प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी के लिए बिहार में कितनी जमीन तैयार है?

जन सुराज पार्टी की स्थापना पर प्रशांत किशोर के विरोधी भी उनकी आलोचना तो कर रहे हैं पर उन्हें इग्नोर नहीं कर रहे हैं. अपनी संस्था आईपैक के जरिए करीब दर्जन भर नेताओं को कुर्सी दिला चुके प्रशांत किशोर उर्फ पीके अब अपने लिए सत्ता के रास्ते पर निकल चुके हैं. सवाल यह है कि बिहार की राजनीति में वो कितना सफल होंगे?

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जनसुराज पार्टी की स्थापना के बाद बिहार में प्रशांत किशोर के राजनीतिक आधार का आंकलन हो रहा है. जनसुराज पार्टी की स्थापना के बाद बिहार में प्रशांत किशोर के राजनीतिक आधार का आंकलन हो रहा है.

संयम श्रीवास्तव

  • नई दिल्ली,
  • 03 अक्टूबर 2024,
  • अपडेटेड 3:27 PM IST

चुनावी रणनीतिकार के रूप में पूरे देश में अपनी पहचान बना चुके प्रशांत किशोर अब नेता बन चुके हैं. अपनी संस्था आईपैक के जरिए करीब दर्जन भर नेताओं को कुर्सी दिला चुके प्रशांत किशोर उर्फ पीके अब अपने लिए सत्ता का जुगाड़ करने निकल चुके हैं. हालांकि उन्होंने अपनी राजनीतिक पार्टी की स्थापना का ऐलान करते हुए यह भी बताया है कि वह बिहार के मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे. पर अब किशोर नेता बन चुके हैं. इसलिए नेताओं वाले सारे फॉर्मूले अब उन पर भी लागू होते हैं. वह लाख बोलें कि पार्टी बनाने का उनका उद्देश्य कुर्सी नहीं है फिर भी यही माना जाएगा कि नेता कभी भी अपनी बात से पलट सकते हैं.

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इसमें कोई दो राय नहीं है कि प्रशांत किशोर जिस तरह पूरी तैयारी के साथ धीरे-धीरे कदम बढ़ा रहे हैं उनकी स्थिति मजबूत ही हो रही है. उनके विरोधी भी उनकी आलोचना कर रहे हैं पर उन्हें इग्नोर नहीं कर रहे हैं. सभी मानकर चल रहे हैं कि बिहार की राजनीति में अब प्रशांत किशोर को अलग थलग नहीं किया जा सकता है. फिलहाल हमारा आंकलन कहता है कि निम्न कारणों के चलते बिहार में जन सुराज पार्टी के लिए रास्ता आसान है. आइये चर्चा करते हैं उन कारणों की-

1-जेपी के शिष्यों का अंतिम दौर चल रहा है

बिहार की राजनीति के लिए यह सबसे बुरा दौर चल रहा है. आजादी के बाद से ही बिहार के नेता देश को नेतृत्व देते रहे हैं. चाहे वो राजेंद्र प्रसाद रहे हों या जगजीवन राम, चाहे लालू प्रसाद यादव रहें हों या नीतीश कुमार ये सभी लोग प्राइम मिनिस्टर मटेरियल रहे हैं. बिहार के हर दौर में कोई न कोई ऐसा नेता रहा है जिसका नाम प्रधानमंत्री पद के लिए लिया जाता रहा है. पर राजनीति का वह गोल्डल पीरियड अपने अवसान की ओर है.लोकनायक जयप्रकाश नारायण के शिष्यों में रामविलास पासवान, जार्ज फर्नाडिस, शरद यादव अब रहे नहीं. लालू यादव और नीतीश कुमार बुजर्ग हो चुके हैं. इनकी जगह लेने वाले नेताओं में इतनी कूवत भी नहीं है कि वो अपने विरासत को संभाल सकें.तेजस्वी का तेज अपने पिता के बिना मद्धम पड़ जाता है. बिहार बीजेपी के कद्दावर लीडर सुशील मोदी भी अब नहीं रहे.बिहार बीजेपी अभी भी इस लायक नेतृत्व नहीं ढूंढ सका है जो अपने बल पर बिहार में पार्टी को चुनाव जिता सके. यही कारण है कि बुजुर्ग नीतीश कुमार के सहारे पार्टी कदमताल कर रही है .मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अब बस राजनीतिक सर्वाइवल में ही अपने को बिजी रखे हए हैं. पिछले चुनावों में उन्होंने खुद अपना अंतिम चुनाव कहकर जनता से वोट मांगा था. ये अलग बात है कि कुर्सी का मोह छुड़ाए भी नहीं छूटता है. रामविलास पासवान की असमय मृत्यु होने के बाद उनके बेटे चिराग पासवान अभी भी पासवान वोटों के बल पर ही राजनीति कर रहे हैं. बाकी हम, वीआईपी जैसी तमाम ऐसी पार्टियां जो अपने जाति का रिप्रेजेंटशन करती हैं उनसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनने का दम नहीं है. यही कारण है कि प्रशांत किशोर के पास पैर फैलाने के लिए बिहार में असीमित जगह है. 

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2- बिहार बीजेपी में कोई ताकतवर नेतृत्व नहीं उभर रहा है

भारतीय जनता पार्टी 2014 के बाद से अपने लिए एक अदद लीडर की तलाश कर रही है. वैसे तो बिहार बीजेपी में नेताओं की कमी नहीं है. पर एक भी ऐसा लीडर नहीं है जो यह कह सके कि उसके नेतृत्न में बिहार विधानसभा चुनावों में बिना किसी दूसरी पार्टी के सहयोग के चुनाव जीता जा सकता है.सुशील कुमार मोदी बहुत दिनों तक बिहार बीजेपी की कमान अपने हाथ में रखे पर एक बार डिप्टी सीएम बनने के बाद उन्हे राजनीतिक बियाबान में जाना पड़ा. उसके बाद केंद्रीय मंत्री बनने वाले अश्विनी चौबे, रविशंकर प्रसाद आदि भी बीजेपी के बड़े चेहरे थे पर अब इन लोगों को भी महत्व नहीं मिल रहा है. नीतीश कुमार के साथ बीजेपी गठबंधन वाली सरकार जब पहली बार बनी तो 2 डिप्टी सीएम बनाए गए .उन्हें भी नेपथ्य में जाना पड़ा. अभी फिलहाल 2 डिप्टी सीएम कार्यरत हैं पर दोनों के साथ ही बीजेपी लंबी पारी खेलने की स्थिति में नहीं दिखाई दे रही है. उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से अध्यक्ष पद ले लिया गया है. दूसरे उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा के साथ भी यही लग रहा है. बीजेपी ने प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी को हटाकर दिलीप जायसवाल को राज्य की कमान सौंपी है. दिलीप जायसवाल वर्तमान में नीतीश सरकार में भूमि सुधार और राजस्व मंत्री हैं. जाहिर है कि इन सभी लोगों में जन सुराज के प्रशांत किशोर जैसी या लालू , नीतीश और रामविलास जैसी नेतृत्व क्षमता का अभाव है. यही अभाव प्रशांत किशोर की जन सुराज के लिए आधार तैयार करता है.

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3-जन सुराज की आकर्षक बातें लोगों को फ्रेश लग रही हैं

जन सुराज के नेता प्रशांत किशोर अपनी पार्टी को बिहार की परंपरागत पार्टियों से अलग रंग रूप दे रहे हैं. वो कहते हैं कि जन सुराज का किसी खास जाति की पार्टी नहीं है यह पूरे बिहार की पार्टी है. खुद को सत्ता से दूर रहने की बात करते हैं. मतलब उन्हें कुर्सी से प्यार नहीं है वो केवल बिहार की बदहाली दूर करने के लिए पार्टी का गठन किए हैं. बिहार में शराब बंदी को गलत बताते हुए फिर से शुरू करने की बात करते हैं. इसके साथ यह भी कहते हैं कि शराब से होने वाली करीब 20 हजार करोड़ की आय को वो बिहार की शिक्षा व्यवस्था को अतंरराष्ट्रीय स्तर का बनाने में खर्च करेंगे.बिहार की गरीबी दूर करने, बेरोजगारी खत्म करने की ठोस प्लानिंग पर बात करते हैं.प्रशांत किशोर कहते हैं कि बिहार के बैंकों में हर साल 4.61 लाख करोड़ जमा होते हैं.लेकिन बैंक यहां 1.61 लाख करोड़ ही कर्ज बांटते हैं . बाकी पैसा दूसरे राज्यों में इनवेस्ट होता है. वो महिलाओं को 4 प्रतिशत की पर कर्ज और बुजुर्गों को 2000 महीना पेंशन देने का प्लान बताते हैं .  जाहिर है कि बिहार के जनमानस के बीच इस तरह की कोई पार्टी अभी तक इस तरह की बातें नहीं करती थी. प्रशांत किशोर उन्हें ख्वाबों की दुनिया में ले जाते हैं.

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4-जातिवाद के विरोध के नाम पर जातियों का सुनियोजित इस्तेमाल

आम तौर पर बिहार की सभी पार्टियां किसी खास जाति और धर्म से जुड़ी हुईं हैं. वो चाहे आरजेडी हो या जेडीयू , हम हो या वीआईपी , लोजपा हो या रालोपा  . इन सभी दलों का आधार कोई न कोई जाति ही है. आम आदमी पार्टी की तरह से प्रशांत किशोर भी जन सुराज को किसी खास जाति या धर्म के नाम पर वोट न मांगने की बात करते हैं. पर बहुत ही सावधानी से वे अपनी पार्टी के झंडे में गांधी के साथ अंबेडकर को भी फिट कर देते हैं. आईआईटी और आईएफएस के नाम पर अपनी पार्टी के पहले अध्यक्ष का चयन करते हैं और उन्हें दलित भी बता देते हैं. मुसलिम समुदाय के लिए एक खास संख्या टिकटों के लिए निर्धारित करते हैं. मतलब बहुत सावधानी से जातिवाद और संप्रदायवाद का विरोध करते हए जातियों और धर्म का इस्तेमाल भी करते हैं.

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