Gangotri assembly seat: जिस पार्टी ने यहां हासिल की जीत, राज्य में बनी उसी की सरकार

उत्तराखंड की तो 2000 में राज्य की स्थापना होने पर 2002 में पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के विजय पाल सजवाण विधानसभा में पहुंचे तो सरकार कांग्रेस की बनी. जब 2007 में इसी सीट से बीजेपी के गोपाल रावत निर्वाचित हुए

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सांकेतिक तस्वीर सांकेतिक तस्वीर

ओंकार बहुगुणा

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  • 21 अगस्त 2021,
  • अपडेटेड 12:34 AM IST
  • जो भी पार्टी इस सीट से जीती सरकार उसी की बनती रही
  • 1958 से लेकर 2017 के चुनाव तक ये मिथक बरकरार रहा
  • 2017 के चुनाव में बीजेपी के गोपाल रावत निर्वाचित हुए थे

मां गंगा के उद्गम क्षेत्र और करोड़ों लोगों की आस्था के केंद्र रहे गंगोत्री धाम से जुड़ी यह गंगोत्री विधानसभा सीट प्रदेश की राजनीति में अहम भूमिका निभाती है. यह विधानसभा सीट इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि जिला मुख्यालय भी इसी के अंतर्गत आता है. आजादी के बाद से इस सीट पर जो भी चुनाव हुए है जिस भी पार्टी का प्रत्याशी इस सीट से जीतता है सरकार उसी की बनी है. ये मिथक राजनीतिक गलियारों में अभी भी सुना जा सकता है. 

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राजनीतिक पृष्ठभूमि

सन 1958 के आंकड़ों पर यदि गौर करें तो तत्कालीन उत्तरप्रदेश की उत्त्तरकाशी सीट से कांग्रेस के रामचंद्र उनियाल विधायक बने, तो राज्य में कांग्रेस की सरकार बनी. इसके बाद तीन बार कांग्रेस के कृष्ण सिंह विधायक बने, तो प्रदेश में तीनों बार कांग्रेस की सरकार बनी. 1974 में उत्तरकाशी विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए घोषित होने पर यहां कांग्रेस नेता बलदेव सिंह आर्य विधायक बने, तब भी प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी.

आपातकाल के बाद राजनीतिक उथल-पुथल के समय जनता पार्टी अस्तित्व में आई. उस समय जनता पार्टी के बर्फिया लाल जुवाठा चुनाव जीते और प्रदेश में जनता पार्टी की सरकार बनी. ऐसे में उत्तरकाशी सीट से जुड़े इस मिथक को बनाए रखने के लिए बीजेपी और कांग्रेस दोनों दलों ने ही गंगोत्री विधानसभा पर हमेशा अपनी पूरी ताकत झोंक रखी है.

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उत्तराखंड में पहली जीत कांग्रेस के नाम
अब अगर बात करें उत्तराखंड प्रदेश की तो 2000 में इस राज्य की स्थापना होने पर 2002 में पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के विजय पाल सजवाण विधानसभा में पहुंचे तो सरकार कांग्रेस की बनी. जब 2007 में इसी सीट से बीजेपी के गोपाल रावत निर्वाचित हुए तो सरकार भगवा पार्टी की बनी.

साल 2012 में कांग्रेस के विजयपाल के जीतने पर प्रदेश में उन्हीं की पार्टी कांग्रेस की सरकार बनी. वहीं विधानसभा चुनाव 2017 में बीजेपी विधायक गोपाल रावत निर्वाचित हुए तो सरकार बीजेपी की बनी. इस तरह से सन 1958 से ये मिथक बरकरार है. हालांकि अब यह देखना जरूरी होगा कि आगामी 2022 में होने वाले विधानसभा के चुनाव में ये मिथक बरकार रहता है या नहीं.

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गौरतलब है कि इस सीट पर राज्य बनने के बाद से अब तक मात्र कैडर वोट का ही बोलबाला रहता है. एक बार कांग्रेस तो एक बार बीजेपी सिर्फ राष्ट्रीय पार्टी को ही यहां के वोटर तबज्जो देते है. हालांकि इसका प्रमुख कारण क्षेत्रीय पार्टियों का सक्रिय न होना भी माना जा सकता है.

हालांकि ये भी गौर किया जाना आवश्यक होगा कि इस बार गंगोत्री विधायक गोपाल रावत की मृत्यु होने पर राजनीतिक गणित में उलटफेर होने लगा था क्योंकि उपचुनाव की सुगबुगाहट से आम आदमी पार्टी का चेहरा और मोहरा बने रिटायर्ड कर्नल अजय कोठियाल ने उपचुनाव के लिए इस सीट से दावेदारी पेश कर दी थी.

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कर्नल कोठियाल का इस सीट से काफी लगाव रहा है क्योंकि केदारनाथ आपदा के दौरान कर्नल उत्तरकाशी जिले में स्थित नेहरू पर्वतारोहण संस्थान में बतौर प्रिंसिपल तैनात थे. साथ ही यूथ फाउंडेशन क्लब खोल कर कर्नल ने विशेष कर इस क्षेत्र के युवाओं को सेना में भर्ती होने के लिए निशुल्क भर्ती पूर्व ट्रेनिंग दिलवाई थी. कर्नल की कहीं न कहीं इस सीट पर पकड़ तेज होती जा रही थी जो राष्ट्रीय पार्टियों के लिए मुसीबत का सबब बनने लगी थी.

सामाजिक तानाबाना
गंगोत्री विधानसभा सीट कुल मतदाताओं में से 43003 पुरुष मतदाता हैं तो महिला मतदाताओं की संख्या 40278 है. जातीगत आधार पर नजर डालें तो यहां ठाकुर 62% और ब्राह्मण 17% हैं. जबकि अनुसूचित जाति 19% और अनुसूचित जनजाति 15% है. मुस्लिम आबादी 0.5 फीसदी है.

उपरोक्त आंकड़ों के आधार पर जान सकते है कि इस सीट में ठाकुर वोटों का प्रतिशत सर्वाधिक है जबकि ब्राह्मणों और अन्य का कम. हालांकि यहां कांग्रेस का वोटर और मुस्लिम/अनुसूचित जाति वर्ग का माना जाता है और यही वोटर समीकरण बिगाड़ने का काम करते हैं.

2017 का जनादेश 
2017 के विधानसभा चुनाव में यहां के वोटर्स ने बीजेपी के गोपाल रावत पर विश्वास जताया और कांग्रेस के विजयपाल सजवाण को हरा दिया. 2012 में विजयपाल कांग्रेस से जीते थे जबकि बीजेपी के गोपाल रावत हार गए थे, लेकिन 2017 के चुनाव में बीजेपी के गोपाल रावत (25683 वोट) ने पलटवार करते हुए कांग्रेस के विजय पाल (16073 वोट) को हरा दिया.

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विधायक का रिपोर्ट कार्ड 
गंगोत्री विधानसभा से निर्वाचित विधायक 62 साल के गोपाल रावत का जन्म 24 फरवरी 1959 को हुआ था. हालांकि कैंसर की बीमारी की वजह से इस साल 21 अप्रैल को उनकी मृत्यु हो गई और गंगोत्री सीट रिक्त हो गई. गोपाल रावत छात्रसंघ अध्यक्ष, पालिका सभासद, ब्लाक प्रमुख और विधायक के तौर पर जन सरोकारों से जुड़े रहे.

छात्र जीवन से ही समाजसेवा में सक्रिय रहे गोपाल रावत ने साल 1984 में पीजी कालेज उत्तरकाशी में छात्र संघ अध्यक्ष बनने के साथ अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी. इसके बाद वे उत्तरकाशी नगरपालिका में सभासद चुने गए. इस दौरान उन्होंने पूर्व काबीना मंत्री बलदेव सिंह आर्य के साथ पीआरओ के तौर पर सेवाएं दीं.

साल 1996 में गोपाल रावत डुंडा प्रखंड के ब्लॉक प्रमुख चुने गए. 2002 तक ब्लॉक प्रमुख के तौर पर राजनीति में सक्रिय रहने के बाद 2005 में उन्होंने बीजेपी की सदस्यता ग्रहण कर ली और 2007 में गंगोत्री विधानसभा से वह विधायक चुने गए. साल 2012 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद उन्होंने साल 2017 के चुनाव में रिकार्ड मतों से जीत हासिल की.

अपने विधायक कार्यकाल में उन्होंने बड़ी संख्या में सड़क से अछूते गांवों के लिए सड़कें स्वीकृत कराईं. क्षेत्र में कराए गए विकास कार्यों, मृदुभाषी, मिलनसार तथा स्पष्टवादी छवि के कारण वह क्षेत्र की जनता में खासे लोकप्रिय रहे. 

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​उत्त्तरकाशी जिले का प्रोफाइल

24 फरवरी सन 1960 को टिहरी रियासत से अलग होकर इस उत्त्तरकाशी जिले को बनाया गया था. गंगोत्री और यमुनोत्री जैसे तीर्थ स्थानों के लिए भी ये जिला विश्वभर में प्रसिद्ध है. जिला मुख्यालय उत्तरकाशी के नाम से जाना जाता है जो वरुण और अशी गंगा के बीच में वरुणावत पर्वत की तलहटी में स्थित है. यहीं पर गंगा भागीरथी बहती है तो मणिकर्णिका घाट भी है. साथ ही नगर के मध्य में काशी विश्वनाथ मंदिर भी है. स्कन्द पुराण के केदार खण्ड में उत्त्तरकाशी का वर्णन मिलता है.

उत्त्तरकाशी जिला मुख्यतः दो घाटियों से मिल कर बना है, एक गंगा घाटी जो कि गांगोत्री धाम से जिला मुख्यालय से बहती हुई गंगा नदी प्रवाह के इलाकों के रूप में जानी जाती है. दूसरी है यमुना घाटी जो राड़ी पर्वत से यमुना के उद्गम यमुनोत्री धाम से होते हुए हिमाचल प्रदेश की सीमा के रूप में जानी जाती है. यमुना घाटी के लोग रवालटा समुदाय से ताल्लुख रखते हैं जो कि अन्य बैकवर्ड क्लास के अंतर्गत आते हैं.

यहां की आमदनी का जरिया मुख्यतः पर्यटन व्यवसाय है जो कि छह महीने तक चलने वाली यात्रा पर आधारित है. हालांकि इस जिले में सेब, खुमानी, नाशपाती, आलू, राजमा आदि का भी व्यापार बहुतायत से होता है.

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सामाजिक तानाबाना
उत्त्तरकाशी जिले में मुख्यतः 3 विधानसभा सीटें हैं जिनमें पुरोला, यमुनोत्री और गंगोत्री शामिल है जबकि पूरा जिला टेहरी संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आता है. संसदीय सीट की अगर बात करें तो इस सीट से आजादी के बाद से अब अधिकांश समय पर बीजेपी का ही परचम लहराया था.

हालांकि विजय बहुगुणा (कांग्रेस), परिपूर्णानंद पैन्यूली (कांग्रेस) भी इस सीट पर विजयी रहे थे. जिले में कांग्रेस और बीजेपी का ही पूर्ण रूप से दबदबा रहा है. प्रत्येक सीट के आंकड़ों पर गौर किया जाए तो यमुनोत्री विधानसभा को छोड़कर पुरोला और गांगोत्री में दो बार कांग्रेस तो दो बार बीजेपी काबिज रही है. जिले की गांगोत्री विधानसभा सीट से कांग्रेसी नेता विजय पाल सजवाण का दबदबा है.

राजनीतिक गतिबिधियों की अगर बात की जाए तो कांग्रेस द्वारा बंद पड़ी लोहारी नाग पाला बारसु परियोजना को दुबारा शुरू करने का मुद्दा बनाया गया है. साथ ही ऑल वेदर रॉड को गांगोत्री तक बनाने के भी आंदोलन किया जाता रहा है. दूसरी ओर, आम आदमी पार्टी की ओर से कर्नल अजय कोठियाल के अचानक सक्रिय हो जाने पर गंगोत्री सीट के समीकरण गड़बड़ाने से भी इंकार नहीं किया जा सकता है.

 

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