झारखंड विधानसभा में अवैध नियुक्तियों की खुलने लगी है पोल

विधानसभा में नियुक्ति के दौरान नियम-कानून की धज्जियां उड़ायी गई थीं. इस दौरान ऐसे पदों पर भी नियुक्ति हुई जो पद थे ही नहीं. इतना ही नहीं बिना स्वीकृत पदों पर लोग बहाल कर दिए गए.

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धरमबीर सिन्हा

  • रांची,
  • 18 मई 2018,
  • अपडेटेड 6:49 PM IST

झारखंड विधानसभा में नियमों को ताक पर रखकर की गई अवैध नियुक्तियों की पोल धीरे-धीरे खुलने लगी है. रिटायर्ड जस्टिस विक्रमादित्य प्रसाद की अध्यक्षता में चल रही जांच अब अपने अंतिम मुकाम पर है. बताया जाता है कि जांच आयोग को ऐसे कई तथ्य मिले है जो नियुक्तियों में बरती गयी अनियमितताओं को उजागर करते हैं.

गौरतलब है कि जांच आयोग का गठन राज्यपाल की अनुशंसा और उठाये गए सवालों के मद्देनजर किया गया था. आयोग पूर्व स्पीकर इंदर सिंह नामधारी और आलमगीर आलम के कार्यकाल में लगभग 600 लोगों की अलग-अलग पदों पर हुई नियुक्तियों की जांच कर रहा है.

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नियुक्तियां पर गड़बड़ी

विधानसभा में नियुक्ति के दौरान उड़ायी गई थीं. इस दौरान ऐसे पदों पर भी नियुक्ति हुई जो पद थे ही नहीं. इतना ही नहीं बिना स्वीकृत पदों पर लोग बहाल कर दिए गए. उर्दू सहायक, उर्दू प्रशाखा पदाधिकारी, शोध सहायक सह सूचीकर, उप मुख्य उद्यान पर्यवेक्षक जैसे कई नये-नये पदों पर नियुक्ति हुई. यही नहीं उर्दू भाषा के लिए अनुसेवक उर्दू के पद पर भी बहाली की गई.

जांच में यह पाया गया कि कई पदों की संख्या का विज्ञापन में उल्लेख भी नहीं किया गया था. अब इन सभी तथ्यों की भी जांच आयोग कर रहा है. विधानसभा नियुक्ति घोटाले में साक्षात्कार के दौरान पक्षपात और धांधली की बात भी सामने आई है. कुछ मामलों में प्रोन्नति देकर नीचे के पदों को खाली कर उसमे नियुक्तियां करने की बात सामने आई है.  

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महज 12 घंटो में मिली नौकरी!

बताया जाता है कि जांच आयोग को ऐसे तथ्य मिले है जिससे नियुक्तियों में बरती गयी . मसलन पलामू के 13 अभ्यर्थियों को स्थायी डाक-पते पर नियुक्ति की सूचना दी गयी जो महज 12 घंटे के भीतर हुआ. अभ्यार्थियों को पत्र मिल गया और दो दिनों के अंदर उन्होंने योगदान भी कर लिया.

इसके साथ अनुसेवक के रूप में बहाल लगभग 150 अभ्यर्थियों में आधे से अधिक पलामू जिले के थे. बता दें कि  तत्कालीन स्पीकर इंदर सिंह नामधारी भी पलामू से ही संबंध रखते हैं. वहीं अनुसेवक के रूप में कथित रूप से चयनित व्यक्तियों को आदेशात्मक रूप से नियुक्त कर लिया गया.

चालकों की 17 नियुक्तियों में 14 को एमवीआई ने जांच में असफल पाया था. बावजूद इसके इन्हें नौकरी पर रख लिया गया. निरसा विधायक अर्पणा सेनगुप्ता के भाई की ड्राइवर के पद पर नियुक्ति साक्षात्कार बिना और बगैर आवेदन भरे ही कराई गयी थी.

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