पिछले कुछ दिनों से दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में एक चर्चा गरम है. ममता बनर्जी की सोनिया गांधी से मुलाकात, अभिषेक बनर्जी की राहुल गांधी से बातचीत और उसके बाद की खामोशी. सब कुछ सस्पेंस भरा लग रहा है. क्या तृणमूल कांग्रेस कांग्रेस पार्टी में विलय कर रही है? ममता अपनी पार्टी को बचाने के लिए पुरानी घर वापसी का रास्ता चुनेंगी?
हालांकि, ममता बनर्जी के करीबी सूत्र इससे इनकार कर रहे हैं, और कांग्रेस की ओर से जयराम रमेश पर ऐसी खबरों को गलत बता रहे हैं. लेकिन, कांग्रेस के ही उदित राज, ममता को कलह से बचने के लिए कांग्रेस में आ जाने और राहुल गांधी को नेता मान लेने की सलाह दे रहे हैं. टीएमसी के कांग्रेस में विलय की खबरों को बागी नेता ऋतब्रत बनर्जी ने भी गंभीरता से लिया है. लेकिन बुनियादी सवाल यह नहीं है कि ममता कांग्रेस में विलय होकर अपना राजनीतिक विसर्जन करेंगी या नहीं, सवाल ये भी है कि कांग्रेस इस मर्जर का बोझ कैसे उठाएगी?
बंगाल विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद से तृणमूल कांग्रेस की हालत खराब है. पार्टी हर लेवल पर टूट रही है. पंचायत से लेकर संसद तक. टीएमसी के बागी विधायकों के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने साफ कर दिया है कि वे न बीजेपी के साथ जा रहे हैं और न कांग्रेस में विलय. वे खुद को असली तृणमूल बताते हुए 60 से ज्यादा विधायकों का समर्थन जता रहे हैं. ऐसे में ममता बनर्जी के लिए विलय एक रणनीतिक कदम लग सकता है. इससे संसद में पार्टी हाईजैक होने से बच सकती है, सीटें बढ़ सकती हैं और बागियों के पास इस्तीफे के अलावा कोई चारा नहीं रह जाएगा. लेकिन कांग्रेस के लिए ये फायदे से ज्यादा सिरदर्द तो नहीं होगा?
सबसे पहला मुद्दा बंगाल में कांग्रेस की अपनी स्थिति का है. कांग्रेस बंगाल में लंबे समय से संघर्ष कर रही है. उसकी जमीन लगभग खत्म हो चुकी है. वोट बैंक कमजोर है. अब अगर वो तृणमूल को अपने में मिला लेती है तो क्या होगा? तृणमूल अब कांग्रेस के लिए ताकत नहीं, बोझ बन जाएगी. बंगाल में तृणमूल की छवि क्या है? एक कमजोर पार्टी दूसरी कमजोर और विवादित पार्टी को कैसे सहारा देगी? ये मिलन दोनों को मजबूत करने के बजाय एक-दूसरे की कमजोरियां बढ़ा सकता है.
दूसरा बड़ा मुद्दा परिवारवाद का है. गांधी परिवार पर पहले से ही परिवारवाद के आरोप लगते रहे हैं. ममता बनर्जी खुद अभिषेक बनर्जी को आगे बढ़ाने के लिए परिवारवाद की आलोचना झेल रही हैं. अगर कांग्रेस ममता और अभिषेक को करीब लाती है तो ये नैरेटिव और मजबूत हो जाएगा. कहा जाएगा कि गांधी परिवार दूसरों के परिवारवाद को भी अपना रहा है. राजनीति में छवि बहुत मायने रखती है. राहुल गांधी अपनी यात्राओं और कार्यक्रमों से नया चेहरा पेश करने की कोशिश कर रहे हैं. क्या वो इस बोझ को सहन कर पाएंगे?
और ममता बनर्जी की कांग्रेस के खिलाफ बयानबाजी? विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने बार-बार कहा कि कांग्रेस की जमीन खत्म हो गई है, उसका कोई वोट बैंक नहीं बचा. अब उसी कांग्रेस के साथ विलय? कांग्रेस नेतृत्व ये बदलाव आम लोगों को कैसे समझाएगा? राजनीति में विश्वसनीयता खोना आसान नहीं होता. ममता की पुरानी बातें कांग्रेस के लिए असुविधाजनक साबित होंगी.
राहुल गांधी के लिए ये और भी मुश्किल होगा. भारत जोड़ो यात्रा के दौरान बंगाल वाला हिस्सा सबसे कमजोर और नीरस माना गया था. ममता बनर्जी न सिर्फ बंगाल में बल्कि इंडिया गठबंधन में भी कांग्रेस के लिए चुनौती बनती रहीं. उनकी स्वतंत्र लाइन और कभी-कभी अलग रुख ने कांग्रेस की रणनीति को प्रभावित किया. अब अगर विलय होता है तो राहुल को ममता की सियासत को भी अपने कंधों पर उठाना होगा. क्या ये हजम होगा?
फिर भ्रष्टाचार के आरोपों का सवाल है. अभिषेक बनर्जी और तृणमूल के कई नेताओं पर भ्रष्टाचार, कट मनी और सत्ता के दुरुपयोग के आरोप लगे रहे हैं. कांग्रेस को न सिर्फ तृणमूल कांग्रेस का बोझ उठाना होगा बल्कि इन आरोपों का बचाव भी करना पड़ेगा. गांधी परिवार पहले से ही नैतिकता और साफ-सुथरी छवि का दावा करता है. क्या ये नया बोझ उस छवि को और धूमिल करेगा? विपक्षी एकता की बात अच्छी है, लेकिन कीमत चुकानी पड़ती है.
सबसे बड़ा रिस्क अनिश्चितता का है. ममता बनर्जी स्ट्रीट फाइटर रही हैं. इतना ही नहीं, उनका अतीत एनडीए से लेकर यूपीए तक सफर करता रहा है. मौजूदा खतरे का दौर पार कर जाने के बाद उनका रवैया क्या होगा, यह कोई नहीं जानता. आज वो कांग्रेस के साथ हैं, कल फिर अपनी अलग लाइन खींच सकती हैं. इतिहास गवाह है. ममता 1997 में कांग्रेस छोड़कर तृणमूल बनाई थी. अब वापसी हो भी गई तो क्या गारंटी है कि रिश्ता टिकेगा? कांग्रेस को इस जोखिम का भी सामना करना होगा. एक बार विलय हो गया तो पीछे हटना मुश्किल होगा.
राजनीतिक विश्लेषक कह रहे हैं कि ममता के लिए ये फायदेमंद सौदा हो सकता है. उन्हें राष्ट्रीय भूमिका मिल सकती है, अभिषेक को जगह मिल सकती है. और उनकी तृणमूल कांग्रेस को थोड़ी राहत. लेकिन कांग्रेस को क्या मिलेगा? बंगाल में कुछ अतिरिक्त ताकत? या सिर्फ सिरदर्द? कांग्रेस पहले से ही कई मोर्चों पर संघर्ष कर रही है. बीजेपी का मुकाबला, क्षेत्रीय दलों का संतुलन, अपनी संगठनात्मक कमजोरियां. ऐसे में तृणमूल जैसे पार्टी को अपनाना नई चुनौतियां खड़ी करेगा.
संजय राउत जैसे नेता भी ब्रेकअवे पार्टियों को कांग्रेस में वापस लाने की बात कर रहे हैं. लेकिन हर पार्टी की अपनी कहानी है. तृणमूल की कहानी बंगाल की सत्ता की है, जहां सालों तक एकतरफा राज चला. कांग्रेस की कहानी पुरानी है, लेकिन उसमें भी कई घाव हैं. दोनों का मेल कितना सुचारू होगा? सोशल मीडिया पर चकल्लस तो चल रही है, लेकिन ममता और कांग्रेस हाईकमान चुप हैं. ये चुप्पी खुद में कई सवाल उठाती है.
अगर विलय होता है तो विपक्षी एकता को मजबूती मिल सकती है. 2029 के चुनावों के लिए ये एक कदम हो सकता है. लेकिन क्या कीमत चुकानी पड़ेगी? कांग्रेस को बंगाल की जटिल राजनीति में उलझना पड़ेगा. स्थानीय स्तर पर तृणमूल के पुराने कार्यकर्ता और बागी, दोनों को संभालना चुनौती होगा. वोट ट्रांसफर आसान नहीं होगा. बंगाल के लोग ममता की छवि को कांग्रेस से जोड़कर देखेंगे या पुरानी यादें ताजा हो जाएंगी?
राजनीति में फैसले भावनाओं से नहीं, हकीकत से लिए जाते हैं. ममता के लिए विलय बचाव का रास्ता हो सकता है, लेकिन कांग्रेस के लिए ये आत्ममंथन का मौका है. क्या वो इतना बड़ा बोझ उठाने के लिए तैयार है? क्या राहुल गांधी और सोनिया गांधी इस रणनीति को सफल बना पाएंगे? या ये एक और प्रयोग साबित होगा जो अंत में कमजोरी बढ़ाएगा?
बंगाल की राजनीति हमेशा से अनोखी रही है. यहां वामपंथ, तृणमूल, बीजेपी और कांग्रेस की कहानियां आपस में गुथी हुई हैं. मर्जर की चर्चा इस उलझन को और बढ़ा रही है. ऋतब्रत बनर्जी जैसे बागी नेताओं का विरोध साफ है. वे कह रहे हैं कि असली तृणमूल अलग रहेगी. ऐसे में अगर ममता कांग्रेस में जाती हैं तो क्या बचेगा? दो टुकड़ों में बंटी तृणमूल? या कांग्रेस का नया रूप?
कांग्रेस को सोचना होगा कि वो क्या हासिल करना चाहती है. सिर्फ संख्या बढ़ाना या लंबे समय की रणनीति? परिवारवाद, भ्रष्टाचार के आरोप, क्षेत्रीय असंतोष और भविष्य की अनिश्चितता – ये सब बोझ हैं जो कांग्रेस पर लद सकते हैं. ममता की ताकत स्ट्रीट फाइट है, लेकिन कांग्रेस के लिए माहौल अलग होगा.
धीरेंद्र राय