महंगे हुए सिलेंडर की मार! छात्रों ने छोड़ा सब्जी-रोटी का नाश्ता, अब सिर्फ केला दूध से चला रहे काम

झारखंड की राजधानी रांची में कमर्शियल और छोटे गैस सिलेंडरों की बढ़ती कीमतों ने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. महंगे गैस रिफिल और मेस के बढ़े खर्च के कारण कई छात्र पौष्टिक नाश्ता छोड़कर ब्रेड और केले से काम चला रहे हैं. हजारीबाग, पलामू और रामगढ़ से आए छात्रों का कहना है कि गैस भरवाने में समय और पैसे दोनों लगते हैं, जिससे पढ़ाई प्रभावित हो रही है और परिवार पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है.

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कमरे में खाना बनाते प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र. (photo: Satyajeet/ITG) कमरे में खाना बनाते प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र. (photo: Satyajeet/ITG)

सत्यजीत कुमार

  • रांची,
  • 01 जून 2026,
  • अपडेटेड 2:47 PM IST

झारखंड में भी नॉन डोमेस्टिक यानी कमर्शियल गैस और छोटू सिलेंडर के कीमतों में इजाफा से कंज्यूमर्स की परेशानी बढ़ी हुई है. खासकर वैसे विद्यार्थी जो रांची में रहकर कॉम्पिटिटिव एग्जाम्स की तैयारियां कर रहे हैं या फिर यहां हॉस्टल में रहकर पढ़ाई पूरी कर रहे हैं. ऐसे छात्रों के लिए छोटे सिलेंडरों की कीमतों में बढ़ोतरी किसी बड़े आफ़त से कम नहीं है.

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लगातार बढ़े सिलेंडर के दामों की वजह से उन्होंने बिहार झारखंड में जो सुबह का अमूमन रोटी-भुजियां या रोटी सब्जी का सॉलिड नाश्ता होता है उसे बनाना छोड़ दिया है. अब वो ब्रेड और केले खाकर ही सुबह पेट भर लेते हैं. रांची के लालपुर इलाके के कृष्णा लॉज का जायजा आजतक ने लिया. यहां विद्यार्थी सपनों को साकार करने पहुंचते हैं, लेकिन सपनों को साकार करने के संघर्ष के साथ उन्हें पेट भरने के संघर्ष का भी सामना करना पड़ता है.

कमरे में पढ़ाई करते छात्र. (Photo: Satyajeet/ITG)

250 रुपये प्रति किलो मिल रहा है गैस
खासकर जब गैस की कीमतें बढ़ी हो और किल्लत भी हो. रांची में रहकर पढ़ाई करने वाले सोनू कुमार साहू ने बताया कि वह हजारीबाग के रहने वाले हैं. उनके पिता दर्जी हैं. कपड़े सिलकर वे रांची पैसे भेजते हैं ताकि उनका लाल पढ़कर-लिखकर नौकरी करे और परिवार का सहारा बने. लेकिन सोनू की परेशानी ऐसी है कि उस मुश्किल को वो परिवार को बताकर उन्हें और परेशान करना नहीं चाहता. यहां खाना बनाने के लिए उसे नॉन डोमेस्टिक गैस रिफिलिंग 250 रुपये प्रति किलो के हिसाब से करवाना होता है. मेस और टिफिन का महंगा खाना वो अफोर्ड नहीं कर सकता.

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क्योंकि मेस या टिफिन सिस्टम में कमर्शियल गैस की कीमतें बढ़ने के बाद दो जून के खाने का चार्ज लगभग 6000 रुपए है. वहीं गैस भरवाने के लिए पंक्तियों में घंटों खड़ा होना होता है. ऐसे में कभी-कभी समझ नहीं आता है कि पढ़ाई पर कैसे फोकस करें? ऐसी ही कुछ कहानी पलामू से लगभग तीन-चार साल पहले नौकरियों की तैयारी के लिए रांची से आए आशीष कुमार की भी है. उनके पिता किसान हैं. गैस के दाम बढ़ने से हर चीजों के दाम बढ़ गए हैं. ऐसे में उन्हें भी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. 

सुबह गैस खत्म तो शाम को ही मिल पाता है खाना
आशीष को समझ नहीं आ रहा है कि वो कैसे और किस मुंह से अपने पिता से पैसे मंगवाएं? वहीं रामगढ़ से पढ़ाई करने आए कमरे में बैठे ये दो अन्य विद्यार्थियों ने भी यही समस्या बताई. इन छात्रों का कहना है कि उन्हें वक्त पर इंस्टीट्यूट और शिक्षण संस्थान भी पहुंचना होता है. कभी अगर सुबह में गैस ने जवाब दिया यानी खत्म हो गई तो सुबह के साथ-साथ दोपहर में भोजन नहीं मिल पाता है. ऐसे में शाम में आकर ही वे खाना बनाते हैं. 

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