श्रीरामचरित मानस कथाः आखिर क्यों ऋषि दुर्वासा को मारने दौड़ा सुदर्शन चक्र, जानिए ये कथा

चित्रकूट में श्रीराम और सीता कुछ समय के लिए रहे थे. एक दिन श्रीराम ने वनफूलों से कुछ आभूषण बनाए और सीताजी को पहनाया. उसी दौरान इंद्र पुत्र जयंत आया. उसे लगा कि भले ही महाविष्णु नर अवतार में राम हैं, लेकिन हैं तो मनुष्य ही. ऐसे में उस मूर्ख को शरारत सूझी और वह कौवे का रूप बनाकर आया और सीताजी के पैर में चोंच मार दी. वह श्रीराम के बल की सीमा जानना चाहता था.

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जयंत ने कौवे का रूप धरकर सीताजी के पैर में मारी चोंच. Credits : Photo Generative Ai by Vani Gupta/Aaj Tak) जयंत ने कौवे का रूप धरकर सीताजी के पैर में मारी चोंच. Credits : Photo Generative Ai by Vani Gupta/Aaj Tak)

विकास पोरवाल

  • नई दिल्ली,
  • 19 जनवरी 2024,
  • अपडेटेड 7:06 AM IST

श्रीराम चरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास ने रामकथा की कहानियों को आगे बढ़ाते हुए, छोटे-छोटे अन्य प्रसंगों का भी प्रयोग किया है. ये प्रसंग कई बार मूलकथा की स्थिति का वर्णन करने के लिए उदाहरण के तौर पर सुनाई गई हैं. तुलसीदास ने उनका पूरी तरह वर्णन न करके, सिर्फ उसके मूलभाव का चौपाई में प्रयोग करके सामने रखा है. ऐसा ही एक प्रसंग श्रीराम सीता के वन गमन का है. यह कथा चित्रकूट के समय की है. 

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चित्रकूट में श्रीराम और सीता कुछ समय के लिए रहे थे. एक दिन श्रीराम ने वनफूलों से कुछ आभूषण बनाए और सीताजी को पहनाया. उसी दौरान इंद्र पुत्र जयंत आया. उसे लगा कि भले ही महाविष्णु नर अवतार में राम हैं, लेकिन हैं तो मनुष्य ही. ऐसे में उस मूर्ख को शरारत सूझी और वह कौवे का रूप बनाकर आया और सीताजी के पैर में चोंच मार दी. वह श्रीराम के बल की सीमा जानना चाहता था.
 

तुलसीदासजी यहां लिखते हैं कि...
सुरपति सुत धरि बायस बेषा। सठ चाहत रघुपति बल देखा॥
जिमि पिपीलिका सागर थाहा। महा मंदमति पावन चाहा॥

जयंत की इस कुटिलता को देखकर श्रीराम ने बिना क्रोध किए ही बस उसे दंड देने के लिए एक तिनका उठाया और जयंत की ओर लक्ष्य करके फेंक दिया. श्रीराम के हाथ से छूटे तिनके ने ब्रह्मास्त्र का रूप धर लिया और जयंत का पीछा करने लगा. जयंत ब्रह्मलोक गया, इंद्र के पास गया, शिवलोक गया, लेकिन किसी ने उसकी रक्षा नहीं की. पूरे ब्रह्मांड में जयंत जहां जाता, तिनका वहीं पीछा करते हुए पहुंच जाता.

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जयंत का पीछा करने लगा श्रीराम का तीर
जयंत की इसी स्थिति का वर्णन करने के लिए तुलसीदास ने ऋषि दुर्वासा का उदाहरण लिया है. उन्होंने लिखा कि, जयंत काफी डरा और निराश हुआ. उसका मन भय और त्रास से भर गया. उसकी स्थिति वैसे ही हो गई, जैसे एक बार ऋषि दुर्वासा की हो गई थी, क्योंकि उनके पीछे श्रीहरि विष्णु का चक्र पड़ गया था. ऋषि दुर्वासा की इसी कथा को तुलसीदास ने एक पंक्ति में कह दिया है. वह लिखते हैं.

भा निरास उपजी मन त्रासा। जथा चक्र भय रिषि दुर्बासा॥
ब्रह्मधाम सिवपुर सब लोका। फिरा श्रमित ब्याकुल भय सोका॥
भावः वह (जयंत) निराश हो गया, उसके मन में भय उत्पन्न हो गया, जैसे दुर्वासा ऋषि को चक्र से भय हुआ था. वह ब्रह्मलोक, शिवलोक आदि समस्त लोकों में थका हुआ और भय-शोक से व्याकुल होकर भागता फिरा.

अब सवाल ये है कि ऋषि दुर्वासा के पीछे सुदर्शन चक्र क्यों पड़ गया था. इसका उत्तर एक पौराणिक कथा में मिलता है. 

ऋषि दुर्वासा का जन्म महासती अनुसूइया के गर्भ से हुआ था. अत्रि उनके पिता थे. अत्रि-अनुसूइया को त्रिदेवों ने अपने-अपने अंश से एक पुत्र के जन्म का वरदान दिया था. इसके फलस्वरूप ब्रह्म देव के अंश से चंद्रमा, विष्णुजी के अंश से भगवान दत्तात्रेय और महादेव के रूद्र अंश से दुर्वासा का जन्म हुआ था. क्रोध से जन्म होने के कारण दुर्वासा बहुत क्रोधी ऋषि थे. उनके क्रोध के परिणाम से बहुत सी कथाओं का जन्म हुआ है. जैसे समुद्र मंथन, लक्ष्मी-नारायण विवाह, शिवजी का चंद्रशेखर स्वरूप में प्रकट होना, अग्नि का लु्प्त होना, देवराज इंद्र से स्वर्ग छूटना और यहां तक कि वह दुर्वासा ही थे, जिनका श्राप यदुवंश के नाश का कारण बना. 

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ऋषि दुर्वासा की कथा
इन्हीं ऋषि दुर्वासा के क्रोध और अहंकार के दमन की एक कथा है. अक्सर सुना होगा कि संत या ऋषि राजा के घमंड को चूर करते रहे हैं, लेकिन इस कथा में एक क्षत्रिय राजा ने ऋषि के अहंकार को तोड़ा. वह भी किसी साधारण ऋषि का नहीं, बल्कि दुर्वासा ऋषि का. यह कथा महाराज अंबरीष की है. अंबरीष उसी इक्ष्वाकु वंश में जन्मे थे, जिसमें आगे चलकर श्रीराम का भी जन्म हुआ. महाराज अंबरीष बहुत धर्मपारायण थे और एकादशी का व्रत कर द्वादशी में पारण करते थे. 

राजा अंबरीष ने किया था एकादशी का व्रत
एक बार वह जैसे ही वह एकादशी का पारण करने जा रहे थे, कि इसी समय ऋषि दुर्वासा का उनके महल में आगमन हो गया. ऐसे में उन्होंने पहले ऋषि को भोजन कराकर फिर, पारण करने की बात सोची. जब उन्होंने दुर्वासा से भोजन करने का आग्रह किया तो ऋषि दुर्वासा ने कहा, मैं नदी स्नान करके और जल तर्पण करके आता हूं, फिर भोजन करेंगे. राजा को इंतजार करने को कहकर ऋषि नदी स्नान के लिए चले गए. वहां वह स्नान के बाद ध्यान करने बैठ गए और समय काफी बीत गया.

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ऋषि दुर्वासा ने दिया राजा को नष्ट होने का श्राप
इधर, द्वादशी तिथि खत्म होने को थी. इसलिए ब्राह्मणों ने कहा, राजन सिर्फ जल पीकर पारण कर लें, इससे व्रत भी पूरा होगा और भोजन का दोष भी नहीं लगेगा. ब्राह्मणों के कहने पर राजा ने जल पीना शुरू किया. अभी वह जल पी ही रहे थे कि, इतने में ऋषि दुर्वासा लौट आए.  दुर्वासा ने देखा कि मुझे भोजन कराए बिना अम्बरीष ने खुद जल पी लिया. इसलिए वह क्रोधित हो गए और मंत्र शक्ति से एक कृत्या राक्षसी को प्रकट कर राजा के नाश का आदेश दे दिया. 

राजा की रक्षा के लिए सामने आया सुदर्शन चक्र
वह कृत्या जैसे ही राजा की ओर बढ़ी, राजा ने हरिनाम स्मरण करना शुरू कर दिया. निर्दोष भक्त पर संकट आया देखकर सुदर्शन चक्र प्रकट हो गया और राक्षसी का वध करके दुर्वासा की दौड़ा. सुदर्शन चक्र को अपनी ओर आते देखकर दुर्वासा घबराकर भागे, मगर चक्र पीछे लग गया.

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दुर्वासा ऋषि के पीछे पड़ गया सुदर्शन चक्र
दुर्वासा ऋषि कहीं भी छिपते तो चक्र पीछा करता. ब्रह्मलोक, शिवलोक हर जगह दुर्वासा दौड़े, लेकिन कोई उनकी रक्षा नहीं कर सका. हारकर वह विष्णुजी के पास पहुंचे, वहां भी चक्र चक्कर लगाता पहुंचा. विष्णुजी ने कहा कि दुर्वासा! तुमने अपनी तप शक्ति श्राप देने में नष्ट कर दी. सोचो, अम्बरीष का क्या अपराध था? अब चक्र मेरे हाथ से निकल चुका है इसलिए जिसकी रक्षा के लिए यह तुम्हारे पीछे घूम रहा है, उसकी शरण में जाओ, केवल अम्बरीष ही इसे रोक सकते हैं.

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अम्बरीष ने बचाई दुर्वासा की जान
दुर्वासा उल्टे पांव अम्बरीष के पास पहुंचे. अम्बरीष अब तक बिना अन्न ग्रहण किए उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे. दुर्वासा को देखते ही प्रणाम कर बोले मुनिवर! मैं अब तक भोजन के लिए आपकी प्रतीक्षा कर रहा हूं, मुझ पर कृपा कीजिए. दुर्वासा ने चक्र की ओर इशारा करके कहा, राजन पहले इससे मेरी रक्षा कीजिए. अम्बरीष हाथ जोड़कर बोले, आप क्रोध शांत कर मुझे क्षमा करें. यह चक्र भी आपको क्षमा कर देगा. ऋषि ने राजा को क्षमा किया और राजा ने चक्र को प्रणाम किया. इसके बाद चक्र गायब हो गया और ऋषि दुर्वासा के प्राण बच गए. श्रीराम चरित मानस के जयंत की कुटिलता वाले प्रसंग में संत तुलसीदास ने ऋषि दुर्वासा की इसी कथा का जिक्र किया है. 

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