UCC कैसे सभी धर्मों के लिए एक कानून का विकल्प देगा, विरोध क्यों हो रहा, किसके लिए क्या बदलेगा? पढ़ें 10 सवालों के जवाब

2024 के लोकसभा चुनाव से पहले फिर से समान नागरिक संहिता का जिन्न बाहर आ गया है. इसे लेकर बहस और तैयारियां, दोनों ही तेज हो गईं हैं. माना जा रहा है कि संसद के मॉनसून सत्र में सरकार इसे लेकर बिल ला सकती है. वहीं, कई विपक्ष इसके विरोध में है. ऐसे में जानते हैं समान नागरिक संहिता से जुड़े 10 बड़े सवालों के जवाब...

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समान नागरिक संहिता को लेकर बहस तेज हो गई है. (प्रतीकात्मक तस्वीर) समान नागरिक संहिता को लेकर बहस तेज हो गई है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 30 जून 2023,
  • अपडेटेड 1:20 PM IST

समान नागरिक संहिता पर बहस और तैयारियां, दोनों तेज हो गईं हैं. सत्तारूढ़ बीजेपी के एजेंडे में समान नागरिक संहिता का मुद्दा हमेशा से रहा है. इस मुद्दे को चुनावी राजनीति में धर्म के आईने से देखा जाता है.

समान नागरिक संहिता पर 22वें विधि आयोग ने भी लोगों और धार्मिक संगठनों के प्रतिनिधियों के सुझाव मांगे हैं. अब तक साढ़े आठ लाख से ज्यादा सुझाव मिल चुके हैं.

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इस बीच संसदीय समिति ने भी विधि आयोग और कानून मंत्रालयों के प्रतिनिधियों को बुलाया है. ये बैठक तीन जुलाई को होगी. 

इतना ही नहीं, ये भी माना जा रहा है कि समान नागरिक संहिता को लेकर सरकार संसद के मॉनसून सत्र में बिल भी ला सकती है. सूत्रों का कहना है कि इस बिल को संसदीय समिति को भी भेजा जा सकता है.

ऐसे में जब समान नागरिक संहिता पर इतनी बहस और तैयारियां चल रही हैं, तो इससे जुड़े कुछ अहम सवालों के जवाब भी जानने जरूरी हैं.

1. समान नागरिक संहिता यानी क्या?

- आसान भाषा में कहें तो एक देश-एक कानून. अभी शादी, तलाक, गोद लेने के नियम, उत्तराधिकारी, संपत्तियों से जुड़े मामलों के लिए सभी धर्मों में अलग-अलग कानून हैं. समान नागरिक संहिता आती है तो फिर सभी के लिए एक ही कानून होगा, फिर चाहे वो किसी भी धर्म या जाति का ही क्यों न हो.

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2. इस पर सरकार का क्या है रुख?

- बीजेपी सरकार समान नागरिक संहिता की वकालत करती रही है. बीजेपी का मानना है कि जब तक समान नागरिक संहिता को अपनाया नहीं जाता, तब तक लैंगिक समानता नहीं आ सकती.

- प्रधानमंत्री मोदी ने भोपाल में बीजेपी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था, 'आजकल समान नागरिक संहिता के नाम पर भड़काया जा रहा है. परिवार के एक सदस्य के लिए एक नियम हो, दूसरे के लिए दूसरा नियम हो तो क्या वो घर चल पाएगा? तो ऐसी दोहरी व्यवस्था से देश कैसे चल पाएगा?'

- समान नागरिक संहिता को लेकर कानून बनाने का जिम्मा 22वें विधि आयोग के पास है. इस पर सुझाव मांगे जा रहे हैं. इतना ही नहीं, खबरें ये भी हैं कि संसद के मॉनसून सत्र में सरकार इससे जुड़ा बिल ला सकती है.

3. विपक्ष का क्या है रुख?

- समान नागरिक संहिता पर विपक्ष का रुख मिला-जुला है. कुछ पार्टियां इसके समर्थन में हैं तो कुछ इसके विरोध में.

- आम आदमी पार्टी और शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) इसके समर्थन में है. आम आदमी पार्टी का कहना है कि वो इसका सैद्धांतिक समर्थन करती है.

- वहीं, उद्धव ठाकरे ने कहा था कि वो इसका समर्थन करते हैं, लेकिन जो लोग इसे ला रहे हैं, उन्हें ये नहीं सोचना कि इससे सिर्फ मुसलमानों को परेशानी होगी, बल्कि इससे हिंदुओं को भी दिक्कत होगी.

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- शरद पवार की पार्टी एनसीपी न तो विरोध में है और न ही समर्थन में. शरद पवार का कहना है कि कुछ मामलों पर सरकार की ओर से स्पष्टता मिलने के बाद पार्टी कुछ फैसला लेगी.

- जबकि कांग्रेस, टीएमसी, जेडीयू, आरजेडी, AIMIM, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग, सपा, डीएमके इसके विरोध में है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी कह चुके हैं कि असली मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए यूसीसी पर बहस छेड़ी जा रही है.

- कभी एनडीए में बीजेपी की सहयोगी रही शिरोमणी अकाली दल ने भी यूसीसी का विरोध किया है. उन्होंने कहा कि इसका अल्पसंख्यक और आदिवासी समुदायों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा.

4. विरोध का कारण क्या?

- कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल का कहना है कि पीएम मोदी को पहले देश में गरीबी, महंगाई, बेरोजगारी और मणिपुर हिंसा के बारे में जवाब देना चाहिए. समान नागरिक संहिता पर उनका बयान इन मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश है.

- छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल ने कहा था कि बीजेपी हमेशा हिंदू-मुस्लिम दृष्टिकोण से क्यों सोचती है? छत्तीसगढ़ में आदिवासी हैं. उनकी रूढ़ियों और उनके नियमों का क्या होगा? अगर समान नागरिक संहिता लागू हो गई तो उनकी परंपरा का क्या होगा?'

- आरजेडी नेता मनोज झा कहते हैं कि यूनिफॉर्म सिविल कोड सिर्फ हिंदू मुसलमान का मसला नहीं है, बल्कि हिंदुओं के बीच में भी विविधता और बहुलता का मसला है. 

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- ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) भी समान नागरिक संहिता के विरोध में है. बोर्ड के सदस्य खालिद रशीदी फिरंगी महली का कहना है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड आने से सिर्फ मुसलमानों को नहीं बल्कि अन्य धर्म के लोगों को भी नुकसान है. 

- तीस से ज्यादा आदिवासी संगठन भी इसका विरोध कर रहे हैं. आदिवासी संगठनों का मानना है कि यूसीसी के आने से उनकी परंपराएं और प्रथाएं और कानून खत्म हो जाएंगे.

5. यूसीसी से क्या बदल जाएगा?

- हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध के पर्सनल मामले हिंदू मैरिज एक्ट से चलते हैं. मुसलमानों, ईसाइयों और पारसियों के अलग पर्सनल लॉ हैं.

- ऐसे में अगर समान नागरिक संहिता लागू होती है तो सभी धर्मों के मौजूदा कानून निरस्त हो जाएंगे. सभी धर्मों में फिर शादी, तलाक, गोद लेने, उत्तराधिकार और संपत्ति से जुड़े विषयों पर एक ही कानून होगा.

6. यूसीसी से क्या होगा असर?

- शादीः हिंदू-सिख-ईसाई-बौद्ध-पारसी और जैन धर्म में एक शादी की ही इजाजत है. दूसरी शादी तभी कर सकते हैं जब पहली पत्नी या पति से तलाक हो चुका हो. लेकिन मुस्लिमों में पुरुषों को चार शादी करने की इजाजत है. यूसीसी आने पर बहुविवाह पर रोक लग जाएगी.

- तलाकः हिंदू समेत कई धर्मों में तलाक को लेकर अलग-अलग नियम हैं. तलाक लेने के आधार अलग-अलग हैं. तलाक लेने के लिए हिंदुओं को 6 महीने तो ईसाइयों को दो साल तक अलग-अलग रहना पड़ता है. लेकिन मुस्लिमों में तलाक का अलग नियम है. यूसीसी आने पर ये सब खत्म हो जाएगा.

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- गोद लेने का अधिकारः कुछ धर्मों के पर्सनल लॉ महिलाओं को बच्चा गोद लेने से रोकते हैं. मसलन, मुस्लिम महिलाएं बच्चा गोद नहीं ले सकतीं. लेकिन हिंदू महिला बच्चा गोद ले सकती है. यूसीसी आने से सभी महिलाओं को बच्चा गोद लेने का अधिकार मिल जाएगा.

- संपत्ति का अधिकारः हिंदू लड़कियों को तो अपने माता-पिता की संपत्ति में बराबर का हक है. लेकिन पारसी लड़की अगर दूसरे धर्म के पुरुष से शादी करती है तो उसे संपत्ति से बेदखल कर दिया जाता है. यूसीसी आने से सभी धर्मों में उत्तराधिकार और संपत्ति के बंटवारे से जुड़ा एक ही कानून होगा.

7. क्या संविधान में इसकी इजाजत है?

- हां, समान नागरिक संहिता भारत के संविधान के अनुच्छेद 44 का हिस्सा है. संविधान में इसे नीति निदेशक तत्व में शामिल किया गया है. 

- संविधान के अनुच्छेद 44 में कहा गया है कि सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करना सरकार का दायित्व है. 

- अनुच्छेद 44 उत्तराधिकार, संपत्ति अधिकार, शादी, तलाक और बच्चे की कस्टडी के बारे में समान कानून की अवधारणा पर आधारित है.

8. फिर क्या दिक्कत है?

- आजादी के 75 साल में एक समान नागरिक संहिता और पर्सनल लॉ में सुधारों की मांग होती रही है, लेकिन धार्मिक संगठनों और राजनीतिक नेतृत्व में एकराय नहीं बन पाने के कारण ऐसा अब तक नहीं हो सका है. यहां तक कि अभी भी सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर हैं.

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- अगस्त 2018 में 21वें विधि आयोग ने अपने कंसल्टेशन पेपर में लिखा था, 'इस बात को ध्यान में रखना होगा कि इससे हमारी विविधता के साथ कोई समझौता न हो और कहीं ये हमारे देश की क्षेत्रीय अखंडता के लिए खतरे का कारण न बन जाए.'

- समान नागरिक संहिता का प्रभावी अर्थ शादी, तलाक, गोद लेने, उत्तराधिकार और संपत्ति का अधिकार से जुड़े कानूनों को सुव्यवस्थित करना होगा. 21वें विधि आयोग ने कहा था कि इसके लिए देशभर में संस्कृति और धर्म के अलग-अलग पहलुओं पर गौर करने की जरूरत होगी. 

- समान नागरिक संहिता का विरोध करने वाले कहते हैं कि इससे सभी धर्मों पर हिंदू कानूनों को लागू कर दिया जाएगा. विरोध करने वाले ये भी कहते हैं कि इससे अनुच्छेद 25 के तहत मिले अधिकारों का उल्लंघन होगा. अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है.

- समान नागरिक संहिता का सबसे ज्यादा विरोध मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड करता है. उसका कहना है कि इससे समानता नहीं आएगी, बल्कि इसे सब पर थोप दिया जाएगा.

9. तो क्या ये लागू नहीं हो पाएगी?

- समान नागरिक संहिता को लागू करना बहुत टेढ़ी खीर है. वो सिर्फ इसलिए नहीं क्योंकि सभी धर्मों के अपने अलग-अलग कानून हैं, बल्कि इसलिए भी क्योंकि हर धर्म के जगह के हिसाब से भी अलग-अलग कानून हैं.

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- जानकार मानते हैं कि सरकार के लिए समान नागरिक संहिता को लागू करना चुनौतीपूर्ण काम है. मिसाल के लिए दक्षिण भारत में सगा मामा अपनी सगी भांजी से शादी कर सकता है, लेकिन उत्तर भारत में ऐसा नहीं होता. ऐसे में सदियों से चली आ रही इन प्रथाओं पर रोक लगाना चुनौतीपूर्ण है. 

10. फिर क्या समाधान है इसका? 

- 2018 में विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि समान नागरिक संहिता पर कोई आम सहमति नहीं होने के कारण पर्सनल लॉ में ही थोड़े सुधार करने की जरूरत है. 

- आयोग ने कहा था कि इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि पर्सनल लॉ की आड़ में मौलिक अधिकारों का हनन तो नहीं हो रहा है और इसे दूर करने के लिए कानूनों में बदलाव करना चाहिए.

 

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