कुर्बानी पर विवाद जारी... बकरीद से पहले जानिए गोहत्या बैन पर कहां क्या हैं नियम?

भारत में गोहत्या पर अलग-अलग राज्यों के कानून हैं और सुप्रीम कोर्ट ने भी इस विषय पर कई अहम फैसले दिए हैं. यह मामला धार्मिक भावना के साथ-साथ संविधान और कानून व्यवस्था से जुड़ा हुआ है.

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बकरीद से पहले कुर्बानी को लेकर विवाद जारी है. कई राज्यों में गोवध न हो इसके लिए स्पष्ट निर्देश हैं बकरीद से पहले कुर्बानी को लेकर विवाद जारी है. कई राज्यों में गोवध न हो इसके लिए स्पष्ट निर्देश हैं

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 25 मई 2026,
  • अपडेटेड 2:14 PM IST

बकरीद के त्योहार से पहले 'कुर्बानी' को लेकर छिड़ी बहस अब पशुवध तक आ गई है. चर्चा इस पर भी हो रही है कि कुर्बानी के लिए कौन से पशु जायज हैं और कौन से नहीं. वहीं ये बहस होते-होते गोहत्या तक भी पहुंच चुकी है.

इस पूरी बहस की शुरुआत कुछ हफ्ते भर पहले हुई. पश्चिम बंगाल सरकार ने हाल ही में 'वेस्ट बंगाल एनिमल स्लॉटर कंट्रोल एक्ट 1950' के तहत एक सार्वजनिक नोटिस जारी किया था, जिसके बाद पश्चिम बंगाल में इस नए विवाद ने जन्म लिया. इस नोटिस के जवाब में एजेयूपी प्रमुख हुमायूं कबीर ने सरकार को सीधी चुनौती दे दी है.

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उन्होंने कहा कि कुर्बानी के लिए गाय, बकरी, ऊंट और दुम्बा जैसे सभी जायज पशुओं की बलि दी जाएगी और इसे कोई रोक नहीं सकता. हुमायूं कबीर ने कहा, "कोई भी इस परंपरा पर आपत्ति करेगा, तो उसे सुना नहीं जाएगा और कुर्बानी का सिलसिला हमेशा की तरह जारी रहेगा."

इस बवाल के बाद ये मामला कोर्ट तक गया, जहां कोलकाता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार की पशु वध संबंधी गाइडलाइन्स पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है. अदालत ने बीते गुरुवार को कहा कि बगैर जरूरी फिटनेस सर्टिफिकेट के गाय, भैंस, बैल या फिर बछड़ों का वध नहीं किया जा सकता है. हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसला का हवाला देते हुए कहा कि ईद-उल-जुहा में गाय की कुर्बानी इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है.

बंगाल सरकार ने 13 मई को गोहत्या से जुड़े 1950 के कानून और 2018 के कोलकाता हाईकोर्ट के आदेशों का हवाला देते हुए एक नोटिस जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि बिना फिटनेस सर्टिफिकेट के किसी भी मवेशी और भैंस की हत्या पर पूरी तरह से बैन रहेगा.

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बंगाल सरकार ने बताया कि फिटनेस सर्टिफिकेट नगरपालिका अध्यक्ष, पंचायत समिति के प्रमुख और एक सरकारी पशु चिकित्सक के साथ मिलकर ही जारी किया जा सकता है. ये सर्टिफिकेट तभी जारी होगा, जब अथॉरिटी सहमत हो कि जानवर 14 साल से अधिक उम्र का है, वह प्रजनन के लायक नहीं है, बूढ़ा है, चोटिल और अपंग है या फिर लाइलाज बीमारी के कारण अक्षम है.

राजधानी दिल्ली में की बीजेपी सरकार ने भी बकरीद पर गाइलाइन जारी की है. दिल्ली में भी सड़कों और गलियों में कुर्बानी पर रोक लगाई है. कुर्बानी केवल वैध जगहों पर ही की जा सकती है. इसके अलावा बकरीद पर गौवंश, गाय, बछड़ा, ऊंट और अन्य प्रतिबंधित जानवरों की कुर्बानी करने पर सख्त कार्रवाई की जाएगी. इसी तरह उत्तर प्रदेश में भी बकरीद और कुर्बानी को लेकर गाइडलाइंस जारी की गई है. 

इन तमाम गाइडलाइन्स को देखते हुए एक बार इस पर नजर डालते हैं कि गोहत्या पर कानून क्या कहता है और इसके क्या नियम हैं?

भारत में गोहत्या और गोवंश वध को लेकर अलग-अलग राज्यों में अलग कानून लागू हैं. यानी इस पर कोई केंद्रीय कानून नहीं है. हालांकि कई राज्यों में पूर्ण प्रतिबंध है, जबकि कुछ राज्यों में उम्र, स्वास्थ्य या पशु की उपयोगिता के आधार पर अनुमति दी जाती है. हाल के वर्षों में गोहत्या और बीफ को लेकर कई विवाद सामने आए हैं, जिनमें अदालतों को भी हस्तक्षेप करना पड़ा है. वहीं 'कुर्बानी' पर चर्चा को लेकर ये विवाद फिर से सामने आ गया है.

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भारतीय संविधान के नीति निदेशक तत्वों में शामिल आर्टिकल 48 राज्यों को निर्देश देता है कि वे कृषि और पशुपालन को वैज्ञानिक आधार पर संगठित करें साथ ही गायों, बछड़ों और दुधारू और भार ढोने वाले पशुओं के वध पर रोक लगाने के लिए कदम उठाएं. यह मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि राज्य के लिए एक संवैधानिक दिशा-निर्देश है.

इसके अलावा संविधान के आर्टिकल 51A(g) में नागरिकों का यह मौलिक कर्तव्य बताया गया है कि वे जीव-जंतुओं के प्रति दया भाव रखें और पर्यावरण की रक्षा करें.

देश में कहां-कहां लागू है गोहत्या पर बैन?

भारत में गोहत्या पर कोई एक समान केंद्रीय कानून नहीं है. यह विषय राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आता है. इसलिए अलग-अलग राज्यों ने अपने हिसाब से कानून बनाए हैं. गुजरात, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र और दिल्ली समेत कई राज्यों में गाय, बैल और बछड़ों के वध पर लगभग पूर्ण प्रतिबंध है.

वहीं केरल, नागालैंड, मेघालय, मिजोरम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में कुछ शर्तों के साथ गोवंश वध की अनुमति दी जाती रही है. पश्चिम बंगाल में 1950 का कानून विशेष परिस्थितियों में गोहत्या की अनुमति देता है, जिसे लेकर हाल में राजनीतिक बहस भी हुई.

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

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गोहत्या पर सबसे अहम फैसला सुप्रीम कोर्ट ने 2005 में 'गुजरात स्टेट Vs मिर्जापुर मोती कुरेशी कसाब जमात' मामले में दिया था. अदालत ने कहा था कि राज्यों द्वारा बनाए गए गोहत्या प्रतिबंध कानून संवैधानिक रूप से वैध हैं. कोर्ट ने यह भी माना कि गाय और गोवंश भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं.

इससे पहले 1958 में 'मो. हनीफ कुरैशी Vs बिहार स्टेट' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि दुधारू और काम करने वाले पशुओं के वध पर प्रतिबंध सही है. हालांकि उस समय बूढ़े और अनुपयोगी पशुओं पर पूर्ण प्रतिबंध को अदालत ने सही नहीं माना था. बाद में बदलती आर्थिक और वैज्ञानिक परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 2005 में अधिक कठोर प्रतिबंधों को भी वैध माना.

क्या केंद्र सरकार कानून बना सकती है?
कानून विशेषज्ञों के अनुसार पशुपालन और कृषि राज्य सूची का विषय है, इसलिए सामान्य परिस्थितियों में राज्यों को ही गोहत्या पर कानून बनाने का अधिकार है. हालांकि संसद विशेष परिस्थितियों में या संविधान के कुछ प्रावधानों के तहत कानून बना सकती है, लेकिन अब तक देशभर में लागू कोई एक केंद्रीय गोहत्या कानून नहीं है.

इस तरह भारत में गोहत्या का मुद्दा सिर्फ धार्मिक भावना नहीं, बल्कि संविधान, संघीय ढांचे, अर्थव्यवस्था और कानून व्यवस्था से भी जुड़ा हुआ है. अलग-अलग राज्यों के अलग कानून और सुप्रीम कोर्ट के फैसले इस बहस को और जटिल बनाते हैं.

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उत्तर प्रदेश में क्या हैं नियम और प्रतिबंधित जानवर

गोवंश (Cow Progeny): इसमें गाय (Cow), बछड़ा/बछड़ी (Calf), बैल (Bull), और सांड शामिल हैं. उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम (UP Prevention of Cow Slaughter Act) के तहत राज्य में गौवंश के वध या कुर्बानी पर पूरी तरह से कानूनी रोक है.

ऊंट : यूपी सहित कई राज्यों में ऊंट को भी प्रतिबंधित श्रेणी या विशेष नियमों के तहत रखा जाता है, और खुले में या सामान्य तौर पर इसकी कुर्बानी की अनुमति नहीं दी जाती है.

वन्यजीव और लुप्तप्राय प्रजातियां: वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के दायरे में आने वाले किसी भी जंगली या संरक्षित जानवर की कुर्बानी पूरी तरह प्रतिबंधित है.

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