इतिहास, असल घटनाएं और विवाद, दिलजीत दोसांझ की इन 5 फिल्मों ने खूब बटोरीं सुर्खियां

'सतलुज' से लेकर 'चमकीला' तक, दिलजीत दोसांझ की सच्ची घटनाओं पर आधारित वो टॉप 5 फिल्में जो रियल लाइफ इवेंट पर बनी और उन्हें लेकर विवाद भी हुए.

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दिलजीत दोसांझ की चर्चित फिल्में (Photo: x/@diljitdosanjh) दिलजीत दोसांझ की चर्चित फिल्में (Photo: x/@diljitdosanjh)

आजतक एंटरटेनमेंट डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 08 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 7:26 AM IST

पंजाबी और हिंदी सिनेमा के सुपरस्टार दिलजीत दोसांझ ने भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में एक ऐसा मुकाम हासिल कर लिया है, जहां उनके प्रोजेक्ट्स सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं रहते. एक तरफ जहां दुनिया उनकी गायकी और कॉमिक टाइमिंग की दीवानी है, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने लगातार ऐसी फिल्मों को चुना है जो पंजाब के अशांत इतिहास, कड़वे सामाजिक सच और असल जिंदगी के किरदारों को पूरी ईमानदारी से पर्दे पर उतारती हैं.
 
हाल ही में उनकी फिल्म 'सतलुज' (जिसका पुराना नाम 'पंजाब 95' था) को लेकर शुरू हुए ताजा विवाद ने इस बात को एक बार फिर साबित कर दिया है. ओटीटी प्लेटफॉर्म 'Zee5' पर रिलीज होने के महज दो दिन बाद ही इस फिल्म को अचानक हटा दिया गया, जिसके बाद से सोशल मीडिया पर सेंसरशिप और कलाकारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है.

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सतलुज (पहले नाम 'पंजाब 95' था)
'सतलुज' फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की जिंदगी पर आधारित है. उन्होंने 1980 और 1990 के दशक में पंजाब में उग्रवाद के दौरान हजारों अज्ञात शवों के कथित तौर पर गैर-कानूनी ढंग से अंतिम संस्कार किए जाने का खुलासा किया था. खालड़ा की जांच भारत में मानवाधिकारों से जुड़े सबसे अहम मामलों में से एक बन गई थी, लेकिन 1995 में उनका अपहरण कर हत्या कर दी गई. इस फिल्म को लेकर घोषणा के समय से ही विवाद रहा है. खबर है कि संवेदनशील राजनीतिक और ऐतिहासिक कंटेंट की वजह से सेंसर बोर्ड ने इस पर कई आपत्तियां जताई थीं, जिसके कारण इसका नाम 'पंजाब 95' से बदलकर 'सतलुज' करना पड़ा और रिलीज में देरी हुई. रिलीज के कुछ ही समय बाद Zee5 से इसे हटाए जाने के बाद इस बात पर बहस और तेज हो गई है कि क्या संवेदनशील ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित फिल्मों पर गलत तरीके से रोक लगाई जा रही है.

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पंजाब 1984: हिंसा के बीच एक मां की तलाश
2014 में रिलीज हुई फिल्म 'पंजाब 1984' की कहानी 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' के बाद और पंजाब में उग्रवाद-विरोधी दौर की पृष्ठभूमि पर आधारित है. यह कहानी एक मां की अपने लापता बेटे की बेताब तलाश के बारे में है, जो राज्य में फैली हिंसा की चपेट में आ जाता है. हालांकि फिल्म की कहानी को बहुत पसंद किया गया और यह काफी भावुक थी, लेकिन कुछ समूहों ने इसकी आलोचना भी की. कुछ लोगों का मानना ​​था कि इसमें उग्रवादियों को बहुत सहानुभूति के साथ दिखाया गया है, जबकि दूसरों का तर्क था कि इसमें उग्रवाद और सरकारी कार्रवाई के बीच फंसे आम परिवारों के दुख-दर्द को दिखाया गया है. यह फिल्म पंजाब के मुश्किल दौर को दिखाने वाली सबसे चर्चित फिल्मों में से एक बनी हुई है. 

जोगी: 1984 के दंगों के दौरान जिंदा रहने की कहानी
2022 में नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई 'जोगी' फिल्म, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए 1984 के दुखद सिख-विरोधी दंगों पर आधारित है. इसमें दिलजीत ने एक युवा सिख व्यक्ति की भूमिका निभाई है जो दिल्ली में फैल रही हिंसा से अपने परिवार और पड़ोसियों को बचाने की कोशिश कर रहा है.

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हालांकि फिल्म को राजनीति के बजाय इंसानियत पर ध्यान केंद्रित करने के लिए तारीफ मिली, लेकिन इसने चर्चा भी छेड़ी क्योंकि इसने भारत के सबसे दर्दनाक अध्यायों में से एक को फिर से सामने लाया. कई दर्शकों ने सिनेमा के जरिए पीड़ितों की यादों को जिंदा रखने की इसकी कोशिश की सराहना की.

सज्जन सिंह रंगरूट: भुला दिए गए नायकों को याद करना
'सज्जन सिंह रंगरूट' प्रथम विश्व युद्ध, और खासकर फ़्लैंडर्स की लड़ाई के दौरान ब्रिटिश भारतीय सेना में सेवा करने वाले सिख सैनिकों की कहानी बताती है. ऐतिहासिक घटनाओं से प्रेरित यह फिल्म उन भारतीय सैनिकों के बलिदानों पर रोशनी डालती है जिनके योगदान पर मुख्यधारा के इतिहास में अक्सर कम ध्यान दिया जाता है. हालांकि यह फिल्म किसी बड़े राजनीतिक विवाद में नहीं फंसी, लेकिन इसने एक वैश्विक संघर्ष में पंजाबी सैनिकों की अनदेखी भूमिका को उजागर करके युद्ध से जुड़ी पारंपरिक कहानियों को चुनौती दी और भुला दिए गए इतिहास को दर्शकों के सामने लाने के लिए तारीफ बटोरी.

चमकीला: पंजाब के संगीत के दिग्गज की ज़िंदगी
इम्तियाज अली द्वारा निर्देशित 'अमर सिंह चमकीला' में दिलजीत ने मशहूर पंजाबी गायक अमर सिंह चमकीला की भूमिका निभाई है. उनके बेबाक बोलों ने उन्हें 1980 के दशक में बेहद लोकप्रिय बना दिया था, लेकिन 1988 में उनकी पत्नी अमरजोत के साथ उनकी हत्या कर दी गई. इस फिल्म ने चमकीला की विरासत को लेकर बहस को फिर से हवा दी. जहां कई लोगों ने इसे एक सांस्कृतिक आइकन को श्रद्धांजलि के तौर पर सराहा, वहीं दूसरों ने गायक के अश्लील बोल और उनकी रहस्यमयी हत्या के हालात से जुड़ी पुरानी आलोचनाओं को फिर से उठाया. फिल्म ने दर्शकों को विवादों से परे जाकर संगीत के पीछे के इंसान को समझने के लिए प्रेरित किया.

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अक्सर देखा जाता है कि बड़े स्टार्स विवादों से बचने के लिए बेहद सुरक्षित और हल्के-फुल्के विषय चुनते हैं, लेकिन दिलजीत दोसांझ का सफर इससे बिल्कुल जुदा रहा है. उन्होंने लगातार उन संवेदनशील और कड़वे मुद्दों पर फिल्में बनाने और उनमें काम करने का हौसला दिखाया है, जिनसे लोग कतराते हैं. मानवाधिकारों के हनन, सांप्रदायिक हिंसा, इतिहास के पन्नों में खो चुके युद्ध नायकों और जमीनी स्तर के संगीतकारों की जिंदगी को उन्होंने जिस संजीदगी से पर्दे पर जिया है, वह उनके हुनर को बयां करता है. दिलजीत का यह अंदाज दिखाता है कि वह बतौर कलाकार रिस्क लेने से कभी पीछे नहीं हटते.

दिलजीत दोसांझ के इन चुनिंदा और गंभीर प्रोजेक्ट्स को लेकर कई बार सिनेमा गलियारों और सोशल मीडिया पर तीखी बहसें देखने को मिली हैं. कई बार उनकी फिल्मों को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है, तो कई बार उन्हें जबरदस्त सराहना भी मिली है. हालांकि, इन तमाम विवादों के बीच सबसे अच्छी बात यह रही कि इन फिल्मों ने दर्शकों को पंजाब के इतिहास के उन महत्वपूर्ण और अनछुए पहलुओं को दोबारा देखने और समझने पर मजबूर किया है, जिन्हें लोग भूल चुके थे.

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