यूपी में ब्राह्मणों को रि‍झाने की रेस, फिर शुरू हुआ सोशल इंजीन‍ियर‍िंग प्रोजेक्‍ट

2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यूपी में ब्राह्मण वोट बैंक को साधने की कोशिशें तेज हो गई हैं. कोई खुलकर ब्राह्मण वोटर को संबोधित कर रहा है, तो कोई दबी जुबान से. या फिर खामोशी भी अख्तियार की जा रही है - लेकिन ओमप्रकाश राजभर ने आजमगढ़ में रैली कर इरादा तो जाहिर कर ही दिया है.

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आजमगढ़ रैली में ब्राह्मणों से आशीर्वाद लेते सुभासपा सुप्रीमो ओम प्रकाश राजभर, जहां ब्राह्मण समाज के लिए अलग से मंच बनाया गया था. (Photo: x.com/SBSP4INDIA) आजमगढ़ रैली में ब्राह्मणों से आशीर्वाद लेते सुभासपा सुप्रीमो ओम प्रकाश राजभर, जहां ब्राह्मण समाज के लिए अलग से मंच बनाया गया था. (Photo: x.com/SBSP4INDIA)

मृगांक शेखर

  • नई दिल्ली,
  • 24 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 12:49 PM IST

बीस साल बाद, बहुत कुछ बदल जाता है. लेकिन, निरंतरता हमेशा ही बेहतर नतीजे देती है. बशर्ते, हकीकत भी सतत प्रयासों को बराबर सपोर्ट कर रही हो - 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर सोशल इंजीनियरिंग के तमाम प्रयोग हो रहे हैं. 

बीएसपी नेता मायावती के सोशल इंजीनियरिंग के सफल प्रयोग के 19 साल बाद फिर से वैसी ही कोशिशें हो रही हैं. सोशल इंजीन‍ियर‍िंग 2.0 प्रोजेक्‍ट में कॉमन फैक्टर 'ब्राह्मण वोटर' है, लेकिन नए दौर में 'दलित वोटर' को 'ओबीसी वोटर' से रिप्लेस करने की कवायद चल पड़ी है.  

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अबकी बार मायावती ही नहीं, सोशल इंजीनियरिंग पर अखिलेश यादव ने भी दांव खेला है. लेकिन, इस प्रोजेक्ट में ताजा ताजा एंट्री हुई है सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी की. जिसके नेता ओम प्रकाश राजभर ने आजमगढ़ में बड़ी रैली की है, जिसमें 10 हजार ब्राह्मणों को बुलाया गया था - और ब्राह्मण समाज के सम्मान में खूब कसीदे पढ़े गए. नारे भी वैसे ही लगे - जय सुहेलदेव, जय परशुराम! ध्यान देने वाली बात ये है कि इस पर भी राजभर के निशाने पर समाजवादी पार्टी ही है.

'घूसखोर पंडत' से लेकर UGC के नए नियमों तक, और यूपी में ब्राह्मण बनाम ठाकुर की राजनीति को ध्यान से देखें तो हर मामले में ओमप्रकाश राजभर के सामाजिक समरसता महारैली की झलक दिखाई देती है - मतलब, आने वाले चुनाव के लिए हर लेवल पर सोशल इंजीन‍ियर‍िंग 2.0 प्रोजेक्‍ट शुरू हो चुका है. 

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ओमप्रकाश राजभर और ब्राह्मण वोट बैंक

ब्राह्मण वोट बैंक को लेकर सोशल इंजीनियरिंग का यह प्रयोग काफी जोखिमभरा भी है. मायावती और बीएसपी का गिरता जनाधार मिसाल है. मायावती ने 2007 के बाद वैसे कई प्रयोग किए. दलित-मुस्लिम गठजोड़ की कवायद फेल हुई, तो फिर से दलित-ब्राह्मण कॉम्बो आजमाने की कोशिश हुई. गुजरते वक्त के साथ बीएसपी के कई साथी मायावती से दूर जा चुके थे, लेकिन प्रयोग के नोडल अफसर बीएसपी महासचिव सतीशचंद्र मिश्रा ही थे - और 2022 में मायावती यूपी में एक विधानसभा सीट पर सिमट कर रह गईं. 

ऐसे दौर में जबकि यूपी में, सत्ताधारी बीजेपी के भीतर भी, ब्राह्मण बनाम ठाकुर की जंग चल रही है, ओमप्रकाश राजभर ने अलग बीड़ा उठाया है. और, ओबीसी-ब्राह्मण गठजोड़ की नींव उस आजमगढ़ में रखी है, जहां समाजवादी पार्टी का दबदबा है. वही समाजवादी पार्टी जिसकी PDA सोशल इंजीनियरिंग ने बीजेपी को लोकसभा चुनाव 2024 में पछाड़ दिया था. 

महारैली करके ओमप्रकाश राजभर कह रहे हैं कि आने वाले चुनाव में आजमगढ़ की सभी 10 सीटें एनडीए के पास आ जाएंगी. फिलहाल आजमगढ़ के सभी 10 विधायक समाजवादी पार्टी के हैं. मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव को सांसद बना चुके आजमगढ़ के लोगों ने समाजवादी पार्टी के धर्मेंद्र यादव को संसद भेजा है. और, जिले की दूसरी लालगंज सीट पर भी समाजवादी पार्टी का ही कब्जा है. 

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आजमगढ़ रैली में ओमप्रकाश राजभर ने दावा किया, 2027 के विधानसभा चुनाव का शंखनाद आज आजमगढ़ से हो गया है... ब्राह्मणों के साथ समाज के बड़ी संख्या में लोग भी आए हैं... यहां सपा के ही लोग जीतने का काम करते थे, लेकिन यह भीड़ सपा को हराने का काम करेगी.

ब्राह्मण वर्ग को लुभाने के मकसद से ओमप्रकाश राजभर ने मुख्य तौर पर तीन बातें की - 

1. 'ब्राह्मण वर्ग प्रबुद्ध वर्ग है... वह दिशा देता है... भटके हुए को रास्ता दिखाता है... उनकी देन है, जो आज कार्यक्रम में सफलता मिली है.'

2. 'मैं शुरू से कह रहा था कि यूजीसी गाइडलाइंस में कोई गलती है... गृह मंत्री ने भी कहा कि हम टीम बना देते हैं... 15 दिन में समीक्षा करके हम संशोधन कर देंगे... तो हमने कहा, अगर सरकार पर भरोसा नहीं है तो सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाइए.'

3. 'लोग सुप्रीम कोर्ट गए... अब 19 मार्च तक का स्टे मिल गया... तो यह बात तो निश्चित है कि किसी को कहीं भी न्याय मिले न मिले, लेकिन सुप्रीम कोर्ट से न्याय मिलता है.'

और बीच-बीच में नारा लगता है, 'जय सुहेलदेव, जय परशुराम!'

यूपी पॉलिटिक्स और ब्राह्मण फैक्टर

उत्तर प्रदेश में बीजेपी की कोशिश है, कैसे भी समाजवादी पार्टी के पीडीए को फॉर्मूले को न्यूट्रलाइज किया जाए. बीजेपी की मदद के लिए ओमप्रकाश राजभर ने मोर्चा संभाल लिया है, और समाजवादी पार्टी के गढ़ आजमगढ़ पर धावा बोला है. सुना है महीने में करीब सात दिन आजमगढ़ में ही बिता रहे हैं. 2022 के विधानसभा चुनाव में ओम प्रकाश राजभर समाजवादी पार्टी के साथ ही थे, लेकिन जब पार्टी सत्ता हासिल करने में चूक गई, तो बीजेपी से जा मिले. 

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कुछ समय पहले बीजेपी के ब्राह्मण विधायकों ने एक बड़ी बैठक की थी. बैठक इतनी असरदार रही कि यूपी बीजेपी अध्यक्ष पंकज चौधरी को फटकार के साथ फरमान जारी करना पड़ा, आईंदे से ये सब हरगिज नहीं होना चाहिए. लेकिन, खेल जब शुरू हो चुका है तो रुकने वाला कहां? किसी न किसी रूप में हर रोज सामने आ रहा है. बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार रस्तोगी के इस्तीफे पर जो बवाल हुआ, सबने देखा ही है. 

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण आबादी करीब 12 फीसदी है, जो सवर्णों में सबसे ज्यादा है. सवर्ण आबादी 18-20 फीसदी मानी जाती है. करीब 8 फीसदी ठाकुरों की आबादी होने का अनुमान है. राजनीति की मुश्किल यह है कि ब्राह्मण कभी कभी ही जाति के आधार पर उम्मीदवार या पार्टी चुनता है. अक्सर अलग अलग वजहों से बंटा होता है - फिलहाल बटुकों के साथ दुर्व्यवहार का मामला भी तूल पकड़े हुए है, और नाराजगी दूर करने की कोशिश हो रही है. 

जाति के आधार पर राजनीति करने वाली पार्टियों और कई नेताओं की दुकान तो ब्राह्मणों को भला-बुरा बोलकर ही चलती आ रही थी, लेकिन अब वे भी काफी सजग नजर आ रहे हैं. पहले तो सभी वोट कांग्रेस को ही मिला करते थे. बाद में बीजेपी ब्राह्मण-बनिया पार्टी के रूप में समझी जाने लगी, लेकिन मायावती की सोशल इंजीनियरिंग ने साफ कर दिया था कि किसी एक को मुगालते में नहीं रहना चाहिए. 

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1. जैसे ओमप्रकाश राजभर ने रैली में ब्राह्मणों के लिए अलग मंच तैयार कर विशेष सम्मान देने की कोशिश की, यूपी के डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने लखनऊ में अपने आवास पर बटुकों को बुलाकर तिलक लगाया, पैर धोए, हाथ जोड़कर पूजा की और फूल बरसाए. लेकिन, सवाल खत्म नहीं हुए. सवाल उठा कि प्रयागराज में जिन बटुकों का अपमान हुआ, जिनकी शिखा खींची गई - उनके लिए क्या हुआ?

2. समाजवादी पार्टी ने यूपी विधानसभा में माता प्रसाद पांडेय को विपक्ष का नेता बनाया है. गोरखपुर के दिग्गज नेता रहे हरिशंकर तिवारी के परिवार से मिलने जाते हैं, तो अखिलेश यादव सोशल मीडिया पर मुलाकात की तस्वीर के साथ कैप्शन देते हैं - कुछ लोगों को ‘हाता नहीं भाता’. अखिलेश यादव के निशाने पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ होते हैं, जो गोरखपुर से ही आते हैं. 

3. बीएसपी नेता मायावती भी फिर से सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला आजमाने की कोशिश कर रही है. पिछले दिनों एक फिल्म ‘घोसखोर पंडत’ के नाम पर हुए विवाद में उन्होंने तत्काल हस्तक्षेप किया. दलितों की राजनीति करने वाले मायावती ने ब्राह्मणों के हक में आवाज बुलंद की. कहा कि ब्राह्मणों का अनादर बर्दाश्त नहीं होगा.

ब्राह्मणों को लेकर गरमाई इस सियासत में कांग्रेस की भूमिका दिलचस्प है. वह एक खामोशी सी अख्तियार किए हुए है. एक वजह तो राहुल गांधी की ओबीसी मुहिम लगती है, और दूसरी यूपी में समाजवादी पार्टी के साथ चुनावी गठबंधन. कांग्रेस अगड़ी जातियों के विरुद्ध अपनी राजनीति में इतना आगे निकल गई है कि अब उसका दोबारा ब्राह्मणों की ओर शायद सहज न लगे. हालांकि, एक दौर में कांग्रेस का ब्राह्मणों के बीच अच्छा खासा जनाधार रहा है. कौन जाने, यूपी चुनाव आते आते राहुल गांधी को एक बार फिर अपने जनेऊ की याद आ जाए.

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