पूर्वोत्तर की राजनीति को बदल देंगे तीन राज्यों के आज के चुनावी नतीजे

तीनों राज्यों के चुनावी नतीजों के कई मायने निकल कर सामने आ रहे हैं जिनका असर यदि राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ता दिख रहा है तो पूर्वोत्तर की राजनीति में भी इसे बड़ा फेरबदल माना जा रहा है.

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पूर्वोत्तर में खिलेगा कमल? पूर्वोत्तर में खिलेगा कमल?

राहुल मिश्र

  • नई दिल्ली,
  • 03 मार्च 2018,
  • अपडेटेड 11:58 AM IST

भारतीय जनता पार्टी पूर्वोत्तर के तीन राज्यों के चुनावी नतीजों का बेसब्री से इंतजार कर रही थी. नतीजों से पहले आए अहम एक्जिट पोल्स ने त्रिपुरा में बीजेपी सरकार के साथ-साथ नगालैंड और मेघालय में भी बीजेपी की सरकार बनते या बीजेपी को सरकार बनाते दिखाया गया. लेकिन जब मतगणना शुरू हुई तो त्रिपुरा और नगालैंड में नतीजे बीजेपी के पक्ष में रहे और मेघालय में कांग्रेस के किले में सेंध लगी. हालांकि इस सेंधमारी के बावजूद कांग्रेस राज्य में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर सामने आई.

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पूर्वोत्तर के इन तीन राज्यों में चुनाव के नतीजों से साफ है कि देश में एक और वामपंथी सरकार को सत्ता से बाहर करने का काम किया गया. हालांकि इस बार यह काम त्रिणमूल और कांग्रेस के बजाए बीजेपी के किया. तीनों राज्यों के चुनावी नतीजों के कई मायने निकल कर सामने आ रहे हैं जिनका असर यदि राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ता दिख रहा है तो पूर्वोत्तर की राजनीति में भी इसे बड़ा फेरबदल माना जा रहा है.

पूर्वोत्तर की राजनीतिक मुख्यधारा में बीजेपी की एंट्री?

पूर्वोत्तर के राज्यों में नतीजे बीजेपी के पक्ष में आए. त्रिपुरा में 25 साल से चली आ रही सीपीआई(एम) सरकार को बाहर का रास्ता देखना पड़ेगा. इसके साथ ही नगालैंड की राजनीतिक मुख्यधारा में बीजेपी की ठोस शुरुआत होने जा रही है और मेघालय में कांग्रेस के किले में सेंधमारी के बाद नई सरकार बनाने में कांग्रेस की अहम भूमिका देखने को मिल सकती है. गौरतलब है कि पूर्वोत्तर के तीन राज्य असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश पहले से बीजेपी के प्रभाव क्षेत्र में हैं, लिहाजा, इन चुनावों के नतीजों के बाद पूर्वोत्तर के 7 राज्यों में 5 राज्यों में बीजेपी अपना परचम लहराने में सफल हो रही है.

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मेघालय में कांग्रेस को किया कमजोर?

मेघालय में कांग्रेस पार्टी की सरकार है. चुनावी मुकाबला कांग्रेस के मुकुल संगमा और नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) के कॉनरेड संगमा के बीच रहा. हालांकि एनपीपी और बीजेपी के बीच कोई चुनावी समझौता नहीं है, लेकिन उम्मीद के मुताबिक एनपीपी ने कांग्रेस को कड़ी टक्कर देते हुए उसे अपने दम पर सत्ता में पहुंचने से रोक लिया है. अब राज्य में एनपीपी के सामने बीजेपी के साथ गठबंधन करते हुए सरकार बनाने के लिए जादुई आंकड़े एकत्र करने का विकल्प है.

निर्दलीय बदल सकते हैं सत्ता का रुख

मेघालय के नतीजों से साफ है कि राज्य में कांग्रेस के गढ़ में सेंधमारी हुई है. बीते तीन चुनावों कांग्रेस राज्य में सबसे बड़ी पार्टी रहते हुए राज्य में सरकार बनाने में सफल रही है. लेकिन इस बार दो कारणों से राज्य में सबसे बड़ा पार्टी के तौर पर आने के बावजूद वह सत्ता से दूर देखी जा रही है. पहला, एनपीपी और बीजेपी ने कांग्रेस की सीट और वोटशेयर में सेंधमारी करते हुए एंटी इंकम्बेंसी का फायदा उठाया है. वहीं दूसरा बड़ा कारण जो कांग्रेस को एंटीइनकम्बेंसी का शिकार दिखा रही है वह बड़ी संख्या में निर्दलीय उम्मीदवारों का चुनाव जीतना है.   

मेघालय एक ईसाई बहुल राज्य है और यहां बीजेपी का प्रभाव बढ़ने का साफ मतलब है कि राष्ट्रीय स्तर पर उसकी स्वीकार्यता बढ़ जाएगी. वहीं पूर्वोत्तर के लिए यह इसलिए भी अहम रहेगा क्योंकि यह नतीजे पहली बार राज्य की राजनीति को केन्द्रीय राजनीति के साथ देखने जैसा है. वहीं त्रिपुरा में लेफ्ट पार्टी की हार से साफ है कि अब वामपंथी दल को रोकने का काम बीजेपी ने सफलता पूर्वक किया है.

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