कल्पना कीजिए, आप किसी बड़ी कंपनी के अकाउंट्स विभाग में काम करते हैं. अचानक आपके फोन पर कंपनी के CEO का मैसेज आता है. मैसेज में लिखा होता है कि एक जरूरी और गोपनीय ट्रांजेक्शन करना है. सब कुछ सामान्य लगता है, क्योंकि मैसेज भेजने वाले का नाम भी CEO का ही होता है. लेकिन आपको नहीं पता कि फोन के दूसरी तरफ कोई CEO नहीं, बल्कि एक साइबर ठग बैठा है.
मुंबई में कुछ ऐसा ही हुआ. और इसी कहानी की डोर दिल्ली तक पहुंची, जहां पुलिस ने एक ऐसे साइबर सिंडिकेट का पर्दाफाश किया है, जो करोड़ों की ऑनलाइन ठगी की रकम को बैंक खातों से निकालकर आगे पहुंचाने का काम करता था.
कहानी की शुरुआत होती है मुंबई से. पुलिस के मुताबिक, 3 जून से 15 जून 2026 के बीच एक निजी कंपनी को WhatsApp पर CEO बनकर मैसेज भेजे गए. मैसेज इतने भरोसेमंद थे कि कंपनी के कर्मचारियों को जरा भी शक नहीं हुआ. नतीजा यह हुआ कि अलग-अलग बैंक खातों में कुल 63 ट्रांजेक्शन किए गए और करीब 10.40 करोड़ रुपये साइबर ठगों के नेटवर्क में पहुंच गए.
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आमतौर पर लोग सोचते हैं कि साइबर ठगी करने वाला ही सबसे बड़ा अपराधी होता है. लेकिन असलियत में ऐसे मामलों में एक पूरी चेन काम करती है. कोई फर्जी पहचान बनाता है, कोई बैंक खाते उपलब्ध कराता है, कोई रकम ट्रांसफर कराता है और कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनका काम सिर्फ पैसा निकालकर आगे पहुंचाना होता है.
दिल्ली पुलिस के हत्थे ऐसे ही लोग चढ़े हैं. दरअसल, जसोला स्थित एक बैंक शाखा के मैनेजर को कुछ ट्रांजेक्शन संदिग्ध लगे. बैंक को शक हुआ कि खातों में आने वाली रकम सामान्य नहीं है. सूचना पुलिस तक पहुंची और फिर शुरू हुई जांच.
पुलिस ने खातों की पड़ताल की तो पैसों का एक ऐसा जाल सामने आया, जिसकी कड़ियां मुंबई की करोड़ों की साइबर ठगी से जुड़ती चली गईं. जांच के आधार पर पुलिस ने पांच आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया. इनकी पहचान 22 वर्षीय विकास, 21 वर्षीय वंश, 22 वर्षीय फैयाज आलम, 28 वर्षीय अमित और 23 वर्षीय बलवीर कुमार के रूप में हुई है. सभी आरोपी दिल्ली के रहने वाले हैं.
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पुलिस का आरोप है कि ये लोग कमीशन के आधार पर साइबर ठगी की रकम को बैंक खातों से निकालते थे. यानी ठगी कोई और करता था, लेकिन पैसे को सिस्टम से बाहर निकालकर सुरक्षित जगह पहुंचाने का जिम्मा इन लोगों पर था.
पुलिस की मानें तो इनकी गिरफ्तारी से करीब 9 लाख रुपये की संदिग्ध रकम की निकासी भी रोकी जा सकी. अगर समय रहते कार्रवाई नहीं होती तो यह रकम भी नेटवर्क के दूसरे हिस्सों तक पहुंच जाती.
जांच में सामने आया है कि यह कोई छोटा-मोटा गिरोह नहीं, बल्कि एक संगठित साइबर नेटवर्क है. दिल्ली पुलिस अब 10 करोड़ रुपये से ज्यादा के फाइनेंशियल ट्रेल की जांच कर रही है. यह पता लगाया जा रहा है कि रकम किन खातों में गई, किसने निकाली और आखिरकार उसका अंतिम ठिकाना कहां था.
इस कहानी के कई किरदार अभी भी पर्दे के पीछे हैं. गिरफ्तार आरोपी नेटवर्क का सिर्फ एक हिस्सा बताए जा रहे हैं. पुलिस का दावा है कि गिरोह के कई सदस्य अब भी फरार हैं और उनकी तलाश जारी है.
मुंबई की 10.40 करोड़ रुपये की ठगी और दिल्ली में हुई इन गिरफ्तारियों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि साइबर अपराधियों का नेटवर्क अब किसी एक शहर तक सीमित नहीं है. एक ठग किसी दूसरे राज्य में बैठा हो सकता है, पैसा तीसरे राज्य में जा सकता है और उसे निकालने वाला चौथे शहर में मौजूद हो सकता है.
फिलहाल दिल्ली पुलिस इस पूरे नेटवर्क की अगली कड़ी तलाश रही है. लेकिन इस कहानी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है- अगर एक WhatsApp मैसेज पर 10.40 करोड़ रुपये निकल सकते हैं, तो साइबर अपराधियों की पहुंच आखिर कितनी बड़ी हो चुकी है?
हिमांशु मिश्रा