पंजाब में माकन-नटराजन और जाटव को कांग्रेस की कमान, क्या चन्नी-वाडिंग की खींचतान हो पाएगा समाधान?

पंजाब चुनाव से पहले कांग्रेस एक बड़े बदलाव की तैयारी शुरू कर दी है, जिसके लिए अजय माकन, मीनाक्षी नटराजन और भजनलाल जाटव को पर्यवेक्षक नियुक्त किया है. कांग्रेस की यह तिकड़ी पंजाब की सियासी मिजाज को समझेगी और संगठन में बदलाव की रूपरेखा तैयार करेगी.

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पंजाब के सियासी मिजाज की थाह लेगी राहुल गांधी की तिकड़ी (Photo-ITG) पंजाब के सियासी मिजाज की थाह लेगी राहुल गांधी की तिकड़ी (Photo-ITG)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 12 जून 2026,
  • अपडेटेड 10:55 AM IST

पंजाब में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए सियासी बिसात बिछाई जाने लगी है. कांग्रेस ने मिशन-2027 के मद्देनजर अजय माकन, मीनाक्षी नटराजन और भजन लाल जाटव को पंजाब का पर्यवेक्षक नियुक्त किया है. कांग्रेस के तीनों नेता पंजाब के सियासी मिजाज की थाह लेने के साथ-साथ कांग्रेस की स्थिति का भी आकलन करेंगे. 

कांग्रेस के सामने पंजाब में अपने खोए हुए सियासी आधार को वापस पाने के साथ-साथ'अपनों को संभालने' की है. पंजाब में गुटबाजी के चलते ही कांग्रेस को हाल ही में हुए नगर निकाय चुनाव में करारी मात खानी पड़ी है. 

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पंजाब में प्रदेश कांग्रेस के नेतृत्व को लेकर खींचतान चल रही है, जहां एक गुट मौजूदा  प्रदेश अध्यक्ष राजा वाडिंग की जगह पर पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को प्रदेश अध्यक्ष बनाने के जुगत में है तो दूसरा गुट इसका विरोध कर रहा है. कांग्रेस हाईकमान ने सूबे में पार्टी के अंदर चल रहे खींचतान को देखते हुए राहुल गांधी की करीबी नेताओं को पर्यवेक्षक बनाया है. 

पंजाब में कांग्रेस की अंतर्कलह
पंजाब पांच साल पहले तक कांग्रेस का मजबूत दुर्ग माना जाता रहा, लेकिन 2022 में आम आदमी पार्टी की प्रचंड लहर ने उसे सत्ता से बेदखल कर दिया था. दिल्ली की सत्ता से आम आदमी पार्टी के बाहर होने के बाद कांग्रेस को अपनी वापसी की उम्मीदें जागी थीं. पंजाब में आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसदों की बगावत ने कांग्रेस के हौसलों को बुलंद कर दिए थे, लेकिन नगर निकाय चुनावों के नतीजों ने कांग्रेस के सियासी घावों को एक बार फिर हरा कर दिया है.

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स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस के खराब प्रदर्शन के पीछे सियासी गुटबाजी एक अहम वजह रही. इस तरह पंजाब कांग्रेस की सबसे बड़ी दुश्मन कोई दूसरी पार्टी से नहीं, बल्कि उसकी अपनी पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी है. चरणजीत सिंह चन्नी, सुखपाल खैरा, प्रताप सिंह बाजवा और अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग जैसे बड़े नेताओं के मनमुटाव के चलते ही कांग्रेस का माहौल खराब हो गया. 

माकन के अगुवाई में नई टीम का गठन
कांग्रेस हाईकमान नहीं चाहता कि चुनाव से पहले यह विवाद और ज्यादा बढ़े. ऐसे में जल्द एक्शन लेने के लिए ही शीर्ष नेतृत्व ने अजय माकन के अगुवाई में नई गठन का फैसला लिया. पंजाब में सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष ही नहीं, बल्कि विधायक दल के नेता प्रताप सिंह बाजवा को बदलने पर भी विचार किया जा रहा है. आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस नेतृत्व कोई बड़ा फैसला लेने से पहले जमीनी हालात का आकलन करना चाहता है. 

कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने अजय माकन की अगुवाई में एक टीम गठित की है. माकन के साथ मीनाक्षी नटराजन और भजन लाल जाटव को पंजाब के राजनीतिक परिदृश्य का आकलन करने और रिपोर्ट देने के लिए पर्यवेक्षक नियुक्त किया है. माकन फिलहाल कांग्रेस के कोषाध्यक्ष, नटराजन पार्टी की तेलंगाना प्रभारी और जाटव राजस्थान के करौली-धौलपुर लोकसभा सदस्य हैं.

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पंजाब में बड़े बदलाव करेगी कांग्रेस
अजय माकन की अगुवाई में एक कमेटी गठित की गई है, जो पार्टी नेताओं से रायशुमारी कर अपनी रिपोर्ट हाईकमान को सौंपेगी. इसके आधार पर ही संगठन में संभावित बदलावों पर अंतिम निर्णय लिया जाएग. कांग्रेस नेतृत्व ने पिछले कुछ सप्ताह में पंजाब को लेकर दो बैठकें की हैं. पार्टी ने इस बात से भी इनकार किया है कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी के नेतृत्व में कोई बदलाव करने की है. 

पंजाब में कांग्रेस नए प्रदेश अध्यक्ष के साथ-साथ नेता विपक्ष भी बदलने के मूड में है. राहुल गांधी के करीबी माकन, नटराजन और जाटव पंजाब के सियासी मिजाज के साथ कांग्रेस के तैयारी और संगठन को लेकर रिपोर्ट तैयार करेगा, क्योंकि कांग्रेस पंजाब को लेकर किसी तरह का कोई रिस्क लेने के मूड में नहीं है. 

पंजाब को लेकर कांग्रेस नहीं ले रही रिस्क
पंजाब में कांग्रेस की सियासी जड़ें काफी गहरी हैं और जमीनी स्तर पर संगठन मजबूत है. पंजाब में शिरोमणि अकाली दल के लगातार कमजोर होने और AAP विरोधी वोटों का सबसे स्वाभाविक झुकाव कांग्रेस की तरफ हो सकता है. 2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पंजाब की 13 सीटों में से 7 संसदीय सीटों पर जीत दर्ज करने में कामयाब रही थी, जबकि सत्ता में होने के बावजूद आम आदमी पार्टी को केवल 3 सीटें मिली थीं. इससे माना जा रहा था कि कांग्रेस ने राज्य में अपनी पकड़ दोबारा मजबूत की है. 

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किसी भी राज्य में 5 साल बाद सत्ताधारी दल के खिलाफ कुछ नाराजगी स्वाभाविक होती है. कानून-व्यवस्था, ड्रग्स का मुद्दा और वादों को पूरा करने की गति को लेकर जो भी असंतोष पैदा होगा, उसका सीधा फायदा कांग्रेस को मिल सकता है, लेकिन कांग्रेस अपनी गुटबाजी के चलते इसे नहीं भुना सकी. निकाय चुनावों में 'AAP' को मिली एकतरफा जीत ने साबित कर दिया कि सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठाने में कांग्रेस पूरी तरह नाकाम रही है. 

पंजाब की राजनीति अब केवल दो पार्टियों तक सीमित नहीं है. अकाली दल (जो अपनी जमीन वापस पाने की कोशिश में है) और बीजेपी (जो शहरी इलाकों और हिंदू बहुल सीटों पर पैठ बढ़ा रही है) के कारण वोट शेयर का बिखराव कांग्रेस का खेल बिगाड़ सकता है. पंजाब में कांग्रेस भले ही आम आदमी पार्टी के सबसे बड़े और मजबूत विकल्प के रूप में खड़ी है, लेकिन कांग्रेस की आंतरिक गुटबाजी से सारे किए धरे पर पानी फिर रहा है. अगर कांग्रेस इन बुनियादी कमियों को दूर नहीं कर पाती, तो पंजाब का किला हमेशा के लिए हाथ से निकल सकता है.

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