शेखर टुनाइट: शेखर सुमन के साथ लौटा राजनीतिक व्यंग्य का खोया हुआ अंदाज, जुबान और तेवर

शेखर सुमन अपने नए यूट्यूब शो ‘शेखर टुनाइट’ के साथ फिर उसी अंदाज में लौटे हैं, जिसने कभी ‘मूवर्स एंड शेकर्स’ को आइकॉनिक बनाया था. पहले एपिसोड में नितिन गडकरी के साथ उनकी बातचीत और राजनीतिक व्यंग्य ने पुराने टीवी दौर की याद दिला दी. आज के सोशल मीडिया दौर में शेखर का यह तेवर काफी फ्रेश लग रहा है.

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नए शो के साथ पुराने अंदाज में लौट ये हैं शेखर सुमन (Photo: Instagram/@shekhartonite) नए शो के साथ पुराने अंदाज में लौट ये हैं शेखर सुमन (Photo: Instagram/@shekhartonite)

सुबोध मिश्रा

  • नई दिल्ली ,
  • 19 मई 2026,
  • अपडेटेड 7:40 PM IST

एक्टर और टॉक शो होस्ट शेखर सुमन करीब डेढ़ दशक बाद वापस उस रोल में लौट आए हैं, जिसके लिए इंडियन टीवी दर्शक उन्हें आज भी याद रखते हैं. यूट्यूब पर शेखर का नया शो आया है— शेखर टुनाइट. हाल ही में इसका पहला एपिसोड आया, जिसमें केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी शेखर के मेहमान बने. शेखर का ओपनिंग मोनोलॉग और गडकरी के साथ उनकी बातचीत, एक ऐसे दौर की याद लेकर आई है जो अब गायब सा हो चुका है.

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1980 और 90 के दशक में देख भाई देख, छोटे बाबू और अमर प्रेम जैसे कई पॉपुलर टीवी शोज में नजर आ चुके शेखर ने 1997 में अपना शो 'मूवर्स एंड शेकर्स' लॉन्च किया था. ये हिंदी टीवी ऑडियंस के लिए देर रात आने वाले टॉक शो का एक नया एक्सपीरियंस था. मगर इसकी खासियत था शेखर का शो होस्ट करने का अंदाज, उनकी भाषा, व्यंग्य और लहजा. इंडियन सिनेमा के कई उस्तादों और मंझे हुए कलाकारों के साथ काम कर चुके शेखर के पूरे करियर में 'मूवर्स एंड शेकर्स' की जगह बहुत मजबूत रही है.

इस शो में शेखर जिस तरह राजनीति और नेताओं पर व्यंग्य किया करते थे, उसके बारे में सोचकर भी आज के 'इंडिपेंडेंट कंटेंट क्रिएटर्स' के पसीने छूट सकते हैं. अपने आइकॉनिक शो पर शेखर ने बाल ठाकरे से आंखें मिलाते हुए सवाल किया था— 'क्या आप फासिस्ट हैं?'

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जहां दर्शकों में एक पूरी ऐसी पीढ़ी आ चुकी है, जिसने राजनीतिक व्यंग्य यूट्यूब, रील्स या सोशल मीडिया पोस्ट्स में ही देखा है. वहीं उन्हें स्टायर के OG शेखर सुमन के बारे में पता भी नहीं है. मगर लाइक-शेयर-सबस्क्राइब की करंसी में डील करने वाले इस दौर में राजनीतिक व्यंग्य को अचानक से बहुत 'रिस्क भरा काम' भी माना जाने लगा है.

इसकी एक वजह ऐसे व्यंग्य करने वाले कुछ क्रिएटर्स पर हुए कानूनी एक्शन तो हैं ही. लेकिन वरुण ग्रोवर जैसे कुछ नामों को छोड़कर, अधिकतर क्रिएटर्स, यूट्यूबर्स या कॉमेडियन्स के पास राजनीतिक व्यंग्य करते हुए भाषा की सहजता और अंदाज का बैलेंस नहीं दिखता.

'शेखर टुनाइट' के पहले एपिसोड में शेखर असल में बहुत कुछ नया नहीं करते दिखे. बल्कि वो अभी अपने बेस्ट से थोड़े पीछे ही लगे. उन्होंने वही किया जो 2014 में अपना शो बंद होने से पहले वो हर एपिसोड में किया करते थे. लेकिन राजनीतिक व्यंग्य में भाषा की चतुराई, एक्सप्रेशन की करंसी और लहजे का खेल इतनी दुर्लभ चीज हो चुकी है कि वही शेखर अब एक फ्रेश बदलाव की तरह लग रहे हैं.

'शेखर टुनाइट' के पहले एपिसोड में शेखर के मेहमान एक ऐसे नेता बने, जो सरकार चला रही पार्टी से आते हैं. मगर इंटरनेट से वीडियो उतरवाने में होने वाली सरकारी तेजी पर शेखर व्यंग्य करने से नहीं चूके. उन्होंने पश्चिम बंगाल की हार पर पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को तो व्यंग्य में घेरा ही, कांग्रेस पार्टी को कसने में भी वो नहीं चूके. गडकरी के साथ बातचीत में भी शेखर ने बीच-बीच में कुछ चुटकियां लीं. उनके व्यंग्य का निशाना लेफ्ट-राइट-सेंटर सब जगह बना हुआ था. 

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आज के दौर में ये बात बहुत बहादुरी भरी लगती है. लेकिन असल में ये भारतीय व्यंग्य का एक कैरेक्टर था और शेखर ने डेढ़ दशक से ज्यादा इस कैरेक्टर को अपने टॉक शो में उतारा था. 'शेखर टुनाइट' में शेखर के साथ इसी कैरेक्टर की वापसी हुई है, जो काफी फ्रेश नजर आता है. अब नजरें इस बात पर रहेंगी कि शेखर ये तेवर अपने शो के नए एपिसोड्स और अगले मेहमानों के बीच कितना बचाए रखते हैं.

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