'इतना भी गुमान न कर अपनी जीत पर, ऐ बेख़बर,
इस शहर में तेरी जीत से ज़्यादा चर्चा मेरे हार की है.'
कोई भी इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि 2025 के बिहार चुनावों में यदि किसी एक कहानी ने सबसे अधिक चर्चा बटोरी, तो वह जन सुराज की कहानी थी. यह अलग बात है कि उसे चुनावी सफलता नहीं मिली, लेकिन यह तथ्य कि अपने गठन के मात्र एक वर्ष के भीतर ही जन सुराज ने बिहार की राजनीति के परिदृश्य को झकझोर दिया, राजनीति के प्रत्येक विद्यार्थी के लिए गहन अध्ययन का विषय है.
प्रशांत किशोर होना आसान नहीं है. इसके लिए बुद्धिमत्ता, विचार, पहल और साहस चाहिए. उससे भी बढ़कर चाहिए त्याग. हर व्यक्ति की तरह प्रशांत किशोर की भी अपनी कमियां हो सकती हैं, लेकिन यदि उनके गुण और अवगुणों का समग्र मूल्यांकन किया जाए, तो उनके पक्ष में सकारात्मकता कहीं अधिक भारी पड़ती है.
2025 के चुनाव में प्रशांत किशोर पर आरोप था कि वो सूत्रधार होते हुए भी स्वयं चुनाव नहीं लड़े. उन पर हारने के डर का आरोप लगा. लोगों का ये कहना था कि पीके चूंकि राजनीतिक आंकलन में प्रखर हैं इसलिए उन्होंने ये समझ लिया था कि उनकी हार निश्चित है और इसीलिए चुनाव में स्वयं नहीं उतरे. वहीं पर जन सुराज से तर्क ये था कि अगर पीके को बतौर शीर्ष नेता 243 सीट पर अपना समय देना है तो वह चुनाव लड़ कर अपनी ऊर्जा और यत्न केवल एक सीट पर नहीं केंद्रित कर सकते हैं.
शायद उन्ही टीका टिप्पणियों का असर है कि इस बार पीके भाजपा के गढ़ में घुस कर चुनाव लड़ रहे हैं. ये सर्व विदित है कि यह सीट पिछले 20 साल से भाजपा की है और वो भी उनके शीर्ष नेता नितिन नवीन या उनके पिता की रही है. अब अगर ये तर्क लिया जाए कि पीके 2025 में अपने आंकलन से समझ चुके थे कि वह चुनाव हार जाएंगे तो इस बार वो चुनाव क्या इसलिए लड़ रहे हैं क्योंकि उनका आंकलन उनको बता रहा है की वो यह चुनाव जीतेंगे?
संभावना क्या है?
राजनीति विश्लेषण में यह माना जाता है कि उप चुनाव अधिकांशतः इनकब्मेंट को ही जाता है. वैसे भी इस बार भाजपा की ट्रिपल इंजन सरकार है - राष्ट्र, राज्य और नगर निगम. कहा जा रहा है कि पूरी की पूरी भाजपा एक तरफ और दूसरी तरफ अकेले पीके की लड़ाई है. भाजपा के बड़े बड़े दिग्गज चुनावी प्रचार में उतर चुके हैं . पैसा, तंत्र, लोभ, भय सारे हथकंडे लगते जा रहे हैं. जन सुराज के तीन प्रत्याशी जिनमे प्रोफेसर केसी सिंह खास हैं उनको बीजेपी ने अपनी तरफ कर लिया है. कारण स्पष्ट नहीं कि आख़िर हुआ क्या. वहां जन सुराज की तरफ से एक शेर पढ़ा जा रहा है,
'कोई यूं ही बेवफा नहीं हो जाता,
कुछ तो मजबूरियां रही होंगी!'
केसी सिंह को भाजपा द्वारा अपनी तरफ़ खींचना भाजपा के अंदर प्रशांत किशोर के भय का सबूत है. टक्कर सीधी सम्राट चौधरी बनाम प्रशांत किशोर है. भाजपा के पहले प्रत्याशी अभिषेक सिंह को नामांकन करने के बाद तुरंत अपना नामांकन वापस लेना पड़ा. औपचारिक कारण भले ही व्यक्तिगत दिया जाए लेकिन यह बीजेपी के मोर्चे में एक बहुत बड़ी उलझन और भय को दर्शाता है. बांकीपुर विधान सभा क्षेत्र में कायस्थों का वर्चस्व है. शायद केसी सिंहा जो कि स्वयं कायस्थ हैं उनको इसी लिए भाजपा ने जन सुराज से अपनी और खींचा है. यह भी बीजेपी खेमे में घबराहट का प्रतीक है.
भाजपा की चिंता अकारण नहीं है. राष्ट्रीय स्तर पर राम मंदिर से चंदा चोरी ने भाजपा के हिंदू समर्थकों को झकझोर कर रख दिया है. E20 इथनॉल नें एक अलग ही बवाल मचा रखा है और पूरे भारत की जानता इस से नाराज है. गाड़ियां बीच सड़क पर बंद हो जा रही हैं और स्कूटर मोटरसाइकिल कार ऑटो वालों को आकस्मिक मरम्मत के लिए पैसे लगने की शिकायत है. इथनॉल मिश्रण से तेल का दाम कम तो हुआ नहीं हां माइलेज भले दस प्रतिशत घट गया, जिसका मतलब दाम 10 प्रतिशत बढ़ना हुआ.
राज्य स्तर पर कहा जा रहा है कि 2025 का चुनाव लड़ा तो नीतीश जी के नाम पर गया था लेकिन बतौर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को थोप दिया गया. उल्लेखनीय है कि पीके ने सम्राट चौधरी की आपराधिक पृष्ठभूमि और शैक्षिक योग्यता पर काफ़ी आक्रमण किया था. भरत तिवारी के सरेंडर के बावजूद एनकाउंटर ने क़ानून व्यवस्था पर सवाल उठा दिया है. कानून का राज ना हो कर जंगल राज का आरोप है. विकास की बात नहीं हो रही है, राजकोष खाली है, जल जमाव और गंदगी से प्रजा परेशान है, संरचना लगभग स्थिर है. शासन और प्रशासन के अधिकारी के ठाठ तो दिखते हैं लेकिन उनका काम नहीं दिख रहा है ऐसा भी आरोप है.
बांकीपुर क्षेत्र में पिछले 20 साल से एक ही परिवार से पिता और फिर पुत्र विधानसभा के सदस्य रहे. उसमें भी नितिन नवीन जैसा प्रभावी सदस्य जो कि आज भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष है, उनके भी 10 साल रहने के बावजूद कोई विशेष सुधार नहीं हुआ, ऐसा जनता का आरोप है. आंकलन है कि 75 से 100 झोपड़ पट्टियां इस क्षेत्र में तो हैं ही, उनके अंदर भी लोगों को बुनियादी सुविधा नहीं है.
बांकीपुर की जनता एक बड़े नेता के स्थान पर दूसरा बड़ा नेता ही चाहेगी और प्रत्यक्ष है कि जो दूसरे प्रत्याशी नीरज कुमार सिंहा हैं, उनकी राजनैतिक परिपक्वता और सक्रियता पीके के सामने अत्यधिक धूमिल दिखती है. उधर जन सुराज भी विधानसभा में अपना पहला खाता प्रशांत किशोर से खोलना चाहती है. अगर पीके जीत जाते हैं तो बांकीपुर में जन सुराज एक उदाहरणीय काम करके दिखाएगी ये तो तय है. भले ही एक हो लेकिन सभा में वो सदस्य प्रशांत किशोर होंगे तो जन सुराज के लिए भाजपा के किले में सबसे बलिष्ठ सिपाही के घुसने जैसी बात हो जाएगी. यहां से टक्कर पीके और सम्राट चौधरी में सामने सामने होगी. अभी तक तो केवल प्रेस के माध्यम से होती थी. दोनों के बीच में सदन में संवाद भी काफी रोचक होगा.
अब तो समय बताएगा कि बांकीपुर की जनता अपने यहां पीके को लाकर प्रतिस्पर्धा को जगह देगी या नीरज सिंह को ला कर फिर से भाजपा को ही सिंहासन देगी. ये तो सब जानते हैं कि प्रतियोगिता से उपभोक्ता को लाभ मिलता ही है. सवाल यह है कि उपभोक्ता लाभान्वित होने का इच्छुक है या नहीं.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
कर्नल पी के चौधरी