शशि थरूर ने सीजफायर पर BJP सरकार का सपोर्ट कर कांग्रेस को ही कठघरे में खड़ा कर दिया?

शशि थरूर कांग्रेस के सांसद होकर भी मुश्किलें राहुल गांधी की ही बढ़ा रहे हैं. पहलगाम हमले से लेकर ऑपरेशन सिंदूर और फिर सीजफायर तक शशि थरूर के बयान से फजीहत तो कांग्रेस की ही हो रही है.

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शशि थरूर आखिर क्यों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सपोर्ट में कांग्रेस की जड़ें खोदने लगे हैं? शशि थरूर आखिर क्यों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सपोर्ट में कांग्रेस की जड़ें खोदने लगे हैं?

मृगांक शेखर

  • नई दिल्ली,
  • 12 मई 2025,
  • अपडेटेड 6:53 PM IST

शशि थरूर कांग्रेस को पहले जोर के झटके धीरे से देते थे, अब ये काम वो जोर जोर से करने लगे हैं. जो बातें राहुल गांधी बीजेपी नेताओं के मुंह से भी नहीं सुनना पसंद करते होंगे, शशि थरूर लगातार सुनाते जा रहे हैं. 

भारत और पाकिस्तान के बीच सीजफायर की घोषणा होते ही देश की आबादी का एक बड़ा तबका बीजेपी की केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति नाराजगी प्रकट करने लगा था, तभी कांग्रेस की तरफ से 1971 की जंग और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को आयरन लेडी के रूप में सोशल मीडिया पर पेश किया जाने लगा. 

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तभी कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने 1971 और 2025 की परिस्थितियों में फर्क समझाने लगे, कांग्रेस की खूब फजीहत करा दी. 

और, जब राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे सीजफायर के बाद प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखकर संसद के दोनो सदनों का विशेष सत्र बुलाये जाने की मांग कर रहे हैं, शशि थरूर सीजफायर का महत्व और जरूरत समझाने लगे हैं. 

अब तो लगता है कांग्रेस नेता उदित शशि थरूर के बारे में बहुत गलत भी नहीं बोल रहे थे. पहलगाम हमले में खुफिया चूक पर उनके बयान को लेकर हाल ही में उदित राज ने शशि थरूर से पूछ लिया था, वो बीजेपी के प्रवक्ता हैं क्या? 

सीजफायर में अमेरिकी दखल हुई है क्या?

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध जैसे हालात होते जा रहे थे, और तभी एक दिन डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया के जरिये जानकारी दी कि दोनो मुल्कों के बीच सीजफायर हो गया है. 

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कांग्रेस की तरफ से ये सवाल पूछा जाने लगा कि सीजफायर में अमेरिका का क्या रोल है? 

सरकार की तरफ से पहले विदेश सचिव विक्रम मिसरी ऑपरेशन सिंदूर के बारे में प्रेस ब्रीफिंग के दौरान अपडेट दे रहे थे. प्रेस ब्रीफिंग तो अब भी हो रही है, लेकिन अब ये काम तीनों सेनाओं बड़े अफसरों की तरफ से दिये जा रहे हैं. 

विनम्रता के साथ ही सही, दोनो देशों को अहमियत देते ही सही, लेकिन ऐसा लगता है जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति सीजफायर का पूरा क्रेडिट खुद ही लेना चाहते हों. 

सीजफायर को लेकर शक की सूई इसलिए भी गहराने लगी है, क्योंकि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने तो खुशी खुशी अमेरिका का शुक्रिया कहा है, लेकिन भारत की तरफ से अभी तक साफ तौर पर कोई बात नहीं कही गई है - ऐसे में सवाल ये उठता तो है ही कि भारत और पाकिस्तान के बीच सीजफायर में डोनाल्ड ट्रंप की क्या भूमिका है?

कांग्रेस के सवाल का जवाब मिलने से पहले ही शशि थरूर ने डोनाल्ड ट्रंप के मध्यस्थता के दावे को सिरे से खारिज कर दिया है. 

शशि थरूर संयुक्त राष्ट्र में बड़े स्तर पर काम कर चुके हैं, और देश के विदेश राज्य मंत्री भी रह चुके हैं, लिहाजा उनके बयान यूं ही महत्वपूर्ण हो जाते हैं - और उनकी दलील भी मजबूत है. 

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शशि थरूर ने डोनाल्ड ट्रंप के उस दावे को खारिज करने की कोशिश की है, जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा है कि सीजफायर अमेरिका की मध्यस्थता से मुमकिन हो पाया है. 

शशि थरूर कहते हैं, ये मध्यस्थता नहीं, बल्कि रचनात्मक सहयोग जैसा था.

शशि थरूर का कहना है, ये कहना कि ये मध्यस्थता थी, बिल्कुल गलत है… ये अमेरिका सहित कुछ देशों की तरफ से एक रचनात्मक भूमिका थी, जिसमें वे दोनों पक्षों से संपर्क में थे… लेकिन, भारत ने कभी किसी भी तीसरे पक्ष से मध्यस्थता की मांग नहीं की.

पूर्व विदेश राज्य मंत्री के मुताबिक, ऐसी बातचीत सामान्य कूटनीतिक प्रक्रिया का हिस्ता होती हैं, जिसमें दोनों पक्षों की बातों को एक दूसरे को बताया जाता है… इसे मध्यस्थता कहना भारत की विदेश नीति और संप्रभुता का अपमान है. 

सीजफायर जरूरी क्यों हो गया था?

सीजफायर के बाद जब सोशल मीडिया पर 1971 के भारत-पाक युद्ध का जिक्र हुआ, और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की भूमिका की आयरन लेडी बोलकर तारीफ होने लगी, तभी शशि थरूर का भी रिएक्शन आ गया. 

न्यूज एजेंसी ANI से बातचीत में शशि थरूर ने कहा, 1971 में जो किया गया उसकी तारीफ होनी चाहिये. लेकिन, इसका मतलब ये नहीं है कि आज जो हो रहा है, उसे नजरअंदाज किया जा सकता है. 

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शशि थरूर ने समझाया है कि 1971 और 2025 के हालात काफी अलग हैं…  पाकिस्तान जिस स्थिति में 1971 में था अब वो उस स्थिति में नहीं है… ऐसे में दोनों की तुलना करना सही नहीं होगा. तब हालात अलग थे और आज के हालात बिल्कुल ही अलग हैं. 
देखा जाये तो शशि थरूर का ये बयान कांग्रेस के पैरों तले जमीन खींच लेने जैसा है. बहस के लिए राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के संसद का विशेष सत्र बुलाये जाने की मांग को अनुचित बताने जैसा है - और बीजेपी की सरकार पर कांग्रेस की तरफ से उठाये जा रहे सवालों को काउंटर करने जैसा है. 

हाल ही में, रूस-यूक्रेन जंग पर शशि थरूर का भूल सुधार वाला बयान भी आया था. दिल्ली के एक कार्यक्रम में शशि थरूर ने कहा था, मुझे ये स्वीकार करना होगा कि 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध पर भारत के रुख की आलोचना करने पर मुझे शर्मिंदगी उठानी पड़ी… मोदी ने दो हफ्तों के अंतराल में यूक्रेन के राष्ट्रपति और रूस के राष्ट्रपति दोनो को गले लगाया… और दोनों जगह उन्हें स्वीकार किया गया.

केरल पहुंचे प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत करने, बीजेपी नेताओं के साथ तस्वीर शेयर करने के बावजूद शशि थरूर यही जताने की कोशिश करते हैं कि वो मुद्दों पर सरकार का सपोर्ट कर रहे हैं, लेकिन सपोर्ट का ये अंदाज तो राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के खिलाफ ही जा रहा है.  
 

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