टी सीएम में एक ब्राह्मण और एक ओबीसी को जगह दी गई है.

मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के सीएम और डिप्टी सीएम के नाम खास जातियों को ध्यान में रखकर घोषित किए गए हैं. अगर आपकी जाति चुनावी राजनीति में फिट नहीं बैठती तो आप चाहे पीएम नरेंद्र मोदी या गृहमंत्री अमित शाह के भी खास हों आपको कोई की पोस्ट नहीं मिल सकता है. यहां तक कि राज्यपाल , उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति के पदों पर भी बीजेपी उसी की नियुक्ति कर रही है जिनके चेहरे को दिखाकर भविष्य में वोट लेना है. आपने देखा होगा कि पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, वर्तमान राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू की नियुक्ति यही सोचकर की गई थी. रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाकर यूपी के विधानसभा चुनावों में दलित वोट साधने थे. इसी तरह मुर्मू को रा्ष्ट्रपति बनाकर मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ आदि में जनजातियों के बीच पैठ बनानी थी.जिसमें बीजेपी कामयाब भी हुई है. जगदीप धनखड़ को उपराष्ट्रपति बनाने के पीछे राजस्थान और हरियाणा -पश्चिमी यूपी के जाटों के बीच पैठ बनाना था.

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कितने ही नेता मोदी और शाह के बहुत खास हैं पर जातिगत रूप से फिट न होने के चलते आज भी भटक रहे हैं. ओम माथुर को ही देख लें. शाह और मोदी दोनों के बहुत खास हैं. और उन्होंने अपनी काबिलियत कई राज्यों में बीजेपी को चुनाव जिताकर दिखाई भी है पर उनकी जाति कायस्थ होने के चलते उनकी ताजपोशी नहीं हो रही है. कायस्थ लोग किसी भी राज्य में इतनी संख्या में नहीं है कि किसी की जीत या हार का कारण बन सके. 

सीएम ताकतवर नहीं चाहिए, मोदी-शाह ही काफी हैं

एक कहावत है कि ज्यादा जोगी मठ उजाड़. कांग्रेस पार्टी में जब तक इंदिरा गांधी का युग रहा है सारी शक्तियां एक जगह केंद्रित रही. किसी भी गुट को सर उठाने की इजाजत नहीं थी. इंदिरा गांधी के बाद कुछ हद राजीव गांधी और सोनिया गांधी के सक्रिय रहने तक ऐसा ही रहा. पर राहुल और प्रियंका के युग में कांग्रेस में किसी की नहीं चल रही है. यही कारण है जीते हुए राज्य कांग्रेस के हाथ से निकल गए. मध्यप्रदेश और गोवा में पिछला विधानसभा चुनाव जीतकर भी कांग्रेस सरकार नहीं बना सकी. राजस्थान और पंजाब में कांग्रेस इतनी मजबूत स्थित में थी कि वो फिर से सत्ता में आ सकती थी पर दोनों राज्यों में कांग्रेस की अंदरूनी कलह को खत्म नहीं किया जा सका. इसलिए कभी कभी लोकतंत्र में भी सीमित रूप से अधिनायक तंत्र बहुत फायदेमंद हो जाता है. यही कारण है कि इंदिरा युग और मोदी युग को भारत के सबसे मजबूत दौर के रूप में माना जाता है. बीजेपी में आज पार्टी आलाकमान की ओर से एक लकीर खींची जाती है जिसका पालन हर हाल में सुनिश्चित होता है. पार्टी की सफलता दर सफलता का यही कारण है.

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खेमेबाजों की खैर नहीं, डिप्‍टी सीएम का पद भी नहीं

जिन लोगों ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में बीजेपी की दूसरी बार बनी सरकार का दौर देखा होगा उन्हें याद होगा कि अंदरूनी लड़ाने ने पार्टी को किस कदर कमजोर कर दिया. अटल-आडवाणी युग में यूपी में जब दूसरी बार पार्टी की सरकार बनी तो राज्य में करीब आधा दर्जन गुट बन गए थे.पार्टी के भीतर कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह, कलराज मिश्रा, लालजी टंडन आदि के कई गुट खड़े हो गए थे. लड़ाई इस स्तर तक पहुंच गई थी कि एक दूसरे के खिलाफ अफवाहें उड़वाना, खबरें लीक करवाना और आलाकमान तक कानाफूसी आम बात हो गई थी. कहा जाता है कि विपक्ष के नेताओं का भी आपसी लड़ाई में इस्तेमाल किया गया. इन गुटबंदियों का ही हाल रहा कि यूपी में 17 साल तक पार्टी सत्ता से बाहर रही.

जिस तरह की गुटबंदी राजस्थान बीजेपी में थी, उसके चलते यहां भी कभी बीजेपी की सरकार नहीं बन पाती. पर पिछले 3 सालों से धीरे-धीरे पार्टी के सभी गुटों को खत्म कर दिया गया. किसी को राज्यपाल बना दिया गया तो किसी को कोई पद नहीं दिया गया . बेहद पीछे रहने वाले लोगों को खास पद दिए गए. इस तरह राजस्थान में लगातार प्रयास के बाद गुटबंदी को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया. जिसका नतीज चुनावों में देखने को मिला है.मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में हुई नियुक्तियां ये बताती हैं कि खेमेबाजों को डिप्टी सीएम का पद भी नहीं मिलने वाला है.

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