मालदा से BJP के मिशन बंगाल का आगाज, लेफ्ट-ममता जहां रहे विफल, क्या शाह खिला पाएंगे कमल?

पश्चिम बंगाल का मालदा जिला कांग्रेस के दिवंगत दिग्गज नेता गनी खान चौधरी का मजबूत इलाका रहा माना जाता है, जहां लेफ्ट से लेकर ममता बनर्जी तक का जादू नहीं चल सका. ऐसे में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह मालदा के जरिए चुनावी बिगुल फूंकेगे. सवाल ये है कि क्या यहां शाह का गणित कामयाब रहेगा? 

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बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह (फोटो-फाइल) बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह (फोटो-फाइल)

कुबूल अहमद / मनोज्ञा लोइवाल

  • कोलकाता/नई दिल्ली,
  • 22 जनवरी 2019,
  • अपडेटेड 2:49 PM IST

पश्चिम बंगाल की सियासत में कमल खिलाने के लिए भारतीय जनता पार्टी (BJP) के अध्यक्ष अमित शाह दो दिन के दौरे पर मंगलवार को यहां पहुंच रहे हैं. शाह अपने दौरे के पहले दिन बांग्लादेश की सीमा से लगे मालदा जिले में एक विशाल जनसभा के जरिए 2019 लोकसभा चुनाव का आगाज करेंगे.

मालदा जिला कांग्रेस का मजबूत गढ़ माना जाता है. यह कांग्रेस के दिवंगत नेता गनी खान चौधरी का इलाका रहा है, जहां लेफ्ट से लेकर ममता बनर्जी तक का जादू नहीं चल सका है. ऐसे में सवाल है क्या शाह मालदा की सियासत में कमल खिलाने में कामयाब हो पाएंगे?

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साल 1980 से 2005 तक गनी खान चौधरी मालदा इलाके से चुनकर लोकसभा पहुंचते रहे हैं. 2005 में चौधरी के निधन के बाद से उनका परिवार यहां की सियासत पर काबिज है. मालदा जिले में दो लोकसभा सीटें हैं. इनमें एक उत्तर मालदा सीट, जहां से गनी खान चौधरी की भतीजी मौसम नूर कांग्रेस से सांसद हैं और दूसरी,  दक्षिण मालदा सीट से उनके भाई अबु हासेमखान चौधरी कांग्रेस से सांसद हैं. हालांकि 2009 के लोकसभा चुनाव से उनके भाइयों और भतीजी के बीच दरार पड़ गई है. 2015 में उनके भाइयों में से एक ने पार्टी छोड़ दी और टीएमसी में शामिल हो गए.

मालदा पर बीजेपी की नजर

बंगाल में 32 साल की वामपंथी सरकार के दौरान प्रमोद दासगुप्ता से लेकर बिमान बसु तक और बुद्धदेव भट्टाचार्य जैसे वरिष्ठ नेताओं की लाख कोशिशों के बावजूद लेफ्ट मालदा में पैर नहीं जमा सका. इसी तरह से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी 2011 से सत्ता में हैं, लेकिन मालदा की सियासत में टीएमसी को जगह नहीं मिल सकी है.

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पश्चिम बंगाल का मालदा जिला बांग्लादेश की सीमा से सटा हुआ है, जहां आदिवासी और हिंदू मतदाताओं की संख्या अच्छी खासी है. ऐसे में बीजेपी को इस इलाके में उम्मीद की किरण नजर आ रही है. यही वजह है कि अमित शाह ने मिशन बंगाल की शुरूआत के लिए मालदा को चुना है.

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) पश्चिम बंगाल में हिंदुत्व की जमी को मजबूत करने में जुटी हुई है. राज्य में संघ की शाखाओं में लगातार बढ़त दर्ज की जा रही है. साल 2013 में यहां संघ की 750 शाखाएं थीं जो 2018 में बढ़कर 1279 हो गईं. इस तरह से मालदा में संघ की करीब 37 शाखाएं लग रही हैं, जिनमें 4,000 सक्रिय सदस्य हैं और 25,000 से अधिक समर्थक शामिल हैं.

माना जाता है कि पश्चिम बंगाल के किसी और इलाके से ज्यादा बीजेपी के प्रति लोगों को झुकाव इसी क्षेत्र में है. यहां 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 17 फीसदी वोट मिले थे. 60 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं वाली मालदा दक्षिण सीट पर 2014 के चुनाव में बीजेपी दूसरे नंबर पर रही थी. इतना ही नहीं पिछले साल हुए पंचायत चुनाव में मालदा जिले की 500 से ज्यादा सीटों पर बीजेपी ने जीत का परचम लहराया था.

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सीट के सियासी समीकरण

साल 2016 के विधानसभा चुनाव में मालदा जिले की 12 सीटों में से ममता बनर्जी की पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी थी. गनी खान के भाई नासेर खान को उनके भतीजे ईशा खान चौधरी ने सीपीएम उम्मीदवार के तौर पर उतरकर मात दी थी. लेकिन वो बाद में टीएमसी में शामिल हो गए. मालदा की 12 सीटों में से 9 सीटें कांग्रेस, 2 सीटें सीपीएम और एक सीट बीजेपी ने जीती थी.

नरेंद्र मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनाव बंगाल की रैली में बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस भेजने की बात कही थी. अब एनआरसी ड्राफ्ट आने के बाद असम के साथ-साथ बंगाल में भी अवैध बांग्लादेशियों का मुद्दा उठने लगा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह इस मुद्दे को जोर-शोर से उठा रहे हैं.

बीजेपी ममता बनर्जी पर लगातार मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप लगाकर इस इलाके में अपना आधार को बढ़ाने में जुटी है. 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को मालदा की दोनों लोकसभा सीटों पर बेहतर नतीजे की उम्मीद नजर आ रही है.

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