UGC 2026 Regulation Row: नए नियमों के खिलाफ लखनऊ यूनिवर्सिटी में उतरे छात्र, दिल्ली में भी प्रोटेस्ट

UGC के ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता विनियम, 2026’ को लेकर राजनीतिक विवाद गहरा गया है. समर्थक इसे भेदभाव खत्म करने की पहल बता रहे हैं, जबकि विरोधी दुरुपयोग और ध्रुवीकरण का खतरा जता रहे हैं.

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यूजीसी विवाद पर दिल्ली में प्रोटेस्ट (Photo: Screengrab) यूजीसी विवाद पर दिल्ली में प्रोटेस्ट (Photo: Screengrab)

आशुतोष मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 27 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 4:23 PM IST

UGC Regulations Row LIVE Updates: हायर एजुकेशन को लेकर नया विवाद शुरू हो गया है. UGC के नए 'उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता विनियम, 2026' से राजनीतिक तूफान शुरू हो गया है. राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में नए नियमों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहा है. सवर्ण समुदायों के छात्रों ने 27 जनवरी यानी आज यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के हेडक्वार्टर के बाहर विरोध प्रदर्शन करने का ऐलान किया था. बढ़ते विवाद के बीच यूनिटी का आह्वान करते हुए, छात्र समूहों ने अपने साथियों से नए नियमों का विरोध दर्ज कराने के लिए बड़ी संख्या में इकट्ठा होने की अपील की है.

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लखनऊ यूनिवर्सिटी में छात्रों का प्रदर्शन

यूजीसी के नए गैजेट के खिलाफ लखनऊ यूनिवर्सिटी में छात्रों ने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किया. छात्रों ने इन नियमों को "काला कानून" करार देते हुए वापस लेने की मांग की और आरोप लगाया कि ये नियम सामान्य वर्ग (जनरल कैटेगरी) के छात्रों के खिलाफ भेदभावपूर्ण हैं तथा कैंपस में झूठे मामलों और विभाजन को बढ़ावा देंगे. हालांकि, यूनिवर्सिटी प्रशासन ने प्रदर्शनकारी छात्रों पर परीक्षा बाधित करने का आरोप लगाते हुए कार्रवाई करने की चेतावनी दी है. 

इसके अलावा उत्तर प्रदेश में भी कई जगहों पर सोमवार को विरोध प्रदर्शन देखे और आज भी प्रोटेस्ट बुलाए गए हैं. इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट में एक पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (PIL) भी दायर की गई है, जिसमें UGC के हायर एजुकेशन संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने वाले रेगुलेशन, 2026 (13 जनवरी को नोटिफाइड) को चुनौती दी गई है.

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नियमों से जुड़ा गैजेट इस महीने की शुरुआत में नोटिफाई किया गया था. ये नियम विश्वविद्यालयों में जाति-आधारित भेदभाव से निपटने के लिए मज़बूत सिस्टम बनाने का आदेश देते हैं. वहीं, दूसरी तरफ कई लोग इसका विरोध कर रहे हैं. 

क्यों हो रहा है प्रोटेस्ट?

आलोचकों का कहना है कि ये एकतरफ़ा और अस्पष्ट हैं, इनका गलत इस्तेमाल हो सकता है. सरकार द्वारा जारी किया गया यह नोटिफिकेशन विरोध प्रदर्शन, इस्तीफ़ों और राजनीतिक बेचैनी की वजह बनता जा रहा है. मामले पर बीजेपी अंदर उठापटक मची हुई है. आलोचकों ने इन दोनों इस्तीफ़ों को इस बात के सबूत के तौर पर पेश किया है कि UGC नियमों का विरोध सिर्फ़ छात्र राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक और राजनीतिक सिस्टम में भी पहुंच गया है. 

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आखिर विवाद क्या है?

यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) ने सभी हायर एजुकेशन संस्थानों के लिए भेदभाव की शिकायतों से निपटने के लिए इक्वल अपॉर्चुनिटी सेंटर, इक्विटी कमेटी और 24/7 शिकायत हेल्पलाइन बनाना ज़रूरी कर दिया है, खासकर SC, ST और OBC स्टूडेंट्स के लिए. UGC का कहना है कि इन नियमों का मकसद कैंपस में निष्पक्षता और सबको शामिल करना सुनिश्चित करना है. इसी नियम को लेकर कुछ लोग विरोध कर रहे हैं.

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विरोधी क्या तर्क दे रहे हैं? 

नए नियमों का विरोध करने वाले लोग ये तर्क दे रहे हैं- "जारी किए गए नए नियम भेदभाव के आरोपियों के लिए सुरक्षा उपायों को साफ तौर पर परिभाषित नहीं करते हैं. इनसे दोषी मानने की धारणा बनने का खतरा है, खासकर जनरल कैटेगरी के स्टूडेंट्स और फैकल्टी के खिलाफ. नियमों का पालन न करने पर संस्थानों को मान्यता रद्द होने या फंडिंग बंद होने सहित गंभीर दंड का सामना करना पड़ सकता है."

'हर नागरिक के सम्मान और सुरक्षा...'

भारतीय जनता पार्टी के लीडर और पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ संजय सिंह ने सोशल मीडिया पोस्ट में न्याय, निष्पक्षता और संतुलित प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि न्याय तभी सार्थक होता है, जब वह सभी के लिए समान और निष्पक्ष हो.

उन्होंने अपने पोस्ट में लिखा, "मौजूदा हालात से शिक्षण संस्थानों में चिंता और आशंका का माहौल बन रहा है. बिना संतुलित प्रतिनिधित्व के बनाई गई समितियां न्याय नहीं कर सकतीं. ऐसी समितियां सिर्फ औपचारिक फैसले देती हैं, जिससे समस्याओं का समाधान नहीं हो पाता."

संजय सिंह ने अपने पोस्ट में प्रधानमंत्री मोदी से गुजारिश करते हुए कहा, "न्याय के पथ पर चलते हुए हर नागरिक के सम्मान और सुरक्षा की रक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए. निर्णय प्रक्रिया में सभी वर्गों की भागीदारी जरूरी है, जिससे किसी भी तरह की असमानता न रहे."

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बीजेपी नेता ब्रज भूषण सिंह के बेटे और गोंडा से विधायक प्रतीक भूषण सिंह ने कहा, "इतिहास के दोहरे मापदंडों पर अब गहन विवेचना होनी चाहिए, जहां बाहरी आक्रांताओं और उपनिवेशी ताकतों के भीषण अत्याचारों को ‘अतीत की बात’ कहकर भुला दिया जाता है, जबकि भारतीय समाज के एक वर्ग को निरंतर ‘ऐतिहासिक अपराधी’ के रूप में चिन्हित कर वर्तमान में प्रतिशोध का निशाना बनाया जा रहा है."

'देश धर्मवाद और मुकदमों में बंटा रहे...'

किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा, "इस एक्ट से देश में जातिगत तनाव और झगड़े बढ़ सकते हैं. सरकार चाहती है कि देश जातिवाद, धर्मवाद और मुकदमों में बंटा रहे. इस कानून का असर आने वाले समय में दिखाई देगा, लेकिन ऐसे कदम समाज में जातिगत दुश्मनी को बढ़ावा देते हैं. इस तरह के फैसले देश की एकता के लिए ठीक नहीं हैं."

इस्तीफ़े क्यों हुए?

एक सीनियर ब्यूरोक्रेट के सरकारी नौकरी से इस्तीफ़ा देने के बाद यह विवाद राजनीतिक रूप से बढ़ गया. उन्होंने पॉलिसी से असहमति जताई और इसके विरोध को जिस तरह से हैंडल किया जा रहा था, उसे इस्तीफ़े की वजह बताया. इसके तुरंत बाद, बीजेपी युवा विंग के एक नेता ने भी इस्तीफ़ा दे दिया. उन्होंने कहा कि ये नियम सुधार के बजाय बंटवारा बढ़ा रहे हैं और छात्रों और शिक्षकों द्वारा उठाई गई चिंताओं को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है. 

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सरकार ने क्या जवाब दिया?

केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने इस पर सीधा जवाब देने से मना कर दिया कि नियमों की समीक्षा की जाएगी या उन्हें रोका जाएगा. उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि सरकार 'बातचीत के लिए तैयार है' और नियमों का मकसद समानता को बढ़ावा देना है, न कि टकराव को. हालांकि, सलाह-मशविरे या संभावित संशोधनों के लिए कोई समय-सीमा नहीं बताई गई है.

जो एक रेगुलेटरी बदलाव के तौर पर शुरू हुआ था, वह अब एक राजनीतिक और वैचारिक टकराव का मुद्दा बन गया है, जिसमें जातिगत भेदभाव की चिंताओं का मुकाबला ज़रूरत से ज़्यादा दखल, सही प्रक्रिया की कमी और कैंपस में ध्रुवीकरण के डर से हो रहा है. इस्तीफे बढ़ते जा रहे हैं और विरोध प्रदर्शन फैल रहे हैं. ऐसे में केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ रहा है कि वह साफ करे कि UGC के नियम अपने मौजूदा रूप में रहेंगे या उन पर दोबारा विचार किया जाएगा.

 
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