महाराष्ट्र की राजनीति इस समय बड़े राजनीतिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के दोनों गुट एक साथ अपने अस्तित्व की सबसे बड़ी चुनौती का सामना कर रहे हैं. राजनीतिक गलियारों में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह महज संयोग है या फिर शरद पवार और बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व के बीच किसी बड़े राजनीतिक समीकरण के तहत दोनों गुटों के विलय की जमीन तैयार की जा रही है.
एक ओर शरद पवार के नेतृत्व वाला NCP (SP) गुट अंदरूनी दबाव से जूझ रहा है. शरद पवार सार्वजनिक रूप से चुप्पी साधे हुए हैं, लेकिन उनके करीबी सहयोगी जयंत पाटिल और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के बीच देर रात हुई बैठक ने विपक्षी खेमे में हलचल मचा दी है. इसी बीच सांसद सुप्रिया सुले ने भी बड़ा राजनीतिक संकेत देते हुए कहा कि अगर परिसीमन विधेयक के तहत सभी राज्यों की लोकसभा सीटों में समान रूप से 50 फीसदी बढ़ोतरी की जाती है और महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण लागू किया जाता है तो उनकी पार्टी इस विधेयक का समर्थन करने पर विचार कर सकती है.
हालांकि, पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सुनील तटकरे ने तुरंत सफाई देते हुए कहा कि परिसीमन विधेयक का समर्थन करने का मतलब यह नहीं है कि पार्टी एनडीए में शामिल होने जा रही है.
सूत्रों के मुताबिक, शरद पवार गुट के लगभग आधे सांसद और विधायक अपने राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करने के लिए चुपचाप एनडीए में शामिल होने के पक्ष में हैं. इससे शरद पवार की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं.
उधर, सत्ता पक्ष वाला NCP गुट भी नेतृत्व को लेकर गंभीर अंदरूनी संघर्ष से गुजर रहा है. सचिदानंद सिंह द्वारा सुनेत्रा पवार के नेतृत्व को चुनौती देते हुए नोटिस भेजे जाने के बावजूद पार्टी ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है. सुनील तटकरे ने कहा कि फिलहाल केवल नोटिस की वैधानिक स्थिति की जांच की जाएगी. उन्होंने यह भी बताया कि वह, पार्थ पवार और प्रफुल्ल पटेल इस रविवार दिल्ली में बैठक कर तय करेंगे कि इस नोटिस का आधिकारिक जवाब दिया जाए या नहीं.
पार्टी की इस नरम प्रतिक्रिया ने नेतृत्व को लेकर चल रही अंदरूनी खींचतान को और उजागर कर दिया है. हाल ही में चुनाव आयोग के एक कार्यकारी पत्र से प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे जैसे वरिष्ठ नेताओं का नाम गायब रहने की घटना को भी इसी सियासी संघर्ष से जोड़कर देखा जा रहा है. राजनीतिक हलकों में इसे पार्थ पवार के बढ़ते प्रभाव और पार्टी के भीतर नेतृत्व की नई लड़ाई का संकेत माना जा रहा है.
इन तमाम घटनाक्रमों के बीच राजनीतिक जानकारों का मानना है कि दोनों गुटों का संकट आखिरकार एक ही दिशा की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है और वह है संभावित विलय. जयंत पाटिल और सुनील तटकरे जैसे नेताओं ने पहले भी स्वीकार किया था कि अजित पवार के नेतृत्व में दोनों गुटों के विलय की बातचीत अंतिम चरण तक पहुंच गई थी, लेकिन अजित पवार के अचानक निधन के बाद यह प्रक्रिया पूरी तरह ठप हो गई.
घटनाक्रम के पीछे तीन संभावित रणनीतियां?
सूत्रों के अनुसार, बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व भी एनडीए में सत्ता की हिस्सेदारी पर अंतिम फैसला लेने से पहले एकीकृत NCP चाहता है. ऐसे में मौजूदा घटनाक्रम के पीछे तीन संभावित रणनीतियां दिखाई देती हैं.
पहली, शरद पवार अपने सांसदों और विधायकों को टूटने से बचाने और उन्हें अपने साथ बनाए रखने के लिए एनडीए के करीब जाने के संकेत दे रहे हों, ताकि दल-बदल रोका जा सके.
दूसरी, इन राजनीतिक गतिविधियों के जरिए सत्तारूढ़ NCP गुट के भीतर मौजूद मतभेदों को और गहरा करने की कोशिश हो सकती है. खासकर पार्थ पवार और सुनेत्रा पवार के बढ़ते प्रभाव को लेकर प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे जैसे वरिष्ठ नेताओं के बीच असहजता को राजनीतिक रूप से भुनाने की रणनीति भी मानी जा रही है.
तीसरी, NCP (SP) संभावित समर्थन या विलय के संकेत देकर अपनी राजनीतिक सौदेबाजी की ताकत बढ़ाना चाहती है. माना जा रहा है कि पार्टी भविष्य में केंद्र सरकार में अहम मंत्रालयों और महाराष्ट्र सरकार में वित्त विभाग जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय की मांग के लिए अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर सकती है.
हालांकि, इन सभी दावों और अटकलों पर अब तक किसी भी पक्ष की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है. लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति में जिस तेजी से घटनाक्रम बदल रहे हैं, उन्होंने NCP के भविष्य और संभावित राजनीतिक पुनर्संरचना को लेकर चर्चाओं को जरूर तेज कर दिया है.
ऋत्विक भालेकर