जब दुनिया को मिली टाइपराइटर की सौगात, जिसने बदल दिया लिखने का तरीका

आज हम कंप्यूटर, लैपटॉप और स्मार्टफोन पर कुछ सेकंड में टाइप कर लेते हैं. लेकिन एक समय ऐसा था जब हर दस्तावेज, चिट्ठी और किताब हाथ से लिखी जाती थी. तब लिखना एक लंबी और मेहनत भरी प्रक्रिया हुआ करती थी. ऐसे दौर में आज के दिन ही एक ऐसी मशीन सामने आई, जिसने पूरी दुनिया में लिखने का तरीका बदल दिया. यह मशीन थी टाइपराइटर.

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आज के दिन ही दुनिया के पहले टाइपराइटर का पेटेंट कराया गया था (Photo - Pexels) आज के दिन ही दुनिया के पहले टाइपराइटर का पेटेंट कराया गया था (Photo - Pexels)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 23 जून 2026,
  • अपडेटेड 6:16 AM IST

23 जून 1868 को टाइपराइटर के पहले सफल मॉडल को पेटेंट मिला था. यही वह दिन था, जब इतिहास में पहली बार इस क्रांतिकारी मशीन को आधिकारिक मान्यता मिली और आधुनिक टाइपिंग युग की शुरुआत हुई.टाइपराइटर के आविष्कार का श्रेय अमेरिकी आविष्कारक क्रिस्टोफर लैथम शोल्स, सैमुअल डब्ल्यू. सूले और कार्लोस ग्लिडेन को जाता है.

शोल्स पेशे से प्रिंटर और अखबार के संपादक थे. उन्हें नई-नई चीजें बनाने का शौक था. शुरुआत में शोल्स और उनके साथी सूले ने एक ऐसा उपकरण बनाया था, जो पन्नों पर नंबर छाप सकता था. बाद में मैकेनिक कार्लोस ग्लिडेन ने सुझाव दिया कि इसी तकनीक का इस्तेमाल अक्षरों को कागज पर छापने के लिए भी किया जा सकता है. यहीं से टाइपराइटर का विचार जन्मा.

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कैसे काम करता था पहला टाइपराइटर?
उस समय यह तकनीक किसी चमत्कार से कम नहीं थी. हाथ से लिखने की तुलना में यह कहीं ज्यादा तेज थी और प्रिंटिंग प्रेस की तुलना में कहीं ज्यादा आसान. मशीन में लगे बटन दबाने पर उनसे जुड़े धातु के टाइपबार ऊपर की ओर जाकर स्याही लगी रिबन पर प्रहार करते थे और कागज पर अक्षर छप जाता था. इसके बाद कागज आगे बढ़ता था और अगला अक्षर टाइप किया जाता था.

हालांकि, शुरुआती मॉडल में कई कमियां भी थीं. टाइपबार नीचे से ऊपर की तरफ प्रहार करते थे, इसलिए टाइप करने वाला व्यक्ति तुरंत यह नहीं देख पाता था कि उसने क्या लिखा है. मशीन केवल कैपिटल लेटर टाइप कर सकती थी. इतना ही नहीं, उसमें संख्या '1' के लिए अलग बटन भी नहीं था. लोग उसकी जगह अंग्रेजी का 'L' इस्तेमाल करते थे.

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यहीं से शुरू हुआ QWERTY कीबोर्ड
पहले टाइपराइटर का कीबोर्ड अंग्रेजी वर्णमाला के क्रम में बनाया गया था. लेकिन जैसे-जैसे लोग तेजी से टाइप करने लगे, मशीन के टाइपबार आपस में फंसने लगे. इस समस्या को दूर करने के लिए शोल्स ने अक्षरों की व्यवस्था बदल दी. उन्होंने अक्सर साथ इस्तेमाल होने वाले अक्षरों को एक-दूसरे से दूर रखा, ताकि मशीन जाम न हो. इसी बदलाव से QWERTY कीबोर्ड का जन्म हुआ.

आज कंप्यूटर, लैपटॉप और स्मार्टफोन में इस्तेमाल होने वाला QWERTY लेआउट उसी प्रयोग की देन है. 1868 में पेटेंट मिलने के बाद सबसे बड़ी चुनौती थी इसका बड़े पैमाने पर निर्माण. टाइपराइटर में हजारों छोटे और बेहद सटीक पुर्जों की जरूरत पड़ती थी.

इसी दौरान अमेरिका की मशहूर हथियार निर्माता कंपनी रेमिंगटन एंड संस नए कारोबार की तलाश में थी. अमेरिकी गृहयुद्ध खत्म होने के बाद हथियारों की मांग घट गई थी. रेमिंगटन को टाइपराइटर में भविष्य नजर आया. 1873 में कंपनी ने शोल्स के पेटेंट का लाइसेंस लिया और रेमिंगटन मॉडल-1 टाइपराइटर का उत्पादन शुरू किया. इसके बाद टाइपराइटर तेजी से दुनिया भर के दफ्तरों और संस्थानों में पहुंचने लगा.

दुनिया के बड़े लेखक भी हुए इसके दीवाने
कुछ ही वर्षों में टाइपराइटर दफ्तरों की जरूरत बन गया. साथ ही साहित्य की दुनिया में भी इसकी धूम मच गई. प्रसिद्ध लेखक मार्क ट्वेन, अर्नेस्ट हेमिंग्वे, सिल्विया प्लाथ और जैक केरुआक जैसे कई बड़े नामों ने अपनी रचनाएं टाइपराइटर पर लिखीं.

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टाइपराइटर ने सिर्फ लिखने का तरीका ही नहीं बदला, बल्कि रोजगार के नए अवसर भी पैदा किए. 'टाइपिस्ट' नाम का नया पेशा सामने आया और बड़ी संख्या में महिलाओं के लिए कार्यस्थलों के दरवाजे खुले.

आज भी जिंदा है टाइपराइटर की विरासत
भले ही आज टाइपराइटर की जगह कंप्यूटर और डिजिटल तकनीक ने ले ली हो, लेकिन इसकी विरासत अब भी हमारे बीच मौजूद है. हम जिस QWERTY कीबोर्ड पर रोज टाइप करते हैं, उसकी जड़ें सीधे 158 साल पहले बने उसी टाइपराइटर से जुड़ी हैं.
 

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