'1935 का आदेश कानून नहीं', भोजशाला विवाद पर हाईकोर्ट में MP सरकार का रुख साफ, एडवोकेट जनरल ने कोर्ट में रखीं धार दरबार की पुरानी फाइलें

भोजशाला केस अपडेट: MP सरकार ने हाई कोर्ट में कहा कि 1935 का रियासती आदेश कानूनी रूप से वैध नहीं है. एडवोकेट जनरल ने ASI की रिपोर्ट और अयोध्या केस के सिद्धांतों पर जोर दिया.

Advertisement
भोजशाला पर MP सरकार ने हाई कोर्ट से मांगा स्थायी समाधान.(Photo:ITG) भोजशाला पर MP सरकार ने हाई कोर्ट से मांगा स्थायी समाधान.(Photo:ITG)

aajtak.in

  • धार/इंदौर,
  • 07 मई 2026,
  • अपडेटेड 9:40 PM IST

धार की विवादित भोजशाला को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई में मध्य प्रदेश सरकार ने अपना रुख साफ कर दिया है. हाई कोर्ट की इंदौर पीठ के समक्ष एडवोकेट जनरल (AG) प्रशांत सिंह ने मुस्लिम पक्ष की ओर से पेश किए गए 91 साल पुराने ऐतिहासिक दस्तावेजों की कानूनी हैसियत पर गंभीर सवाल उठाए हैं. 

दरअसल, मुस्लिम पक्ष ने तत्कालीन धार रियासत के 91 साल पुराने एक आदेश का हवाला देते हुए दावा किया कि भोजशाला को एक मस्जिद घोषित किया गया था और उसके अंदर नमाज जारी रखने की अनुमति दी गई थी.

Advertisement

1935 के 'ऐलान' की चुनौती

इस पर मध्य प्रदेश के एडवोकेट जनरल प्रशांत सिंह ने 24 अगस्त 1935 को तत्कालीन धार रियासत के दीवान नाडकर के जारी किए गए 'ऐलान' की कानूनी वैधता को चुनौती दी. उन्होंने इंदौर पीठ के जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी के समक्ष तर्क दिया कि यह रियासती आदेश किसी विधायी प्रक्रिया का परिणाम नहीं था और इसलिए इसे कानून नहीं माना जा सकता.

सिंह ने आगे कहा कि पूर्व धार रियासत का यह 'ऐलान' एक वर्ग के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करता है और इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता.

इस आदेश की पृष्ठभूमि पर ज़ोर देते हुए राज्य के एडवोकेट जनरल ने धार दरबार की कार्यवाही का विवरण पेश किया और कहा कि यह आदेश तब जारी किया गया था जब विवादित स्मारक के नामकरण को लेकर शहर में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ गई थी.

Advertisement

'भोजशाला' नाम हटाने की 'अतार्किक मांग'

कार्यवाही का हवाला देते हुए प्रशांत सिंह ने कहा कि विवादित स्मारक ऐतिहासिक रूप से भोजशाला के नाम से जाना जाता रहा है, लेकिन मुस्लिम समुदाय के सदस्यों ने पहले तत्कालीन धार रियासत से स्मारक के बाहर लगे बोर्ड पर 'कमाल मौला मस्जिद' शब्द जोड़ने की याचिका दायर की और बाद में अनुरोध किया कि बोर्ड से भोजशाला नाम हटा दिया जाए. 

एडवोकेट जनरल के अनुसार, प्रशासनिक परिषद के चेयरमैन नाडकर ने कार्यवाही में लिखा था कि इस 'अतार्किक मांग' पर विचार करना असंभव है, क्योंकि परंपरा और इतिहास के आधार पर इस स्मारक को बहुत लंबे समय से भोजशाला के नाम से जाना जाता रहा है.

ASI रिपोर्ट और अयोध्या फैसले का संदर्भ

सिंह ने विवादित परिसर की ASI की वैज्ञानिक सर्वेक्षण रिपोर्ट से कई अंश पढ़कर सुनाए, जिनमें हिंदू देवी-देवताओं को दर्शाने वाले मूर्तिकला के अवशेषों की खोज और धार के परमार राजाओं के शासनकाल से जुड़ी एक विशाल संरचना के अस्तित्व का जिक्र था.

एडवोकेट जनरल ने अयोध्या राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला दिया और हाई कोर्ट से अनुरोध किया कि वह स्थापित न्यायिक सिद्धांतों के आधार पर भोजशाला मामले के तथ्यों की जांच करे.

Advertisement

स्थायी समाधान की मांग

बता दें कि ASI के 2003 के एक आदेश के तहत हिंदुओं को विवादित स्मारक पर हर मंगलवार और मुसलमानों को हर शुक्रवार पूजा करने की अनुमति है. सिंह ने इसे एक अस्थायी व्यवस्था बताया और कहा कि भोजशाला विवाद का एक स्थायी समाधान खोजा जाना चाहिए. उन्होंने इस विवाद के कारण पिछले कुछ वर्षों में धार में सांप्रदायिक तनाव और हिंसा की घटनाओं का भी विस्तार से जिक्र किया. इस मामले की सुनवाई शुक्रवार को भी जारी रहेगी.

हिंदू समुदाय भोजशाला को देवी सरस्वती को समर्पित एक मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इस स्मारक को कमल मौला मस्जिद कहता है. यह विवादित परिसर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में है.

हाई कोर्ट 6 अप्रैल से भोजशाला मंदिर-कमल मौला मस्जिद परिसर के धार्मिक स्वरूप के संबंध में 5 याचिकाओं और एक रिट अपील पर नियमित रूप से सुनवाई कर रहा है.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement