सिनेमा के 'धुरंधरों' आदित्य धर और संदीप रेड्डी वांगा ने किस GOAT डायरेक्टर के सामने झुकाया सिर?

'धुरंधर' और 'एनिमल' दोनों ने फिल्म आलोचकों को दो टुकड़ों में बांट दिया. मगर फिल्म को लेकर पक्ष और विपक्ष बनने वालों से अलग, कुछ लोग इन फिल्मों की क्राफ्ट का भी एक्स-रे कर रहे हैं. दोनों की जड़ में वो आईडिया है, जो 90s में एक GOAT फिल्ममेकर ने दिया था.

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'धुरंधर' और 'एनिमल'के पीछे इन्सपिरेशन हैं राम गोपाल वर्मा का सिनेमा? (Photo: ITGD) 'धुरंधर' और 'एनिमल'के पीछे इन्सपिरेशन हैं राम गोपाल वर्मा का सिनेमा? (Photo: ITGD)

aajtak.in

  • नई दिल्ली ,
  • 23 दिसंबर 2025,
  • अपडेटेड 5:00 PM IST

इस दिसंबर ‘धुरंधर’ ने जैसा शोर किया वो बहुत जाना-पहचाना लगा. बॉक्स ऑफिस आंकड़ों से इतर, लोग ‘धुरंधर’ का नाम ‘सत्या’, ‘शिवा’ और ‘कंपनी’ जैसी फिल्मों के साथ एक ही सांस में ले रहे हैं. ये सभी राम गोपाल वर्मा की फिल्में हैं. इन फिल्मों ने सिर्फ हिंसा और ड्रामा को ही बढ़ा-चढ़ा कर नहीं दिखाया.  बल्कि फिल्मों के जनता से संवाद का तरीका ही बदल दिया.

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आदित्य धर की ‘धुरंधर’ के साथ हो रहा ये देजा-वू नया नहीं है. दो दिसंबर पहले, संदीप रेड्डी वांगा की ‘एनिमल’ देखकर भी लोगों का रिएक्शन ऐसा ही था. नैतिकता की बहसें तेज़ थीं और कोई अपने पक्ष पर टस से मस होने को राज़ी नहीं था. पर आक्रोश और बचाव के बीच, दर्शकों का एक तबका बारीकी से नोट कर रहा था कि फिल्म बनाई कैसे गई है.

कैमरा कहां ज़्यादा देर टिका रहा, सीन के बीच कहां बैकग्राउंड साउंड बंद हो गई. और कैसे हिंसा एक सीक्वेंस का एंड नहीं बनती, बल्कि आने वाले सीक्वेंस का बीज बनती है. ये समानताएं तुक्का नहीं थीं. वांगा और धर, दोनों एक फिल्ममेकर के खुले प्रशंसक रहे हैं जिसने भारतीय सिनेमा के व्याकरण का बेसिक ही बदल दिया— राम गोपाल वर्मा.

दो साल के अंतर पर रिलीज़ हुईं ये दोनों फिल्में (धुरंधर और एनिमल) बहुत अलग जॉनर की थीं. मगर इन पर असहजता, स्पष्ट बंटी हुई राय और लंबी बहसों से भरी प्रतिक्रिया एक जैसी थी. यह मात्र एक संयोग नहीं है. ये कुछ और इशारा करती है. (इस वीडियो में आदित्य धर अपने सिनेमा पर वर्मा के असर पर बात कर रहे हैं)

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राम गोपाल वर्मा इफेक्ट
‘एनिमल’ या ‘धुरंधर’ से बहुत पहले, राम गोपाल वर्मा ने भारतीय सिनेमा में हिंसा को प्रयोग करने का तरीका बदल दिया था. वर्मा की फिल्में हिंसा लेकर नहीं आई थीं, क्योंकि इंडियन सिनेमा में ये बहुत पहले से थी. लेकिन उन्होंने इसकी धुन, प्लेसमेंट और परिणामों को बदल दिया था.

‘शिवा’ में साउंड एक इमोशनल गाइड की तरह काम नहीं कर रही थी. लड़ाइयां बिना म्यूज़िकल वॉर्निंग के शुरू हो जाती थीं. बातचीत के बीच में, रूटीन सीन के बीच में हिंसा आ जाती थी. और ये हिंसा घनी बस्तियों और मुंबई की अनजान सड़कों पर होने लगती थी, जिससे कोई इसका पूर्वानुमान नहीं लगा सकता था. गोली की आवाज़ से टेंशन रिलीज़ नहीं होती थी, बढ़ती थी. ‘कंपनी’ में वायलेंस का काम प्रशासनिक था— मीटिंग्स और फोन कॉल्स में घट जाती थी. कोई कैथार्सिस नहीं… कोई नैतिकता नहीं. खामोशी सुकून नहीं थी, ख़तरा थी.

वर्मा जब शिखर पर थे, तब उनकी फिल्मों में कोई सेफ्टी नेट नहीं था. फिल्में खुद को एक्सप्लेन नहीं करती थीं या भरोसा नहीं दिलाती थीं कि वो किस तरफ खड़ी हैं. बाद में उनकी जो फिल्में उनके ही काम की पैरोडी बनीं या जिनमें उनका अपना ही स्टाइल ओवरफ्लो कर गया, उनमें भी ये बेसिक तेवर बचा हुआ था. वांगा और धर जैसे फिल्ममेकर्स ने किसी विज़ुअल सिग्नेचर से ज़्यादा, वर्मा का ये तेवर सीख लिया है.

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एक विरासत, दो अंदाज़
‘एनिमल’ और ‘धुरंधर’ उसी दिशा में सोचती हैं, जिसमें वर्मा ने कभी इंडियन सिनेमा को धकेला था. मगर दोनों अलग-अलग मिज़ाज पर पहुंचती हैं.

वांगा की ‘एनिमल’ हमलावर अंदाज़ की है. इसकी हिंसा फिज़िकल होने से पहले साइकोलॉजिकल है. क्लोज़-अप्स असहज कर देने वाले हैं. पिता का, पत्नी का और भाइयों का सामना करते रणबीर का चेहरा हो, या कमरों में, लॉन में और कॉरिडोर में पसरा सन्नाटा— कैमरा दूर होने को तैयार ही नहीं है. ये ऐसी जगहें हैं जिन्हें सुरक्षित माना जाता है, पर यहां कैमरा इन्हें इतने करीब से देख रहा है कि ये भयावह लगने लगती हैं. और फिर हिंसा का विस्फोट सीन्स को किसी नतीजे पर नहीं पहुंचाता, आने वाले हर सीन को रक्तरंजित कर देता है. एक्शन के साथ बैकग्राउंड स्कोर चलता तो रहता है, पर उसका सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा तब आता है जब नुकसान हो चुका होता है. इससे दर्शक आगे होने वाली घटनाओं का पूर्वानुमान नहीं लगाने बैठता; वो अभी-अभी घटे हुए को प्रोसेस करता रह जाता है.

‘एनिमल’ पर हुईं सार्वजनिक बहसें फिल्म की नैतिकता, खून-खराबे और मर्दानगी की परिभाषा पर ही रह गईं. मगर इसकी असली उत्तेजना कहीं और छिपी थी— इसने दर्शकों को एक जगह टिककर, फिल्म जज करने के लिए एक स्थायी ज़मीन नहीं दी. घटनाओं को देखने की कोई सुरक्षित जगह नहीं थी और न कोई नैतिक ज़मीन. वांगा अपने दर्शक को ध्वस्त हो चुकी साइकोलॉजी के बीच लॉक कर देते हैं और इसका सामना करने की चुनौती देते हैं. वो न इसे बढ़ावा देते हैं, न इससे भागते हैं.

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इसके उलट ‘धुरंधर’ कहीं ज़्यादा कसी हुई है. मगर इस कसने को तटस्थता समझने की गलती न करिए. जहां ‘एनिमल’ फट पड़ती है, वहां ‘धुरंधर’ सिकुड़ जाती है. आदित्य धर अपनी फिल्म को एक तमाशा नहीं, प्रोसेस की तरह ट्रीट करते हैं. सूचना सीमित है, समय खिंचा हुआ और व्यवस्थाएं धीरे-धीरे खुलती हैं.

हमज़ा (रणवीर सिंह का किरदार) कोई विरासत छोड़ने के मूड में नहीं है. फिल्म के ज़्यादातर हिस्से में वो इंतज़ार कर रहा है, घुल-मिल रहा है और उतना ही कर रहा है जितना उसे कहा गया है. ल्यारी किसी दुश्मन का प्रतीक नहीं है. वो एक पॉलिटिकल और ह्यूमन नेटवर्क है जो मीटिंग्स, डायलॉग, समझौतों, टालमटोल और बातचीत में आकार ले रहा है. कहानी का ड्रामा इस प्रोसेस से, किरदारों की बॉन्डिंग से निकलता है. और मकसद पहले ही अनाउंस नहीं किया जाता; धीरे-धीरे इस सिस्टम में खुलना शुरू होता है. ‘धुरंधर’ में हर चीज़ महत्वपूर्ण है— प्रोसेस, इलेक्शन, गठबंधन, नियंत्रण और सबसे ज़्यादा इंतज़ार. आदित्य धर दर्शकों को इमोशन से झिंझोड़ते हैं. वे इस बात से झिंझोड़ते हैं कि जो हुआ है, उसे टाला नहीं जा सकता था.

स्पेक्टेकल की जगह प्रेशर
इमोशनल कैथार्सिस देने से इनकार करना ही ‘धुरंधर’ और ‘एनिमल’ की वो बात है जो वर्मा की याद दिलाती है. ‘सत्या’ में एक हत्या से टेंशन खत्म नहीं होती, पैदा होती है. ‘एनिमल’ में वायलेंस सीन खत्म नहीं करती, अगले सीन पर असर दिखाती है. ‘धुरंधर’ में वायलेंस अंतिम लक्ष्य नहीं है, नियति है.

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तीनों ही फिल्मों में सीन्स कहानी की ज़रूरत से ज़्यादा खिंचे हुए हैं. कैमरा शानदार चीज़ों को कैप्चर करने से इनकार करते हुए हिंसा को उसके रॉ, भद्दे परिणाम के साथ कैप्चर करता है. ये हिंसा का सौंदर्य-प्रेम नहीं है, उसकी वैचारिक स्पष्टता है. असहजता बाय-प्रोडक्ट नहीं है, डिज़ाइन है.

बिना हीरोगीरी वाली परफॉर्मेंस
कहानी कहने का ये दर्शन परफॉर्मेंस में भी नज़र आता है. ‘एनिमल’ में रणबीर कपूर का किरदार सराहने के लिए नहीं है. उसके उत्पात को फिल्म न सुधारने की कोशिश करती है, न उस पर कमेंट्री करने की. फिल्म कहीं भी दर्शकों को ये निर्देश नहीं देती कि उसके लिए क्या फील करना है— इसी चीज़ ने बहुत सारे दर्शकों को विचलित किया था.

मिशन्स, संस्थानों और उधड़ती नैतिकता ने ‘धुरंधर’ में रणवीर सिंह के हमज़ा को खोखला कर दिया है. उन्हें ‘रक्षक’ दिखाने की कोई कोशिश नहीं होती. उनकी परफॉर्मेंस में स्टार्स वाला अतिविश्वास नहीं है. वो बस फंक्शन कर रहा है, क्योंकि उसे फंक्शन करने के लिए ही तैयार किया गया है. उसमें वर्मा के सबसे मज़बूत नायकों की झलक मिलती है— ऐसे किरदार जिन्हें उनकी सोच नहीं, उनका माहौल गढ़ता है.

इसीलिए राम गोपाल वर्मा का ‘धुरंधर’ पर रिस्पॉन्स वज़नदार है. जब वो कहते हैं कि “ये फिल्म नहीं, इंडियन सिनेमा में एक बहुत लंबी छलांग है,” वो फिल्म के स्केल या स्पेक्टेकल की बात नहीं कर रहे थे. वो कहानी में प्रेशर भरा माहौल बनाने की बात कर रहे थे.

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जिस फिल्ममेकर की धारणाओं को नई रोशनी और अंधकार दोनों कहा गया हो, उससे ये तारीफ़ मिलना प्रचार नहीं, पहचान मिलने जैसा है. धर का रिस्पॉन्स इस बात को स्वीकार करता है कि वो वर्मा के शिष्य भले न हों, मगर सोच के मामले में उन्हीं की परंपरा से आते हैं. उन्होंने वर्मा की फिल्ममेकिंग से नहीं, दर्शकों की समझ पर भरोसा करने से इंस्पिरेशन ली है. वर्मा का ये कहना कि 'प्रभावित होने का फायदा तभी है, जब उसकी नींव पर और बड़ी इमारत खड़ी हो'— इंस्पिरेशन के इस सर्कल को पूरा करता है.

वांगा ने इस बात में अलग से सहमति जताई. उन्होंने ‘धुरंधर’ को ऐसी फिल्म कहा जो नैरेटिव को कसकर दबदबा बनाते हुए आगे बढ़ती है. अलग-अलग आवाज़ों ने एक ही बात पर ज़ोर दिया— ऐसा सिनेमा जो अपने इरादों के लिए माफ़ी न मांगे.

रिपोर्ट: टी मारुति आचार्य

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