महाराष्ट्र के चंद्रपुर में कई गांव ऐसे है जो आज भी बूंद-बूंद पानी को तरस रहे है. हर घर जल योजना के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन चंद्रपुर जिले के गोंड़पिपरी तहसील के ये गांव आज भी प्यासे हैं. यहां 47 डिग्री तापमान में भी महिलाएं सिर पर घड़ा लिए पानी के लिए भटकती नजर आती हैं.
इन इलाकों में महिलाएं सुबह होते ही घड़े लेकर निकल पड़ती हैं, क्योंकि इनके गांव में नल तो है, लेकिन पानी नहीं. कुआं तो है लेकिन पानी खारा है और आखिर में जिंदगी बचाने के लिए सिर्फ ये सूखे नाले ही सहारे बचते है.
चंद्रपुर जिले के गोंड़पिपरी तहसील के हेटी नांदगांव, चक नांदगांव और टोले नांदगांव, ये तीन गांव ऐसे हैं जहां पानी आज भी सबसे बड़ी समस्या बना हुआ है.
गांव से दूर नाले से पानी ला रहीं महिलाएं
गांव से करीब एक किलोमीटर दूर इस नाले में महिलाएं गड्ढा खोदती हैं, फिर उस गड्ढे में धीरे-धीरे जमीन से रिसकर जमा होने वाले पानी का इंतजार करती हैं. ऊपर जमा गंदगी और मिट्टी को हटाया जाता है और उसके बाद जो थोड़ा साफ दिखने वाला पानी बचता है उसे घड़ों में भरकर घर ले जाया जाता है.
एक घड़ा पानी भरने में करीब पंद्रह मिनट लगते हैं और अगर गड्ढे का पानी खत्म हो जाए तो फिर दोबारा पानी जमा होने का इंतजार करना पड़ता है.
तेज धूप, तपती जमीन और पानी के लिए घंटों की मशक्कत यही इन महिलाओं की रोजमर्रा की जिंदगी बन चुकी है. जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती है वैसे-वैसे पानी जमीन के और नीचे चला जाता है. फिर इन महिलाओं को गड्ढा और गहरा खोदना पड़ता है. मई महीने में हालत इतनी खराब हो जाती है कि करीब आठ फीट तक गड्ढा खोदकर पानी निकालना पड़ता है.
ये समस्या पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है. इन गांवों में बच्चे बड़े होते हैं ,जवान बूढ़े हो जाते हैं लेकिन पानी की तस्वीर नहीं बदलती. सरकारें बदलीं, योजनाएं आईं, घोषणाएं हुईं लेकिन इन गांवों की प्यास आज भी वैसी ही है.
सदियों से चली आ रही पानी की किल्लत
करीब 100 साल की बुजुर्ग महिला ताराबाई येलमूले बताती हैं कि वो बचपन से इसी गांव में हैं और तभी से यहां ऐसी ही स्थिति है. एक समय में वो खुद भी दो किलोमीटर दूर से पानी भरकर लाती थीं और अब उसके परिवार के लोग लाते हैं. तभी से गांव में पानी की समस्या का हल नहीं निकला.
कुछ साल पहले यहां प्रादेशिक नल योजना के तहत पाइपलाइन और नल लगाए गए थे. कागजों में सात गांवों को पानी सप्लाई होने की बात कही गई. लेकिन हकीकत ये है कि हेटी नांदगांव, चक नांदगांव और टोले नांदगांव तक पानी आज भी ठीक से नहीं पहुंचता. हर घर में नल जरूर लगा है लेकिन हर घर तक पानी नहीं पहुंचा.
कुछ घरों में कभी-कभार पानी आता भी है तो वो इतना गंदा होता है कि पीने लायक नहीं रहता. पिछले दो साल पहले गांव के बहार नाले के पास दो पानी की नई टंकी बनाने का काम शुरू हुआ था लेकिन अधूरे में ही काम बंद हो गया है.
पीने के लिए आज भी नाले के पानी पर निर्भर है गांव
लाखों करोड़ों रुपये खर्च कर बनाई गई योजना आज सवालों के घेरे में है. ग्रामीणों का कहना है कि नल का पानी गंदा आता है जबकि इस नाले का पानी उन्हें ज्यादा साफ लगता है. गांव में मौजूद कुएं का पानी खारा होने की वजह से पीने के लायक नहीं है. इसलिए लोग कुएं और नल के पानी का इस्तेमाल सिर्फ नहाने, कपड़े और बर्तन धोने के लिए करते हैं जबकि पीने के लिए आज भी नाले के पानी पर निर्भर हैं.
इसी गांव के देवराव येलमूले बताते है की उनके यहां बेटी की शाद थी और घर में एक बूंद पानी नहीं था. घर में नल का कनेक्शन भी है लेकिन नल में कभी पानी आया ही नहीं. इसीलिए शादी के समय बाहर से पानी का टैंकर बुलाना पड़ा. गांव में पानी की बड़ी समस्या है और वो ये अपने बचपन से देखते आ रहे हैं.
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ग्रामीणों ने कई बार प्रशासन से मांग की, शिकायतें कीं, अधिकारियों के चक्कर लगाए, लेकिन आरोप है कि हर बार सिर्फ आश्वासन मिला समाधान नहीं.
ऐसे में सवाल ये है कि आखिर कब तक ये महिलाएं यूं ही नाले में गड्ढे खोदकर पानी भरती रहेंगी? कब तक सरकारी योजनाएं सिर्फ फाइलों और भाषणों में बहती रहेंगी? और आखिर कब इन गांवों तक सच में शुद्ध पानी पहुंचेगा.
जिलाधिकारी ने बताया कि इस बारे में उन्हें अभी जानकारी मिली है. वो अपने टीम को कल मौके पर भेज कर पानी की किल्लत को लेकर जानकारी लेंगे और इसे दूर करने के लिए हर मुमकिन कोशिश करेंगे.
विकास राजूरकर