ढाई दशक से गुजरात की सत्ता में बीजेपी, लेकिन इन 8 सीटों पर कभी नहीं खिला सकी कमल

गुजरात विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मी तेज है. बीजेपी अपने जीत के सिलसिले को बरकरार रखने की कवायद में है तो कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए बेचैन है. गुजरात में बीजेपी भले ही 27 सालों से काबिज हो, लेकिन आठ विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां पर आजतक कमल नहीं खिल सका है. ऐसे में बीजेपी के लिए यह सीटें चुनौती बनी हुई हैं.

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गुजरात में नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल गुजरात में नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल

गोपी घांघर

  • अहमदाबाद,
  • 28 अक्टूबर 2022,
  • अपडेटेड 2:02 PM IST

गुजरात को बीजेपी का सबसे मजबूत गढ़ ही नहीं बल्कि सियासी प्रयोगशाला माना जाता है. यहां पिछले 27 साल से बीजेपी सत्ता में है. 2022 के चुनाव में बीजेपी अपनी जीत के सिलसिले को ऐसे ही जारी रखती है तो गुजरात में राज करने के मामले में कांग्रेस को पीछे छोड़ देगी. इसके बावजूद गुजरात की आठ सीटें ऐसी हैं, जहां पर बीजेपी का कमल आजतक नहीं खिला सकी है. ऐसे में देखना है कि बीजेपी इस बार क्या इन आठ सीटों पर जीत का परचम फहरा पाएगी? 

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गुजरात विधानसभा चुनाव का औपचारिक ऐलान भले ही न हुआ हो, लेकिन सियासी पारा गरम है. बीजेपी गुजरात की सत्ता को बरकरार रखने की कवायद में जुटी है और इस बार 182 सीटों में से 160 प्लस का टारगेट रखा है. ऐसे में बीजेपी के लिए गुजरात की आठ सीटें सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण हैं, जो बोरसद, झगडिया, आंकलाव, दाणीलीमडा, महुधा, गरबाडा और व्यारा विधानसभा हैं. यह सीटें ऐसी हैं, जहां पर बीजेपी के लिए जीत दर्ज करना लोहे के चने के चबाने जैसा है, क्योंकि आजादी के बाद से अभी तक इन सीटों पर उसे जीत नहीं मिल सकी. 

बता दें कि महाराष्ट्र से 1960 में अलग होकर अस्तित्व में आए गुजरात में साल 1992 में पहला चुनाव हुआ था. सूबे में कांग्रेस लंबे समय तक सत्ता में रही, लेकिन 1995 के चुनाव में बीजेपी ने जीत दर्ज कर आई तो गुजरात पार्टी के तमाम नए निर्णयों की प्रयोगशाला बन गया. 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से जरूर बीजेपी को चुनौती मिली, लेकिन अपनी सत्ता को बचाए रखने में सफल रही. 

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हालांकि, ढाई दशक में बीजेपी को पहली बार गुजरात में 100 सीटों से कम मिली थी. बीजेपी इस बार किसी तरह की कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती है, जिसके लिए उसका फोकस उन सीटों पर भी है जहां पर अभी तक खाता नहीं खोल सकी है. बीजेपी ने ऐसी आठ सीटों के लिए खास रणनीति बनाई है ताकि वहां पर कमल खिलाकर इतिहास बना सके. 

बोरसद सीट
गुजरात के आणंद जिले की बोरसद विधानसभा सीट पर बीजेपी कभी जीत दर्ज नहीं कर सकी. बोरसद सीट पर अब तक दो उपचुनाव को मिलाकर कुल 15 बार चुनाव हुए हैं. गुजरात बनने के बाद 1962 में इस सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार ने जीत दर्ज की थी, लेकिन उसके बाद से कांग्रेस का कब्जा है. मोदी लहर में भी भरतभाई सोलंकी कांग्रेस के टिकट पर तीन बार विधायक बने. मौजूदा समय में राजेंद्र सिंह परमार कांग्रेस के विधायक हैं. बीजेपी इस सीट पर कमल खिलने के लिए बेताब है. 

झगडिया सीट
गुजरात की झगडीया विधानसभा सीट पर 1962 से 2017 तक में 13 बार चुनाव हो चुके हैं. कांग्रेस, जनता दल, जेडीयू और बीटीपी के उम्मीदवारों ने जीत हासिल की थी, लेकिन बीजेपी आजतक कमल नहीं खिला सकी. झगडिया सीट पर पिछले 35 सालों से छोटू भाई वसावा जीत दर्ज कर रहे हैं. यह आदिवासी बहुल सीट मानी जाती है और छोटू वसावा आदिवासी समुदाय के बड़े नेता माने जाते हैं. छोटू भाई वसावा सात बार के विधायक हैं और 2017 में उन्होंने बीजेपी के रवजी वसावा को मात दी थी. 

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व्यारा विधानसभा 
गुजरात में व्यारा विधानसभा सीट कांग्रेस के लिए अपराजेय रही है. पिछले 60 सालों से गुजरात की व्यारा विधानसभा सीट पर कांग्रेस का कब्जा है. मोदी लहर के बावजूद बीजेपी यहां पर कांग्रेस को कभी मात नहीं दे सकी है. आदिवासी बाहुल्य व्यारा सीट पर अभी तक 14 बार चुनाव हुए और हर बार कांग्रेस को जीत मिली है. 2017 में कांग्रेस के गामीत पुनाभाई ढेडाभाई ने बीजेपी के चौधरी अरविंदभाई रूमसीभाई को मात दी थी.  

महुधा सीट
गुजरात की खेड़ा जिले की महुधा विधानसभा सीट पर आजतक बीजेपी कमल नहीं खिला सकी है. इस आदिवासी बहुल सीट पर 6 बार  कांग्रेस के नटवर सिंह ठाकोर विधायक रहे हैं. कांग्रेस ने 2017 के चुनाव में इंद्रजीत सिंह परमार के रूप में नया चेहरा उतार कर भी जीत दर्ज की थी और बीजेपी के भरत सिंह परमार उन्हें मात नहीं दे सके. इस बार बीजेपी इस सीट को हरहाल में जीतने की कवायद कर रही है. 

गरबाडा सीट
गरबाडा विधानसभा सीट गुजरातके दाहोद जिले में आती है. यह आदिवासी बहुल सीट सीट है, जहां पर बीजेपी को कभी भी जीत हासिल नहीं हुई है. बारिया चंद्रिकाबेन छगनभाई लगातार दो बार से कांग्रेस के विधायक हैं. 2017 में उन्होंने बीजेपी के भाभोर महेन्द्रभाई रमेशभाई को चुनावी मात दिया था. 

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दाणीलीमडा सीट
अहमदाबाद के शहरी इलाके में आने वाले दाणीलीमडा सीट पर बीजेपी इतिहास बदलने के लिए बेकरार है, लेकिन कांग्रेस किसी भी कीमत पर अपनी सीट गंवाना नहीं चाहती. दाणीलीमडा सीट पर साल 1975 से कांग्रेस का वर्चस्व है. साल 2017 में कांग्रेस के परमार शैलेष मनहरभाई ने बीजेपी वाघेला जीतेंद्र उमाकांत को करारी मात दी थी. इस बार बीजेपी इस सीट पर कमल खिलाने की हरसंभव कोशिश में जुटी है, लेकिन सियासी समीकरण के सहारे कांग्रेस अपना दबदबा कायम रखना चाहती है? 

आंकलाव सीट
आणंद जिले की अंकलाव सीट 2012 में सियासी वजूद में आई है जबकि इससे पहले बोरसद विधानसभा क्षेत्र के तहत आती थी. अंकलाव सीट कांग्रेस का गढ़ मानी जाती है. इस सीट पर कांग्रेस के प्रत्याशी लगातार जीत दर्ज कर रहे हैं. अभी अमित चावड़ा यहां के विधायक हैं. बीजेपी इस सीट पर कभी भी जीत नहीं सकी है. अमित चावड़ा एक बार फिर से चुनावी मैदान में किस्मत आजमाने के लिए उतरेंगे. 

बता दें कि गुजरात की जिन आठ सीटों पर बीजेपी कभी जीत नहीं सकी है, उसमें से ज्यादातर सीटें आदिवासी बहुल इलाके की हैं. आदिवासी समुदाय को कांग्रेस के परंपरागत मतदाता माना जाता है, जिसके चलते बीजेपी यहां पर खाता नहीं खोल सकी है. दानीलिमडा सीट है, जो अहमदाबाद के शहरी इलाके में आती है, लेकिन सियासी समीकरण बीजेपी के पक्ष में नहीं होने से उसी जीत मिल सकी है. ऐसे में देखना है कि 2022 के चुनाव में बीजेपी क्या इन आठ सीटों में से किसी पर कमल खिलाने में कामयाब रहती है? 

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