जब साधारण इंसान बेइमानी करता है तो उसे जुर्म या पाप कहा जाता है. लेकिन, यही काम कोई लीजेंड करता है तो उसे ‘भगवान की लीला’ कहा जाता है. 40 साल पहले मेक्सिको सिटी के एस्टादियो एज़्टेका (Estadio Azteca) स्टेडियम में डिएगो माराडोना ने जो किया वो किसी ‘लीला से कम नहीं था. फुटबॉल वर्ल्ड कप के उस क्वार्टर फाइनल में अर्जेंटीना और इंग्लैंड के बीच कोई साधारण मैच नहीं खेला गया था. 90 मिनट का एक इतिहास लिखा गया था. बुधवार-गुरुवार की दरमियानी रात अगला चैप्टर लिखने के लिए दोनों टीमें वर्ल्डकप सेमीफाइनल में आमने-सामने होंगी. अटलांटा (यूएसए) के स्टेडियम में इस बार निगाहें मेसी पर होंगी, जो उसी 10 नंबर वाली आसमानी जर्सी में होंगे, जो 40 साल पहले माराडोना पहने हुए थे.
22 जून, 1986 की उस रात को मैच देखने के लिए पिताजी जाग रहे थे. और मुझे भी ‘जल्दी सोने’ के नियम से छूट मिली हुई थी. अर्जेंटीना-इंग्लैंड मैच का रोमांच समझाते हुए पिताजी बता रहे थे कि कैसे दोनों टीमों के बीच ठनी हुई है. वे बीच-बीच में फॉकलैंड युद्ध का जिक्र कर रहे थे. मेरी रुचि सिर्फ इस बात में थी कि मुझे देर रात तक एक लाइव फुटबॉल मैच देखने को मिल रहा है.
रात करीब सवा 11 बजे ब्लैक एंड व्हाइट वेस्टन टीवी का शटर खुला. एलईडी और प्रोजेक्टर पर मैच देखने वाली आज की पीढ़ी के लिए बता दें कि उस दौर में पिक्चर ट्यूब वाले भारीभरकम बक्सेनुमा टीवी शटर वाले वुडन कैबिनेट के साथ आते थे. प्रसारण क्वालिटी बहुत कुछ छत पर लगे एंटीना पर निर्भर होती थी. शुक्र रहा कि गर्मियों की उस रात कोई हवा नहीं चल रही थी. उधर, 1 लाख 14 हजार दर्शकों की क्षमता वाला मेक्सिको सिटी का फुटबॉल स्टेडियम खचाखच भरा हुआ था. भारी शोर के बीच अर्जेंटीना और इंग्लैंड की टीमें मैदान में उतरीं.
मुझे तब 'जियो-पॉलिटिक्स' की समझ नहीं थी, लेकिन कमेंटेटर्स की आवाज से इतना समझ आ गया कि वह महज एक मैच नहीं था. वह एक जंग थी, जो बिना बंदूकों के, 90 मिनट के भीतर स्टेडियम में लड़ी जानी थी. हवा में एक अजीब सा तनाव था, जैसे बारूद का ढेर बस एक चिंगारी का इंतजार कर रहा हो. और उस तनाव के बीच खड़ा था 5 फीट 5 इंच का एक जादूगर माराडोना, जिसकी पीठ पर चमक रहा था नंबर 10.
वो 4 मिनट जिन्होंने फुटबॉल को दो अमर कहानियां दीं
रात 11.30 बजे शुरू हुए मैच में पहले हाफ तक स्कोर कार्ड 0-0 पर था. दोनों टीमें एक-दूसरे को इंच-इंच जमीन के लिए तरसा रही थीं. लेकिन दूसरे हाफ में, खेल के 51वें और 55वें मिनट के बीच कुछ ऐसा हुआ, जिसने इस मैच को दुनिया के इतिहास का सबसे चर्चित मैच बना दिया.
1. 'हैंड ऑफ गॉड' (भगवान का हाथ)
51वें मिनट में माराडोना गेंद को लेकर इंग्लैंड के गोलपोस्ट की तरफ बढ़े. इंग्लैंड के एक डिफेंडर ने गेंद को हवा में उछाल दिया. गेंद हवा में थी और सामने थे इंग्लैंड के 6 फीट ऊंचे गोलकीपर पीटर शिल्टन. उनके सामने 5 फीट 5 इंच के माराडोना का कद बहुत छोटा था. दोनों हवा में उछले. सबको लगा कि शिल्टन आसानी से गेंद को पकड़ लेंगे.
लेकिन अगले ही पल, गेंद गोलपोस्ट के अंदर थी!
माराडोना हवा में मुक्का लहराते हुए साइड लाइन की और दौड़ रहे थे और पीछे-पीछे अर्जेंटीना के बाकी खिलाड़ी. दूसरी ओर इंग्लैंड के खिलाड़ी रेफरी की तरफ दौड़ रहे थे कि माराडोना ने सिर से नहीं, बल्कि हाथ से मारकर गेंद को गोल के अंदर धकेला है. (फुटबॉल में हाथ से गेंद को छूना मना है). लेकिन रेफरी जहां खड़े थे, वहां से उन्हें कुछ गलत नहीं लगा और उन्होंने इसे 'गोल' करार दे दिया. तब कोई VAR यानी वीडियो असिस्टेड रेफरी की व्यवस्था भी नहीं थी.
बाद में जब माराडोना से पूछा गया कि क्या वह गोल हाथ से हुआ था, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए एक ऐसा बयान दिया जो अमर हो गया:
"वह गोल थोड़ा माराडोना के सिर से था, और थोड़ा 'भगवान के हाथ' (Hand of God) से था."
2. 'गोल ऑफ द सेंचुरी' (सदी का सर्वश्रेष्ठ गोल)
इंग्लैंड अभी इस 'धोखे' के सदमे से उबरा भी नहीं था कि ठीक 4 मिनट बाद, यानी 55वें मिनट में, माराडोना ने फुटबॉल के इतिहास की सबसे खूबसूरत डिजाइन बना दी.
माराडोना को अपनी हाफ-लाइन के पास गेंद मिली. इसके बाद जो हुआ, वह किसी हॉलीवुड फिल्म के स्लो-मोशन सीन जैसा था. माराडोना ने गेंद को अपने पैरों से चिपका लिया और दौड़ना शुरू किया. इंग्लैंड के एक, दो, तीन, चार, पांच... एक-एक करके पांच वर्ल्ड-क्लास खिलाड़ियों को उन्होंने ऐसे छकाया जैसे वे मैदान पर खड़े पुतले हों. अंत में गोलकीपर शिल्टन को भी जमीन पर गिराते हुए उन्होंने गेंद को नेट में डाल दिया.
यह इतना जादुई गोल था कि इसे बाद में 'गोल ऑफ द सेंचुरी' घोषित किया गया. दोनों गोल के बीच 4 मिनट तक मैंने कोई राय कायम नहीं की थी, लेकिन माराडोना के दूसरे गोल ने मुझे ही नहीं, पूरी दुनिया को हमेशा के लिए उनका मुरीद बना दिया. अर्जेंटीना वह मैच 2-1 से जीता और बाद में वर्ल्ड कप का चैंपियन भी बना.
तनाव के पीछे की कहानी: फॉकलैंड का घाव और फुटबॉल की जंग
बाद में उभरी कहानियों से समझ आया है कि अर्जेंटीना और इंग्लैंड का यह मैच इतना खतरनाक क्यों था. खेल का मैदान तो सिर्फ बहाना था, असली कड़वाहट छिपी थी इतिहास के पन्नों में.
मैच से ठीक चार साल पहले, यानी 1982 में, दोनों देशों के बीच 'फॉकलैंड युद्ध' (Falklands War) हुआ था. साऊथ अटलांटिक में अर्जेंटीना के नजदीक फॉकलैंड एक छोटा सा द्वीप समूह है, जिसे अर्जेंटीना अपना कहता था, लेकिन उस पर ब्रिटेन (इंग्लैंड) का कब्जा था. सिर्फ 74 दिनों तक चले इस युद्ध में अर्जेंटीना को करारी हार का सामना करना पड़ा था और उसके 600 से ज्यादा युवा सैनिक मारे गए थे. अर्जेंटीना के लोगों के दिल में वह हार एक गहरे जख्म की तरह चुभ रही थी.
जब 1986 के वर्ल्ड कप के क्वार्टर फाइनल में ये दोनों टीमें आमने-सामने आईं, तो अर्जेंटीना के खिलाड़ियों और फैंस के लिए यह सिर्फ सेमीफाइनल में पहुंचने का मुकाबला नहीं था. यह अपने उन मरे हुए सैनिकों का बदला लेने और अपने देश के आत्मसम्मान को वापस पाने का मौका था. अखबारों से लेकर गलियों तक एक ही चर्चा थी- "हिसाब बराबर करना है!"
और ये हिसाब बराबर हुआ भी. माराडोना ने इंग्लैंड पर मिली जीत को फॉकलैंड में मारे गए अर्जेंटीना के सैनिकों को समर्पित कर दिया.
40 साल बाद... इतिहास खुद को दोहरा रहा है
वक्त का पहिया घूम चुका है. साल 2026 आ गया है. माराडोना अब इस दुनिया में नहीं हैं. न ही अर्जेंटीना और इंग्लैंड के बीच पहले जैसी तल्खी. लेकिन फुटबॉल का रोमांच आज भी वैसा का वैसा ही है. नियति ने एक बार फिर अर्जेंटीना और इंग्लैंड को आमने आमने-सामने ला खड़ा किया है. 1986 वाले मुकाबले के बाद से दोनों टीमें वर्ल्ड कप में दो बार भिड़ी हैं. 1998 के प्री-क्वार्टर फाइनल में अर्जेंटीना जीता, जबकि 2002 के ग्रुप मुकाबले में इंग्लैंड ने जीत दर्ज की. लेकिन, इंग्लैंड टीम की कसक ज्यादा है, क्योंकि वह 1966 से वर्ल्ड कप ट्रॉपी उठाने के लिए तरस रही है, और साथ ही अर्जेंटीना से 86 का हिसाब भी बराबर करना है.
इंग्लैंड की टीम अपनी नई युवा टीम के साथ तैयार है. लेकिन सामने होंगे मेसी. जिन्होंने 2022 में अर्जेंटीना को वर्ल्ड कप जिताकर माराडोना की विरासत को मुकम्मल किया था, अब अपने करियर के आखिरी पड़ाव पर हैं. उनकी उम्र तकरीबन उतनी ही है, जितना पुराना माराडोना का वो करिश्मा. 2026 का यह सेमीफाइनल सिर्फ एक मैच नहीं है. यह माराडोना की रूह और मेसी के जादू का मिलन है. यह इंग्लैंड के लिए 40 साल पुराने उस 'हैंड ऑफ गॉड' का हिसाब चुकता करने का मौका है, तो अर्जेंटीना के लिए अपनी बादशाहत को कायम रखने की जंग.
चाहे आप फुटबॉल के पक्के फैन हों या न हों, इस सेमीफाइनल को मिस मत करिएगा. क्योंकि जब आसमानी और सफेद जर्सी मैदान पर उतरेगी, तो सिर्फ गेंद इधर-उधर नहीं घूमेगी... इतिहास के पन्ने पलटेंगे!
धीरेंद्र राय