Parenting Tips: इंडियन पेरेंट्स रोजाना कर रहे ये एक गलती! इसीलिए बच्चे हर वक्त उतार रहे गुस्सा

क्या आप जानते हैं कि आपका बार-बार फोन चेक करना आपके बच्चों के मेंटल हेल्थ के लिए खतरा बन सकता है? नई स्टडी के अनुसार, पैरेंट्स का स्क्रीन टाइम बच्चों में 'इनसिक्योर अटैचमेंट' की समस्या पैदा कर रहा है.

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मोबाइल फोन का असर बच्चों की मेंटल हेल्थ पर हो रहा है. (Photo: AI Generated) मोबाइल फोन का असर बच्चों की मेंटल हेल्थ पर हो रहा है. (Photo: AI Generated)

आजतक लाइफस्टाइल डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 14 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 11:40 AM IST

आज के दौर में स्मार्टफोन हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आपका फोन आपके बच्चों पर कैसा असर डाल रहा है? हाल ही में हुई एक रिसर्च में सामने आया है कि यदि माता-पिता फोन में ज्यादा बिजी रहते हैं तो इसका सीधा असर बच्चों के व्यवहार और अटैचमेंट पर पड़ सकता है. रिसर्चर्स का कहना है कि जो बच्चे अपने पैरेंट्स को फोन में खोया हुआ पाते हैं उनमें बड़े होकर इनसिक्योर अटैचमेंट की समस्या देखी जा सकती है यानी वो अपने पैरेन्ट्स से अधिक अटैच नहीं हो पाते.

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फोन की लत और बच्चों के बीच की दूरी

फ्रंटियर्स इन साइकोलॉजी जर्नल में पब्लिश्ड स्टडी के मुताबिक, रिसर्च टीम ने 12 से 17 साल के करीब 600 टीनेजर्स पर यह सर्वे किया. इस दौरान डिवाइस अटैचमेंट इंटरफेरेंस स्केल (DAIS) का इस्तेमाल किया गया.

रिजल्ट में सामने आया कि जो बच्चे यह महसूस करते हैं कि उनके मम्मी-पापा उनकी बजाए फोन को ज्यादा अटेंशन देते हैं वे अपनी इमोशनल लाइफ में ज्यादा परेशान रहते हैं. वे अक्सर यह शिकायत करते हैं कि फोन के कारण उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है जिससे उनके रिश्ते की क्वालिटी खराब हो रही है.

'इनसिक्योर अटैचमेंट' का क्या है मतलब?

स्टडी में 2 तरह की स्थितियों का जिक्र किया गया, पहली बेचैनी (Anxious), जहां बच्चा अटेंशन पाने के लिए परेशान रहता है और दूसरी अवॉइडेंट (Avoidant), जहां बच्चा खुद को दूर करने लगता है.

रिसर्चर्स के मुताबिक, जो माता-पिता फोन एडिक्ट हो जाते हैं, उनके बच्चे इन दोनों ही कैटेगरी में ज्यादा स्कोर करते हैं. हालांकि, एक्सपर्ट्स का यह भी कहना है कि यह जरूरी नहीं है कि फोन की लत ही बच्चों को इनसिक्योर बनाए बल्कि यह भी हो सकता है कि पहले से इनसिक्योर बच्चे अपने पैरेंट्स के फोन यूज पर ज्यादा चिढ़ते हों.

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डिजिटल दौर में पैरेंटिंग की चुनौती

मीडिया साइकोलॉजिस्ट डॉन ग्रांट के अनुसार, सोशल मीडिया कंपनियां और ऐप्स इस तरह से डिजाइन किए गए हैं कि वे पैरेंट्स को भी अपनी ओर खींच लेते हैं. पैरेंट्स भी इनसे अछूते नहीं हैं. इस स्टडी का मकसद फोन पूरी तरह बंद करने की सलाह देना नहीं है बल्कि यह एक अलार्म की तरह है.

माता-पिता को इस बात का ध्यान रखना होगा कि उनके गैजेट्स और उनके बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम के बीच में सही बैलेंस बना रहे. डिजिटल लाइफ के बीच बच्चों को नजरअंदाज करना उनके भविष्य के मानसिक स्वास्थ्य पर भारी पड़ सकता है.

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