राज्यसभा चुनाव: NCP में प्रफुल्ल पटेल का बढ़ा दबदबा, नाराज हुए छगन भुजबल

NCP की राज्यसभा सीट को लेकर हुई कवायद ने पार्टी के अंदरूनी समीकरणों को उजागर कर दिया है. अजीत पवार की अगुवाई वाली पार्टी ने प्रफुल्ल पटेल के करीबी माने जाने वाले राजेंद्र जैन को उम्मीदवार बनाकर साफ संकेत दिया है कि संगठन में उनका प्रभाव अब भी कायम है. छगन भुजबल की नाराजगी भी खुलकर सामने आई है.

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अजित पवार की पार्टी में अंदरूनी खींचतान, राज्यसभा टिकट पर भुजबल का दर्द छलका. (File Photo: ITG) अजित पवार की पार्टी में अंदरूनी खींचतान, राज्यसभा टिकट पर भुजबल का दर्द छलका. (File Photo: ITG)

ऋत्विक भालेकर

  • मुंबई,
  • 08 जून 2026,
  • अपडेटेड 11:01 PM IST

महाराष्ट्र की राजनीति में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) की राज्यसभा सीट को लेकर चल रही चर्चाओं पर अब लगभग विराम लग गया है. अजीत पवार की अगुवाई वाली NCP ने आगामी राज्यसभा उपचुनाव के लिए वरिष्ठ नेता राजेंद्र जैन को मैदान में उतार दिया है. इस फैसले ने पार्टी में बदलते शक्ति संतुलन और प्रफुल्ल पटेल के बढ़ते प्रभाव को सामने ला दिया है.

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यह सीट उस समय खाली हुई थी जब सुनेत्रा पवार ने राज्य की राजनीति पर फोकस करने के लिए राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया था. इसके बाद पार्टी के भीतर कई नामों पर चर्चा हुई. कुछ समय के लिए पूर्व सांसद नवनीत राणा का नाम भी गंभीरता से सामने आया, लेकिन अंदरूनी विरोध के चलते आखिरकार पार्टी नेतृत्व ने राजेंद्र जैन के नाम पर मुहर लगा दी.

राजेंद्र जैन का चयन महज एक संगठनात्मक फैसला नहीं माना जा रहा है. राजनीतिक जानकार इसे प्रफुल्ल पटेल की एक बड़ी रणनीतिक जीत के रूप में देख रहे हैं. जैन दो बार विधान परिषद (MLC) के सदस्य रह चुके हैं. उन्हें पटेल का बेहद करीबी और भरोसेमंद माना जाता है. खासतौर पर विदर्भ में संगठन को मजबूत बनाए रखने में अहम भूमिका रही है.

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दरअसल, पिछले कुछ समय से NCP के भीतर प्रफुल्ल पटेल की भूमिका को लेकर कई तरह की चर्चाएं चल रही थीं. हाल ही में तब विवाद खड़ा हो गया था जब सुनेत्रा पवार ने पार्टी की आधिकारिक चुनाव आयोग सूची से उनका नाम हटा दिया था. इस कदम के बाद राजनीतिक गलियारों में दोनों नेताओं के बीच मतभेद की अटकलें तेज हो गई थीं. 

हालांकि बाद में सुनेत्रा पवार ने इसे महज एक प्रशासनिक गलती बताया था. अब उसी प्रफुल्ल पटेल के सबसे करीबी सहयोगी को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया जाना इसका संकेत है कि पार्टी के भीतर उनका प्रभाव पहले की तरह बरकरार है. यह फैसला यह भी दिखाता है कि संगठनात्मक मामलों में उनकी राय अभी निर्णायक महत्व रखती है.

राज्यसभा उम्मीदवार के चयन के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा वरिष्ठ नेता और मंत्री छगन भुजबल को लेकर रही. शुरुआत में माना जा रहा था कि इस सीट के लिए भुजबल सबसे मजबूत दावेदार हैं. लेकिन राजनीतिक घटनाक्रम ने अलग मोड़ ले लिया. सूत्रों के मुताबिक, भुजबल दिल्ली जाने को तैयार थे, लेकिन उन्होंने इसके लिए एक अहम शर्त रखी थी. 

भतीजे को मंत्री बनाना चाहते थे भुजबल

भुजबल की इच्छा थी कि उनके राज्यसभा जाने की स्थिति में उनके भतीजे समीर भुजबल को महाराष्ट्र मंत्रिमंडल में शामिल किया जाए. हालांकि, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने उन्हें बताया कि केंद्रीय नेतृत्व केवल एक व्यक्ति के लिए कैबिनेट विस्तार करने के पक्ष में नहीं है. बताया जाता है कि इसके बाद भुजबल ने राज्यसभा जाने की इच्छा छोड़ दी.

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उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा देने से भी इनकार कर दिया. इस घटनाक्रम ने पार्टी के भीतर उनकी नाराजगी की चर्चाओं को हवा दे दी. इसके बाद भुजबल ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि राजेंद्र जैन की उम्मीदवारी का फैसला कई सप्ताह पहले ही हो चुका था. हालांकि उन्होंने कहा कि उनके राजनीतिक कद के अनुरूप सम्मान मिलने की अपेक्षा है.

'मैं कबड्डी प्लेयर हूं, शतरंज का नहीं'

अपने अंदाज में छगन भुजबल ने नाराजगी का इजहार भी किया. उन्होंने कहा, "मैं कबड्डी प्लेयर हूं, शतरंज प्लेयर नहीं." इस एक बयान को राजनीतिक हलकों में काफी अहम माना जा रहा है. भुजबल का इशारा था कि वे पर्दे के पीछे की रणनीति और बैकरूम राजनीति के बजाय सीधे राजनीतिक मुकाबले में भरोसा रखते हैं. 

उन्होंने बिना नाम लिए पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और सांसद सुनील तटकरे पर भी निशाना साधा. उन्होंने संकेत दिया कि पार्टी में नई पीढ़ी के नेताओं को लगातार बड़े पद मिल रहे हैं, जबकि लंबे समय से संगठन योगदान देने वाले नेताओं को महत्व नहीं दिया जा रहा. उनके बयान को पार्टी नेतृत्व के लिए एक राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है.

क्या कह रहे हैं राजनीतिक संकेत?

राजेंद्र जैन की उम्मीदवारी ने एक बात स्पष्ट कर दी है कि अजीत पवार की NCP में प्रफुल्ल पटेल की राजनीतिक पकड़ अभी भी मजबूत है. वहीं, छगन भुजबल की प्रतिक्रिया ने यह भी दिखा दिया कि पार्टी के भीतर महत्वाकांक्षाओं और नेतृत्व को लेकर असंतोष पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. राज्यसभा की यह सीट निर्विरोध जीत सकती है.

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