काशीः कोरोना के कारण टूटी 17वीं सदी की परंपरा, महाश्मशान पर नहीं हुआ नृत्य

कोरोना के साए में काशी की सदियों पुरानी एक परंपरा टूट गई. लॉकडाउन और आयोजनों पर लगे प्रतिबंध के कारण काशी के महाश्मशान मणिकर्णिका घाट के किनारे बाबा मसान नाथ को नगर वधुएं नृत्यांजलि नहीं दे सकीं. लगभग 350 साल से हर साल वार्षिक श्रृंगार के दिन नगरवधुएं बाबा मसान नाथ को नृत्यांजलि देती आई हैं.

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महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर बाबा मसान नाथ को नृत्यांजलि देती रही हैं नगर वधुएं (फाइल फोटो) महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर बाबा मसान नाथ को नृत्यांजलि देती रही हैं नगर वधुएं (फाइल फोटो)

रोशन जायसवाल

  • वाराणसी,
  • 01 अप्रैल 2020,
  • अपडेटेड 12:40 AM IST

  • श्रृंगार में नहीं हो सका नगर वधुओं का नृत्य
  • कोरोना के खात्मे के लिए काशी में हुआ हवन

कोरोना वायरस के कारण सरकार ने देश में 21 दिन का लॉकडाउन कर रखा है. लगभग सभी प्रमुख मंदिर बंद हो चुके हैं. धर्म की नगरी वाराणसी में भी बाबा विश्वनाथ, काशी के कोतवाल बाबा काल भैरव और संकट मोचन मंदिर समेत अन्य सभी मंदिरों को श्रद्धालुओं के लिए बंद कर दिया गया है. इससे संस्कृति और परंपरा पर भी चोट पहुंच रही है. किसी तरह परंपरा के निर्वहन की औपचारिकता मात्र ही पूरी की जा रही है.

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कोरोना के साए में काशी की सदियों पुरानी एक परंपरा टूट गई. लॉकडाउन और आयोजनों पर लगे प्रतिबंध के कारण काशी के महाश्मशान मणिकर्णिका घाट के किनारे बाबा मसान नाथ को नगर वधुएं नृत्यांजलि नहीं दे सकीं. लगभग 350 साल से हर साल वार्षिक श्रृंगार के दिन नगरवधुएं बाबा मसान नाथ को नृत्यांजलि देती आई हैं. यह परंपरा 17वीं शताब्दी से ही चली आ रही है.

गंगा की बहती शीतल धारा, जलती चिताएं और नगरवधुओं का नृत्य. एक बारगी ऐसी तस्वीरें किसी को भी चौंकाने के लिए काफी हुआ करती थीं. आखिर काशी के महाश्मशान पर गम और दुख के बीच नाच-गाना कैसे? लेकिन इस बार कोरोना के कारण ऐसा नहीं हो सका. मान्यता है कि नगर वधुएं बाबा मसान नाथ के दरबार में नृत्य कर अपने अगले जन्म के बेहतर होने की कामना करती हैं.

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इसके पीछे यह कहानी भी बताई जाती है कि सत्रहवीं शताब्दी में काशी नरेश राजा मान सिंह ने बाबा मसान नाथ के मंदिर का निर्माण कराने के बाद संगीत का कार्यक्रम आयोजित कराना चाहा. कहा जाता है कि महाश्मशान पर आकर सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करने को कोई भी कलाकार तैयार नहीं हुआ. जब सभी कलाकारों ने इसके लिए मना कर दिया, तब नगर वधुओं ने हामी भरी और मसान नाथ के दरबार में अपनी नृत्यांजलि अर्पित की. जलती चिताओं के सामानांतर अपनी कला को प्रस्तुत किया.

उसी वक्त से ये परंपरा लगातार साल-दर-साल चली आ रही थी. कोरोना के कारण इस वर्ष सिर्फ बाबा के मंदिर में औपचारिकता ही पूरी की गई. मंदिर के व्यवस्थापक गुलशन कपूर बताते हैं कि बाबा मसान नाथ के हवन कुंड की अग्नि जैसे कभी बुझती नहीं है. वैसे ही इस साल परंपरा का सिर्फ निर्वहन किया गया और संपूर्ण विश्व की रक्षा के लिए प्रार्थना की गई. उन्होंने बताया कि तीन दिन तक चलने वाला कार्यक्रम कोरोना के कारण नहीं हो सका और अंतिम दिन सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखते हुए बाबा का श्रृंगार किया गया और आरती की गई.

केवल हवन और श्रृंगार कर हुआ परंपरा का निर्वाह

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वहीं, मंदिर समिति के अध्यक्ष चयनू गुप्ता ने बताया कि कोरोना को देखने हुए नगर वधुओं का नृत्य और अन्य कार्यक्रम स्थगित कर दिए गए. कोरोना के खात्मे की कामना के साथ हवन भी किया गया. गौरतलब है कि कोरोना वायरस के कारण लॉकडाउन लागू किए जाने से पहले ही योगी सरकार ने भी प्रदेश में किसी भी तरह के आयोजन पर रोक लगा दी थी.

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