‘शव पहचानना भी मुश्किल था’, अहमदाबाद प्लेन क्रैश को एक साल, डॉक्टर और DGP ने सुनाई दर्द भरी दास्तां

12 जून 2025 को अहमदाबाद में हुए विमान हादसे ने 260 परिवारों की दुनिया उजाड़ दी थी. पहली बरसी पर उस दिन राहत और बचाव कार्य की कमान संभालने वाले अधिकारियों ने दर्दनाक यादें साझा कीं.

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अहमदाबाद प्लेन क्रैश के एक साल भी नहीं आई फाइनल रिपोर्ट (Photo: ITG) अहमदाबाद प्लेन क्रैश के एक साल भी नहीं आई फाइनल रिपोर्ट (Photo: ITG)

अतुल तिवारी

  • अहमदाबाद,
  • 12 जून 2026,
  • अपडेटेड 10:28 AM IST

पिछले साल अहमदाबाद में हुआ एअर इंडिया विमान हादसा देश के इतिहास के सबसे भयानक प्लेन हादसों में से एक है. 12 जून 2025 की दोपहर को अहमदाबाद से लंदन जा रहा विमान AI171 मेघाणीनगर में बीजे मेडिकल कॉलेज की हॉस्टल पर क्रैश हो गया था. इस हादसे में क्रू मेंबर्स सहित विमान के 241 यात्रियों और क्रैश साईट पर मौजूद 19 लोगों को मिलाकर कुल 260 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई थी. इस भयानक हादसे की वजह से कई परिवारों के हंसते-खेलते आशियाने उजड़ गए थे. 

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इस हादसे को आज एक साल पूरे हो गए हैं. उस समय इस हादसे को करीब से देखने और जिम्मेदारी संभाल रहे अस्पताल के सुपरिंटेंडेंट डॉक्टर राकेश जोशी और तत्कालीन पुलिस कमिश्नर (अब गुजरात के डीजीपी) जीएस मलिक ने उस दिन की दिल दहला देने वाली यादें साझा की हैं. 

उन्होने बताया कि कैसे इतने बड़े हादसे के बाद सबने मिलकर काम किया, जो आज भी किसी की भी आंखें नम कर दें.

जब नहीं थम रहे थे डॉक्टरों के आंसू...

डॉक्टर राकेश जोशी ने आजतक से बातचीत करते हुए बताया कि वो एक बेहद सामान्य दोपहर थी. वे हमेशा की तरह अस्पताल में एक सर्जरी कर रहे थे. तभी अचानक खबर आई कि महज 400 मीटर दूर बीजे मेडिकल कॉलेज के हॉस्टल एरिया में एक इंटरनेशनल प्लेन क्रैश हो गया है. वे तुरंत अपनी टीम को सर्जरी सौंपकर ट्रोमा सेंटर की तरफ भागे.

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शुरुआत में डॉक्टरों को लगा कि शायद कई लोग घायल होंगे और वे उनकी जान बचा पाएंगे. इसके लिए तुरंत अलग-अलग टीमें भी बना दी गईं. सबसे पहला घायल ट्रोमा में जो आया वो काफी जला हुआ था. उसने बताया कि प्लेन सीधे बच्चों के मेस (बच्चे जहां खाते है) पर गिरा है. एक घंटे तक तो कुछ घायल और टूटी हड्डियों वाले लोग आए. लेकिन एक घंटे बाद स्थिति बदल गई और पूरी तरह जल चुके बेजान शव आना शुरू हो गए, जिन्हें भारी मन से पोस्टमार्टम रूम में शिफ्ट करना पड़ रहा था.

अपनों की तलाश और बेबसी का वो आलम...

जो रिश्तेदार कुछ देर पहले अपनों को खुशी-खुशी विदा करने एयरपोर्ट आए थे, वे बदहवास हालत में अस्पताल की तरफ भाग रहे थे. रोते-बिलखते परिजनों के कई सवाल थे, लेकिन किसी के पास कोई जवाब नहीं था. शव इस हालत में ही नहीं थे कि उन्हें पहचाना जा सके. ऐसे मुश्किल वक्त में पहचान के लिए डीएनए सैंपलिंग करना जरूरी था. हादसे की गंभीरता को देखते हुए खुद मुख्यमंत्री, गृहमंत्री अमित शाह और अगले दिन सुबह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अस्पताल पहुंचे. उनका बस एक ही निर्देश था, 'जल्द से जल्द मृतदेह की पहचान करके परिजनों को शव सौंपने है. इस दुख की घड़ी में कागजी कार्रवाई की वजह से किसी भी परिवार को कोई और तकलीफ नहीं होनी चाहिए.'

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अस्पताल ने न सिर्फ डॉक्टरों, बल्कि मनोवैज्ञानिकों की मदद से उन टूट चुके परिवारों को संभाला जिनका पूरा संसार इस हादसे में खत्म हो गया था. एनजीओ और प्रशासन की मदद से कॉफिन का इंतजाम किया गया और अंतिमक्रिया में मदद की गई थी.

जब फर्ज और इंसानियत हुए एक

गुजरात के डीजीपी जीएस मलिक ने इस भयावह हादसे को याद करते हुए बताया, "12 जून 2025 के दिन दोपहर के 1:40 के आसपास एयरपोर्ट के पास फ्लाइट क्रैश हुई थी. हादसा मेरे घर से महज 200 मीटर की दूरी पर हुआ था. मुझे फोन आया की घर के आसपास में शायद कोई सिलेंडर ब्लास्ट हुआ है, लेकिन कुछ ही पल में प्लेन क्रैश की जानकारी मिली. तो मैं 15 मिनट में ही क्रैश साइड पर पहुंच गया. वहां का मंजर देखकर रूह कांप गई, बहुत दर्दनाक दृश्य थे."

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एम्बुलेंस शवों को लेकर भाग रही थीं. स्थिति को देखकर मैंने तुरंत सिविल हॉस्पिटल के लिए ग्रीन कॉरिडोर बनाने का आदेश दिया. शहर के अलग-अलग इलाके से क्रैश साइट पर फायर फाइटर आ रहे थे. कुछ ही देर में अलग-अलग एजेंसियां भी मौके पर पहुंचकर संभव मदद में जुट गई थीं, जिससे राहत काम में एक सेकंड की भी देरी न हो.

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जीएस मलिक ने आगे जानकारी देते हुए बताया कि वे जानते थे कि अस्पताल में अपनों को खोने वालों का हुजूम उमड़ेगा. इसलिए उन्होंने थानों से 200 पुलिसकर्मियों को सिर्फ इसलिए तैनात किया, जिससे वे कागजी काम और डीएनए सैंपल कलेक्शन को तेजी से संभाल सकें. उन्होने आगे बताया कि ऐसे हादसे में जिस तेजी के साथ हमने काम किया शायद ही दुनिया में कहीं हुआ होगा. आम तौर पर एक छोटे सड़क हादसे में भी शव सौंपने में 24 घंटे लग जाते हैं, लेकिन यहां टीम ने हादसे के महज 20 घंटे के अंदर पहला शव उनके परिवार को सौंप दिया था.

जैसे ही 14 जून 2025 को एफएसएल से पहली डीएनए रिपोर्ट मिली, उसके बाद दोपहर 3:19 बजे हमने शव परिजनों को सौंप दिया, जो कि हादसे के 50 घंटे के अंदर था. पुलिस ने खुद अपनी गाड़ियों और एंबुलेंस से शवों को उनके घरों तक पहुंचाया. सबसे बड़ी बात ये हुई कि दुख में डूबे परिजनों को कोई परेशानी न हो और उन्हें बार-बार अस्पताल के चक्कर न काटने पड़ें, इसलिए इतिहास में पहली बार पोस्टमार्टम रिपोर्ट, डीएनए रिपोर्ट और डेथ सर्टिफिकेट जैसे सारे जरूरी दस्तावेज शव के साथ ही एक ही बार में सौंप दिए गए.

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डीएनए ही आखिरी सहारा...

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जीएस मलिक ने बताया, "इस खौफनाक मंजर की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 260 मृतकों में से सिर्फ 6 लोगों की पहचान सामान्य रूप से हो सकी थी. बाकी 254  लोगों की पहचान के लिए सिर्फ और सिर्फ डीएनए मैचिंग ही एकमात्र रास्ता था. सिविल अस्पताल और एफएसएल की टीम ने लगातार 16-17 दिनों तक बिना सोए इस काम को पूरा किया, जिससे हर शव सही परिवार तक पहुंच सके. इस प्रक्रिया में हमें सिविल हॉस्पिटल, कलेक्टर ऑफिस, अहमदाबाद म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन का अच्छा सहयोग मिला."

विमान हादसे के पीछे की वजहों का पता लगाने के लिए एक पांच सदस्यीय जांच कमेटी बनाई गई थी, जिसमें जीएस मलिक भी शामिल थे. उन्होंने बताया कि कमेटी ने अपनी पूरी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है और हादसे की तकनीकी वजहों की आगे की आधिकारिक जानकारी अब संबंधित सरकारी विभाग द्वारा ही दी जाएगी.

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