AIMIM विधायक मुफ्ती मोहम्मद इस्माइल अब्दुल खालिक के चुनाव को चुनौती देने वाली याचिका को बॉम्बे हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है. अपने फैसले में अदालत ने कहा कि चुनाव में सफलता के लिए 'दुआ' मांगना और उसके जवाब में 'आमीन' कहना मतदाताओं के वोट देने की शपथ या संकल्प नहीं माना जा सकता.
अदालत ने कहा कि ईश्वर से जीत की दुआ मांगना न तो गलत प्रभाव डालना है और न ही धर्म के नाम पर वोट मांगना है. हाईकोर्ट के जस्टिस एनजे जमादार की बेंच ने शेख आसिफ शेख रशीद की चुनाव याचिका को खारिज कर दिया.
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस जमादार ने कहा कि चुनावी मैदान में कामयाबी के लिए दुआ करना या ईश्वर का आशीर्वाद मांगना धर्म के आधार पर वोट मांगने के दायरे में नहीं आता. इससे प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार की धार्मिक भावनाओं या संभावनाओं पर भी कोई असर नहीं पड़ता.
क्या है पूरा मामला?
दरअसल याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि मुफ्ती मोहम्मद इस्माइल अब्दुल खालिक ने मालेगांव की जामा मस्जिद और ईदगाह के इमाम के रूप में अपने पद का गलत इस्तेमाल किया. मुफ्ती पर आरोप है कि उन्होंने सामूहिक नमाज का नेतृत्व किया था. इस दौरान उन्होंने अपनी चुनावी जीत के लिए 'दुआ' की थी और नमाज में मौजूद लोगों से अपनी चुनावी जीत के लिए शपथ दिलवाई थी.कोर्ट ने कहा कि मुफ्ती पर अपनी बीमारी के आधार पर 'सिंपथी कार्ड' खेलने का आरोप भले ही लगाया जा सकता था, लेकिन वो मुद्दा इस मामले से पूरी तरह अलग है.
अदालत ने बताया 'आमीन' का मतलब
अदालत ने इस तर्क को स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया कि 'आमीन' कहने का मतलब किसी उम्मीदवार को वोट देने की शपथ लेना है. विश्वकोश और शब्दकोशों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा, 'सरल शब्दों में दुआ ईश्वर से आशीर्वाद, मदद या दया मांगने का एक प्रॉसेस है. ये सर्वशक्तिमान को पुकारना है. इस्लाम में दुआ को इबादत का सार माना जाता है.'
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बेंच ने आगे कहा, 'जब कोई व्यक्ति दुआ के जवाब में आमीन कहता है, तो इसका मतलब सिर्फ इतना है कि वो अल्लाह से उस दुआ को कबूल करने की गुहार लगा रहा है. आमीन कहने वाला व्यक्ति सिर्फ मांगी गई दुआ से अपनी सहमति जताता है, न कि राजनीतिक वोट का संकल्प लेता है.'
विद्या