अमेरिका ने दुनिया भर के सामानों पर कर लगाने का एक नया तरीका खोज निकाला है. भारत पर भी इसका असर देखा जा सकता है. 2 जून को, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि सभा ने जबरन श्रम (Forced Labour) से बने सामानों के आयात को रोकने में नाकाम रहने वाले 60 देशों पर 10-12.5 प्रतिशत का अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रस्ताव रखा.
बता दें, फरवरी में सुप्रीम कोर्ट की ओर से व्हाइट हाउस के पहले के शुल्कों को रद्द किए जाने के बाद यह व्हाइट हाउस का पहला बड़ा शुल्क संबंधी कदम है. पहले लागू किए गए 'लिबरेशन डे' शुल्क आपातकालीन आर्थिक शक्तियों पर आधारित थे, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी में खारिज कर दिया था. यह कहते हुए कि कानून राष्ट्रपति को शुल्क लगाने की अनुमति नहीं देता है.
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीर ने कहा, हमारे सबसे अहम व्यापारिक साझेदारों की ओर से जबरन श्रम से निर्मित वस्तुओं के आयात को रोकने में विफल रहना स्वीकार नहीं है.
12.5 प्रतिशत की उच्च दर का सामना
60 अर्थव्यवस्थाओं में से 46 को 12.5 प्रतिशत की उच्च दर का सामना करना पड़ रहा है. यूएसटीआर नोटिस के अनुसार इनमें भारत, चीन, जापान, ब्राजील और वियतनाम शामिल हैं. 10 प्रतिशत की निम्न दर उन 14 अर्थव्यवस्थाओं पर लागू होती है, जिन्होंने पहले से ही जबरन श्रम से आयात पर प्रतिबंध लगा रखा है.
वहीं, कुछ देशों ने पारस्परिक व्यापार समझौते के तहत प्रतिबंध लगाने का वादा किया है या आंशिक प्रतिबंध लागू किया है.
दक्षिण एशिया में स्थिति दो भागों में बंटी हुई है, बांग्लादेश और पाकिस्तान को कम दर मिलती है, जबकि भारत और चीन को अधिक दर मिलती है. नोटिस में भारत द्वारा जबरन श्रम आयात पर प्रतिबंध या पारस्परिक व्यापार प्रतिबद्धता का कोई उल्लेख नहीं है.
छूटों से यह तय होता है कि वास्तव में भुगतान कौन करेगा, और ये छूटें असमान रूप से वितरित होती हैं. इस नोटिस में 1,654 उत्पाद श्रेणियों को छूट दी गई है, लेकिन ये छूटें मुख्य रूप से पूंजी-प्रधान वस्तुओं में शामिल हैं. इनमें जैविक रसायन, मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स और पेट्रोलियम उत्पाद शामिल है.
भारत के श्रम-प्रधान निर्यात को ऐसी कोई छूट नहीं मिलती. वस्त्र, गारमेंट्स, कालीन, जूते, हीरे व आभूषण जैसे क्षेत्र, जिनमें सबसे अधिक भारतीय श्रमिक काम करते हैं, उन पर पूरा 12.5 प्रतिशत शुल्क लागू होगा. श्रम शोषण के आधार पर उचित ठहराया गया यह शुल्क सबसे अधिक श्रम-प्रधान व्यापार को प्रभावित करता है.
बता दें, यह एक प्रस्ताव है, कानून नहीं. दरें, देशों की सूची और छूट, 6 जुलाई को समाप्त होने वाली सार्वजनिक टिप्पणी अवधि और अगले दिन होने वाली सुनवाई के बाद बदल सकते हैं. कानूनी सिद्धांत का भी परीक्षण नहीं हुआ है, और लक्षित पक्षों ने इसका विरोध किया है.
यूरोपीय सांसदों ने इस धारणा को खारिज कर दिया कि अमेरिका की तुलना में यूरोपीय संघ जबरन श्रम से बने सामानों पर कम प्रभावी नीतियां अपनाता है, और एक सांसद ने तो इन निष्कर्षों को पूरी तरह से बेतुका बताया.
भारत ने की बातचीत
टैरिफ की घोषणा के समय, अमेरिका का एक व्यापार दल नई दिल्ली में मौजूद था. वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, अमेरिका के मुख्य वार्ताकार ब्रेंडन लिंच के नेतृत्व में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि सभा के अधिकारियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने 1 से 4 जून तक अंतरिम व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के लिए बातचीत की, जो दोनों पक्षों द्वारा फरवरी में सहमत ढांचे पर आधारित था.
वाणिज्य विभाग के अतिरिक्त सचिव दर्पण जैन ने भारत के दल का नेतृत्व किया. मंत्रालय ने कहा कि दोनों देश अंतरिम समझौते को अंतिम रूप देंगे और साथ ही व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते को भी आगे बढ़ाएंगे.
यह समझौता भारत के लिए कम दर की ओर बढ़ने का रास्ता हो सकता है. 10 प्रतिशत की दर उन अर्थव्यवस्थाओं को लाभ पहुंचाती है जो पारस्परिक व्यापार समझौते के माध्यम से जबरन श्रम पर प्रतिबंध लगाने के लिए प्रतिबद्ध होती हैं, जैसा कि दिल्ली में इस समय विचाराधीन समझौता है.
बांग्लादेश पहले ही यह रास्ता अपना चुका है. अगर वार्ता विफल हो जाती है और 12.5 प्रतिशत की दर बनी रहती है, तो 1,654 छूटों से बाहर के भारतीय सामानों पर मौजूदा शुल्क के अलावा नया शुल्क भी लगेगा, जिससे श्रम प्रधान क्षेत्रों पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ेगा.
दीपू राय