गुरुग्राम से बेहद चौंकाने वाला मामला इस समय खूब चर्चा में है. यहां एक जोड़े ने लाखों रुपये खर्च करके आईवीएफ के जरिए बच्चा पैदा किया. लेकिन जब बच्चे के नैन-नक्श परिवार से अलग दिखे, तो उन्होंने डीएनए टेस्ट करवाया. टेस्ट में पता चला कि बच्चा न तो माता से मेल खाता है और न ही पिता से.
इसके बाद पीड़ित माता-पिता ने इस धोखाधड़ी के खिलाफ असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी एक्ट अथॉरिटी में शिकायत दर्ज कराई है. साथ ही, अस्पताल और आईवीएफ सेंटर के खिलाफ शिकायत भी दर्ज कराई है.
क्या होता है आईवीएफ मिक्स-अप?
आईवीएफ प्रक्रिया के दौरान लैब में एम्ब्रियो तैयार किया जाता है. क्लिनिक्स की लापरवाही के कारण यहां मिक्स-अप यानी बड़ी गड़बड़ी हो सकती है. ये आमतौर पर तीन वजहों से होता है:
ऐसी गंभीर गलतियों का पता अक्सर बच्चे के जन्म के बाद ही चलता है. भारत में आईवीएफ क्लीनिक्स की ये मनमानी पहली बार सामने नहीं आई है. साल 2023 में दिल्ली के एक क्लिनिक पर उपभोक्ता अदालत (NCDRC) ने डेढ़ करोड़ रुपये का भारी जुर्माना लगाया था. यहां बिना अनुमति के किसी दूसरे डोनर का स्पर्म इस्तेमाल किया गया था. इसी तरह साल 2023 में उत्तर प्रदेश उपभोक्ता आयोग ने एक क्लिनिक पर 40 लाख रुपये का जुर्माना लगाया था. क्लिनिक ने बच्चे की शारीरिक कमियों को माता-पिता से जानबूझकर छिपाया था. इसके बाद साल 2025 में आंध्र प्रदेश के सिकंदराबाद में भी एक क्लिनिक के खिलाफ गलत सैंपल इस्तेमाल करने पर एफआईआर दर्ज की गई थी.
कानून में क्या हैं प्रावधान?
अगर क्लिनिक ने आपके साथ धोखा किया है, तो एआरटी एक्ट की धारा 33 के तहत शिकायत की जा सकती है. इसमें पहली बार गलती होने पर डॉक्टर या क्लिनिक पर अधिकतम 10 लाख रुपये का जुर्माना लगता है. वहीं दूसरी बार या बार-बार यही गलती दोहराने पर 3 से 8 साल की जेल और कम से कम 10 लाख रुपये के जुर्माने का प्रावधान है.
कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक पीड़ित माता-पिता के पास कार्रवाई के तीन रास्ते होते हैं:
कानून की कमजोरियां और चुनौतियां
जानकारों का मानना है कि वर्तमान कानून में ज्यादा कड़ाई नहीं है. मामलों को सुलझने में सालों लग जाते हैं. कई क्लिनिक मोटी कमाई करते हैं, इसलिए वे पकड़े जाने पर कोर्ट के बाहर ही पैसे देकर समझौता कर लेते हैं.
फिलहाल, देश में बच्चे के जन्म से पहले डीएनए टेस्ट कराने का कोई सामान्य नियम नहीं है. नेशनल कंज्यूमर कमीशन ने सरकार को सलाह दी है कि आईवीएफ से पैदा होने वाले बच्चों का डीएनए मैचिंग टेस्ट अनिवार्य किया जाए. इसके लिए डीएनए एक्ट की धारा 25 में बदलाव करने की जरूरत होगी.
असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी एक्ट, 2021 के तहत आईवीएफ से पैदा हुए बच्चों के अधिकारों की पूरी रक्षा की गई है. कानून के अनुसार, आईवीएफ से पैदा हुआ बच्चा उसी जोड़े का कानूनी बच्चा माना जाता है जिसने इलाज कराया है. माता-पिता उसे छोड़ या ठुकरा नहीं सकते. लेकिन गुरुग्राम जैसे मामलों में सबसे बड़ा दर्दनाक सवाल यही बचता है कि आखिर उनका अपना बायोलॉजिकल बच्चा कहां है?
अनीषा माथुर