दिल्ली में नरम, चेन्नई में सख्त: सीएम विजय का पीएम मोदी के साथ नया तालमेल

तमिलनाडु की राजनीति से 'कानफाड़ू' द्रविड़ नारों और बात-बात पर काले झंडे दिखाने का दौर क्या अब खत्म हो चुका है, मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के शुरुआती दो महीने तो कम से कम इसी ओर इशारा कर रहे हैं.

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सीएम विजय की शालीन कूटनीति ने बदला केंद्र-राज्य संबंध (Photo-ITG) सीएम विजय की शालीन कूटनीति ने बदला केंद्र-राज्य संबंध (Photo-ITG)

टीआर जवाहर

  • नई दिल्ली,
  • 03 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 3:30 PM IST

फोर्ट सेंट जॉर्ज का कैलेंडर हमें बताता है कि 10 मई 2026 को लगभग दो महीने बीत चुके हैं, जब तमिलनाडु की राजनीति में पिछले 6 दशकों का सबसे बड़ा और क्रांतिकारी बदलाव आया था. उन राजनीतिक पंडितों के लिए, जिन्हें उम्मीद थी कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने वाला नया चेहरा राज्य के प्रशासन को किसी हाई-बजट फिल्म के सेट की तरह चलाएगा, जहां धमाकेदार एंट्री सीन और गूंजते हुए लाउडस्पीकर होंगे उनके लिए शुरुआती दौर एक सूक्ष्म और शांत हैरान करने वाला अनुभव रहा है. यहां न तो किले की प्राचीर से कोई तीखे और जोशीले भाषण देखने को मिले हैं, न ही राष्ट्रीय बैठकों से कोई नाटकीय वॉकआउट हुआ है, और न ही किसी तरह की अपनी पीठ खुद थपथपाने की कोशिश की गई है.

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इसके बजाय, तमिलनाडु इस समय बेहद शालीन और व्यावहारिक कूटनीति का एक बेहतरीन उदाहरण देख रहा है. मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने केंद्र-राज्य संबंधों में बातचीत का एक नया तरीका अपनाया है, एक ऐसा तरीका जिसने लगातार टकराव वाली पुरानी और थकाऊ शैली को चुपचाप खत्म कर दिया है, जो लोग लंबे समय से तमिलनाडु को उप-राष्ट्रवादी तनाव वाले अशांत इलाके के तौर पर देखते रहे हैं, उनके लिए यह बदलाव साफ तौर पर महसूस किया जा सकता है. 

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वैचारिक मतभेद और सिद्धांत अपनी जगह आज भी पूरी मजबूती से कायम हैं, लेकिन आपस में बातचीत और जुड़ाव का माहौल पूरी तरह बदल चुका है, अब लाउडस्पीकर और हंगामे का दौर खत्म हो चुका है और उसकी जगह आधिकारिक ज्ञापनों और प्रस्तावों ने ले ली है. यही वजह है कि अब दिल्ली के लिए भी एक ऐसे युवा और ऊर्जावान राजनेता को मना करना काफी मुश्किल हो रहा है, जो मुस्कुराता है, हाथ मिलाता है और पूरी व्यवस्थित योजना के साथ अपनी बात सामने रखता है.

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दिल्ली में शुरुआत: शोर-शराबे के बजाय काम पर ज़ोर

इस कूटनीतिक बदलाव का पहला साफ संकेत 27 मई 2026 को मिला. नई दिल्ली के अपने पहले आधिकारिक दौरे पर, मुख्यमंत्री विजय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ पच्चीस मिनट की बैठक के लिए साउथ ब्लॉक में कदम रखा. इस दौरान न तो सड़कों पर कोई विरोध-प्रदर्शन हुआ,  न ही एयरपोर्ट या तमिलनाडु हाउस में प्रेस के सामने कोई तीखे बयान दिए गए और न ही स्थानीय कैमरों के सामने कोई दिखावा किया गया. यह पूरी तरह से एक पेशेवर बैठक थी.

विजय ने एक व्यवस्थित ज्ञापन पेश किया, जिसमें राज्य के बेहद खास और जरूरी हितों को रखा गया था, कर्नाटक के मेकेदातू बांध प्रोजेक्ट का कड़ा विरोध, श्रीलंका की हिरासत से तमिल मछुआरों और उनकी जब्त नावों की तुरंत रिहाई, नीट (NEET) परीक्षा से छूट की पुरानी मांग, और तमिलनाडु में डीआरडीओ केंद्र की स्थापना. वे नई दिल्ली वैचारिक जंग का ऐलान करने नहीं गए थे, बल्कि अपने राज्य के हक के लिए काम करने गए थे.

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इस व्यावहारिक हुनर का एक और बड़ा उदाहरण 11 जून 2026 के आसपास उनके दूसरे दिल्ली दौरे के दौरान दिखा, जब वे नीति आयोग की 11वीं गवर्निंग काउंसिल की बैठक में शामिल हुए. प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली इस बैठक में, विजय ने तय समय के अंदर ही एक सटीक और पेशेवर प्रेजेंटेशन के जरिए साल 2036 तक तमिलनाडु को $1.5-ट्रिलियन (1.5 लाख करोड़ डॉलर) की अर्थव्यवस्था बनाने का अपना विज़न पेश किया.

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उन्होंने राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर सोनिया और राहुल गांधी जैसे विपक्षी नेताओं के साथ बैठकें कीं और साथ ही गृह मंत्री अमित शाह के साथ भी बातचीत के रास्ते खुले रखे. 

नीति आयोग में उनके भाषण में यह दोहरी रणनीति साफ तौर पर झलकती थी-  "एक विकसित भारत का निर्माण केवल सशक्त राज्यों, सहकारी संघवाद और समावेशी विकास के ज़रिए ही किया जा सकता है. " उनका लहज़ा सकारात्मक था, लेकिन साथ ही उन्होंने अपनी सीमाएं भी स्पष्ट कर दी थीं, जहां पिछली सरकारें अक्सर ऐसे राष्ट्रीय मंचों का इस्तेमाल नाटकीय ढंग से वॉकआउट करने या विरोध में तीखे पत्र लिखने के लिए करती थीं, वहीं विजय ने बातचीत जारी रखने का रास्ता चुना और एक अनुभवी कॉर्पोरेट रणनीतिकार की तरह शांत भाव से रुके हुए इंफ्रास्ट्रक्चर फंड की मांग की.

भाषा, NEET और आपसी टकराव को दूर करना

ऊपरी तौर पर देखने वाले किसी आम इंसान को विजय के नीतिगत फैसले तमिलनाडु की पारंपरिक राजनीतिक सहमति जैसे ही लग सकते हैं. वे भाषा और शिक्षा जैसे मुख्य मुद्दों पर आज भी पूरी तरह अडिग हैं, लेकिन इन मुद्दों को संभालने का उनका तरीका अतीत के ढर्रे से पूरी तरह अलग और नया है.

भाषाई मोर्चे पर, स्कूल शिक्षा मंत्री राज मोहन ने हाल ही में साफ किया कि सख्त दो-भाषा TVK सरकार का एक मुख्य सिद्धांत बनी हुई है, और उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के त्रि-भाषा फॉर्मूले को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया. वहीं नीट के मुद्दे पर भी सरकार का विरोध पूरी तरह कायम है. उनका तर्क है कि यह केंद्रीकृत परीक्षा ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए व्यवस्थागत असमानताएं पैदा करती है. यहां तक कि राज्य विधानसभा में राज्यपाल का जो भाषण हूबहू पढ़ा गया, उसमें भी राज्य की इसी पुरानी नीति की निरंतरता दिखाई दी.

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हालांकि, फर्क यह है कि इसमें जान-बूझकर पैदा किया गया कोई विवाद नहीं था. मई में शपथ ग्रहण समारोह के प्रोटोकॉल के दौरान हुए उस छोटे से विवाद को ही ले लीजिए, जहां शुरुआती खबरों में आरोप लगाया गया था कि 'तमिल थाई वाझथु' (राज्य गीत) को वंदे मातरम और राष्ट्रगान के बाद रखकर कम प्राथमिकता दी गई थी. अगर पुराना दौर होता, तो इस मुद्दे पर राजनीतिक हड़तालों और अनशन की होड़ का तीन हफ्ते लंबा दौर शुरू हो जाता, लेकिन विजय के नेतृत्व में, जून आते-आते इस कानूनी चुनौती को बहुत ही समझदारी से संभाला गया और प्रशासनिक प्राथमिकता की दोबारा पुष्टि होने के बाद इसे चुपचाप वापस ले लिया गया.

अगर विजय के चुनाव-पूर्व के शब्दों का इस्तेमाल करें, तो पुराने और थका देने वाले "एलकेजी-यूकेजी वाले झगड़ों" की जगह अब परिपक्व और गंभीर बातचीत ने ले ली है. राज्य की भाषाई और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा अब केंद्रीय मंत्रियों पर चिल्लाकर या पारंपरिक रूप से काले झंडे दिखाकर नहीं की जा रही है, बल्कि यह सुनिश्चित करके की जा रही है कि राज्य के प्रोटोकॉल को पूरी संस्थागत गरिमा और शालीनता के साथ निभाया जाए, जहां कभी तूफ़ान उठा करते थे, वहां अब एक शांत और दृढ़ निरंतरता ने मोर्चा संभाल रखा है. 

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फ़ेडरल कैनवस: सत्ता का हस्तांतरण, विनिवेश और डॉलर

सांस्कृतिक प्रतीकों से आगे बढ़कर, टीवीके (TVK) प्रशासन का पूरा ध्यान अब संघीय वित्त के सूखे और पेचीदा बही-खातों पर है. यहां, विजय के शांतिपूर्ण रवैये की परीक्षा बड़े और मुख्य मुद्दों के सामने हो रही है, जिसमें सबसे खास है संविधान  विधेयक 2026 के तहत होने वाला आगामी परिसीमन का काम. 

मुख्यमंत्री ने जनसंख्या के आधार पर सीटों के किसी भी ऐसे दोबारा बंटवारे के खिलाफ एक सख्त लक्ष्मण रेखा खींच दी है, जो दक्षिण के राज्यों को उनके सफल जनसंख्या नियंत्रण के लिए नुकसान पहुंचाती हो. उन्होंने इसे बिल्कुल सही तरीके से सिर्फ एक राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि एक बड़ा आर्थिक खतरा बताया है जो भविष्य में राज्यों के बीच होने वाले राजस्व के बंटवारे को बुरी तरह बिगाड़ सकता है.

नीति आयोग की बैठक में, विजय ने सीधे हिसाब-किताब की बारीकियों पर बात की, उन्होंने 'समग्र शिक्षा' योजना के तहत रुके हुए ₹3,284 करोड़ के फंड को तुरंत जारी करने की मांग की और साफ़ तौर पर कहा कि केंद्रीय मदद को NEP की शर्तों से नहीं जोड़ा जाना चाहिए. इसके साथ ही उन्होंने होगेनाक्कल फेज-III पेयजल योजना के लिए ₹2,283 करोड़, जीएसटी रोड को सिक्स-लेन बनाने के लिए फंडिंग, चेन्नई से कन्याकुमारी तक हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर, कोयंबटूर में दूसरे एम्स और कुलशेकरापट्टिनम में प्रस्तावित स्पेस मैन्युफैक्चरिंग हब को राष्ट्रीय मान्यता देने की मांग भी मजबूती से रखी.

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भारी उद्योगों से जुड़ी नीति के मामले में भी यह बदलाव साफ़ दिखाई देता है. उदाहरण के लिए, जब केंद्र सरकार ने मुनाफ़ा कमाने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी 'नेवेली लिग्नाइट कॉर्पोरेशन' (NLCIL) में अपनी तीन फ़ीसदी हिस्सेदारी बेचने का फ़ैसला किया, तो विजय ने सड़कों पर चक्का जाम करने या पेड़ काटने जैसे पुराने और आक्रामक तरीक़ों से इसका विरोध नहीं किया.

इसके बजाय, उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को एक औपचारिक और ठोस तर्कों से भरा पत्र लिखा, इसमें उन्होंने दलील दी कि जिस कंपनी को किसी राज्य ने दशकों तक अपनी ज़मीन और संसाधन देकर खड़ा किया और बड़ा किया हो, उस पर सरकार का मज़बूत मालिकाना हक़ और नियंत्रण बना रहना चाहिए. उनका यह रुख पूरी तरह से प्रशासनिक और कॉर्पोरेट नज़रिए पर आधारित था, यही वजह रही कि नई दिल्ली के लिए इसे महज एक क्षेत्रीय शिकायत या राजनीतिक नाटक कहकर नजरअंदाज़ करना मुश्किल हो गया.

गायब होता भगवा: तमिलनाडु में एक नया समीकरण

इस नए माहौल का स्थानीय राजनीतिक परिदृश्य पर एक बेहद दिलचस्प और लगभग हास्यास्पद असर पड़ा है. पिछले कई सालों से, तमिलनाडु की राजनीति डीएमके (DMK) और बेहद आक्रामक और जुझारू तेवर वाली राज्य भाजपा के बीच होने वाली तीखी बयानबाज़ी और हंगामे से तय होती थी. आज, वह पूरा समीकरण बारिश के मौसम में किसी फ्लॉप फिल्म के पहले शो की तरह पलक झपकते ही गायब हो चुका है.

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इस बदलाव का सबसे बड़ा मोड़ 5 जून 2026 को आया, जब चुनाव के उम्मीदवार तय करने की सूचियों से बाहर रखे जाने और दिल्ली में कुछ संक्षिप्त बैठकों के बाद, के. अन्नामलाई ने भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. उनके जाते ही, तमिलनाडु में भगवा पार्टी का वह आक्रामक और सड़कों पर लड़ने वाला चेहरा पूरी तरह बिखर गया. स्थानीय भाजपा अचानक एक राजनीतिक 'शीतनिद्रा' में चली गई है, और मुख्य राजनीतिक मोर्चे से पूरी तरह गायब है. पार्टी ने अपना सबसे पसंदीदा निशाना खो दिया है, यानी डीएमके का 'सनातन-विरोधी' एजेंडा.  अब विजय की इस पवित्र और बराबर दूरी बनाए रखने वाली नीति का मुकाबला करने के लिए भाजपा के पास कोई मुद्दा नहीं बचा है. वास्तव में, किसी ऐसे नेता को निशाना बनाना खुद छद्म धर्मनिरपेक्षता जैसा लगेगा जो बिना किसी अंतर्विरोध के भगवान मुरुगन, देवी मूकाम्बिका और मदर मैरी, तीनों की आराधना करता है और साथ ही आम जनता को भी अपने साथ लेकर चलता है.

इस बड़े बदलाव ने नई दिल्ली के लिए भी काम करने के तौर-तरीकों को बदल दिया है. भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के पास अब फोर्ट सेंट जॉर्ज  के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए स्थानीय स्तर पर कोई आक्रामक हथियार या मोहरा नहीं बचा है. ऐसे में, टीवीके सरकार के साथ व्यावहारिक सहयोग करना अब केवल एक राजनीतिक विकल्प नहीं, बल्कि एक अनिवार्य प्रशासनिक जरूरत बन गया है.

केंद्र सरकार अब दूर बैठकर शिकायत करने वाले एक आलोचक की भूमिका नहीं निभा सकती, उसे सीधे एक ऐसे मुख्यमंत्री से निपटना होगा जिसने अपनी मजबूत वैचारिक मुखालफत को रोजमर्रा के प्रशासनिक कामकाज से पूरी तरह अलग रखने में सफलता हासिल की है. केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी इस नई हकीकत को खुले तौर पर स्वीकार किया है. उन्होंने केंद्र-राज्य संबंधों पर विजय के इस सकारात्मक और सहयोगात्मक रुख का औपचारिक रूप से स्वागत किया और इसे वास्तविक सहकारी संघवाद के लिए एक बेहतरीन अवसर बताया. 

अगर किसी को पिछले साठ दिनों में तय की गई इस लंबी कूटनीतिक दूरी को मापने के लिए किसी एक भाषाई संकेत की जरूरत है, तो उसे राज्य प्रशासन द्वारा इस्तेमाल की जा रही शब्दावली को देखना चाहिए. पिछली सरकार ने सालों तक एक शाब्दिक लड़ाई लड़ने में वक्त बिताया, जहां वे 'ओंद्रिया अरसु' (केंद्रीय संघ) शब्द का इस्तेमाल करने पर अड़े रहे. देश के बाकी लोगों द्वारा अक्सर इस शब्द को एक भड़काऊ और क्षेत्रीय उप-राष्ट्रवाद के तंज के रूप में देखा जाता था. यह एक ऐसा शब्द था जिसे राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता था, जिसका मकसद दिल्ली को कोई बात समझाना नहीं बल्कि उसे चिढ़ाना था.

मुख्यमंत्री विजय के नेतृत्व में, बयानों की इस राजनीतिक चालबाज़ी को चुपचाप छोड़ दिया गया है और इसकी जगह 'इंडिया अरसु' (भारत सरकार) शब्द को अपना लिया गया है. यह तमिल गौरव से कोई समझौता नहीं है, बल्कि यह राजनीतिक परिपक्वता का प्रदर्शन है. मानक और गरिमापूर्ण शब्दावली का उपयोग करके, टीवीके प्रशासन ने रोज-रोज के अनावश्यक टकराव की एक बड़ी वजह को खत्म कर दिया है.

यह एक सरल और तार्किक सच्चाई को स्वीकार करने जैसा है. केंद्रीय करों में अपने राज्य की हिस्सेदारी की मजबूती से वकालत करने के लिए आपको केंद्र सरकार का नाम बदलने की जरूरत नहीं है. इस सूक्ष्म भाषाई बदलाव ने समझदारी के उस ढोंग की पुरानी दीवार को ढहा दिया है जिसके तहत पूरे भारत में मनाए जाने वाले फसल कटाई के इसी त्योहार के राष्ट्रीय जुड़ाव को तो आक्रामक रूप से खारिज कर दिया जाता था, लेकिन धर्मनिरपेक्षता के नाम पर स्थानीय पोंगल के बर्तनों को खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया जाता था. विजय की यह नई शब्दावली संकेत देती है कि तमिलनाडु अपनी अनूठी पहचान को लेकर पूरी तरह आश्वस्त है, और इसलिए उसे नई दिल्ली के साथ शब्दों के छोटे-मोटे झगड़ों में उलझने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं है.

शुरुआती निष्कर्ष: एक शुभ संकेत

किसी सरकार के पांच साल के कार्यकाल में दो महीने का समय यकीनन बहुत छोटा होता है.  अभी ठोस जीत जैसे कि शिक्षा कोष के ₹3,284 करोड़ का असल में जारी होना, नीट (NEET) पर कोई औपचारिक नीतिगत बदलाव, या एनएलसीआईएल (NLCIL) के विनिवेश का फैसला पूरी तरह पलटना अभी नई दिल्ली के प्रशासनिक गलियारों और कागजी प्रक्रियाओं से गुजर रही हैं. इसलिए इस शुरुआती दौर में ही पूरी जीत का दावा कर देना जल्दबाजी होगी. यह एक स्थिर शुरुआत है, एक उत्साहजनक भूमिका है, इसे एक मुकम्मल इतिहास मानने के बजाय एक "शुभ संकेत" माना जाना चाहिए.

फिर भी, इन दो महीनों का असली महत्व राजनीतिक तौर-तरीकों को पूरी तरह से बदलने में है. सालों तक तमिलनाडु के लोगों को यही बताया गया कि अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपने आर्थिक हितों की रक्षा करने का एकमात्र तरीका लगातार और थका देने वाले आक्रोश के माहौल में रहना ही है. हमें राजभवन से राज्यपाल के नाटकीय वॉकआउट, विधानसभा के वे गुस्से भरे प्रस्ताव जो दिल्ली के अभिलेखागारों में धूल फांकते रहे, और लगातार क्षेत्रीय अलगाववाद की एक थका देने वाली भावना को ही देखने की आदत डाल दी गई थी.

मुख्यमंत्री विजय यह दिखा रहे हैं कि एक दूसरा, कहीं अधिक शालीन और बेहतर रास्ता भी है. कोई भी व्यक्ति अपनी आवाज़ उठाए बिना या किसी बैठक से पैर पटककर बाहर निकले बिना भी भाषा पर पूरी तरह अडिग, परिसीमन पर समझौता न करने वाला और राज्य की स्वायत्तता का पुरजोर रक्षक हो सकता है. उन्होंने पुराने ज़माने के ज़ोर-शोर वाले राजनीतिक अंदाज़ की जगह अब सटीक कॉर्पोरेट हिसाब-किताब वाले तरीके को अपना लिया है.

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वह भगवा ब्रिगेड जो कभी स्थानीय न्यूज़ चैनलों पर दहाड़ती थी, अब चुपचाप पृष्ठभूमि में ओझल हो चुकी है और फोर्ट सेंट जॉर्ज का नया मुखिया बस मुस्कुराता है, हाथ मिलाता है, अपनी बात रखता है, और अपनी लक्ष्मण रेखाएं खून से नहीं बल्कि स्याही से खींचता है. यह एक शांत और परिपक्व ताकत है, जो तमिलनाडु के व्यावहारिक हितों की रक्षा पुराने और शोर-शराबे वाले तूफानों की तुलना में कहीं बेहतर तरीके से करती है. माहौल अनुकूल है, बही-खाता संतुलित है, और राज्य एक शांत और आश्वस्त कदम के साथ आगे बढ़ रहा है. 

अपने आप में यही एक बड़ी 'पुरैच्ची' यानी क्रांति है, जो तर्कवादी राज्य के उस थका देने वाले भाषणों और ढोल-नगाड़ों से सच्ची राहत देती है, जिन्होंने दशकों तक द्रविड़ 'पुरैच्ची' की कानफाड़ू राजनीति पर राज किया था. 

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