झारखंड चुनाव में JMM के 'आदिवासी अस्मिता' दांव से कैसे निपटेगी BJP? 4 Points में समझिए

झारखंड में विधानसभा चुनाव की आहट के बीच सियासी सरगर्मियां बढ़ गई हैं. बीजेपी के सामने लोकसभा चुनाव में जेएमएम के आदिवासी अस्मिता वाले दांव से निपटने की चुनौती है. सीएम हेमंत की गिरफ्तारी को आदिवासी अस्मिता से जोड़ने की जेएमएम की रणनीति से बीजेपी कैसे निपटेगी?

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बाबू लाल मरांडी ने हेमंत सोरेन सरकार पर निशाना साधा बाबू लाल मरांडी ने हेमंत सोरेन सरकार पर निशाना साधा

बिकेश तिवारी

  • नई दिल्ली,
  • 14 अगस्त 2024,
  • अपडेटेड 5:16 PM IST

झारखंड के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी रवि कुमार का एक बयान आया है. के रवि कुमार ने कहा है कि विधानसभा चुनाव के लिए जिला स्तर पर तैयारियां पूरी की जा चुकी हैं. आयोग को इस संबंध में जानकारी दे दी गई है और जल्द की आयोग की टीम राज्य का दौरा करेगी. मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के इस बयान के बाद संभावनाएं जताई जा रही हैं कि सितंबर के पहले या दूसरे हफ्ते तक चुनाव आयोग झारखंड चुनाव के लिए कार्यक्रम का ऐलान कर सकता है.

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सत्ताधारी झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) सीएम सोरेन की गिरफ्तारी को मुद्दा बनाते हुए आदिवासी अस्मिता और विक्टिम कार्ड का लोकसभा चुनाव में सफल प्रयोग विधानसभा चुनाव में भी दोहराने की तैयारी में है. वहीं, लोकसभा चुनाव में आदिवासियों के लिए आरक्षित सभी पांच सीटें हारने के बाद अब भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) विधानसभा चुनाव में इससे निपटने के लिए अभी से ही तैयारियों में जुट गई है. जेएमएम की रणनीति को काउंटर करने के लिए बीजेपी का प्लान क्या है? आइए समझते हैं.

बड़े नेताओं को उम्मीदवार बनाने की तैयारी

बीजेपी राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की तर्ज पर बड़े नेताओं को विधानसभा चुनाव में टिकट दे सकती है. कहा तो ये भी जा रहा है कि प्रदेश प्रभारी लक्ष्मीकांत वाजपेयी, हिमंत बिस्वा सरमा और शिवराज सिंह चौहान के साथ ही प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी की बैठक हुई थी जिसमें इस बात पर सहमति भी बन चुकी है. पार्टी ने आदिवासी समाज से आने वाले नेताओं के साथ ही गैर आदिवासी समाज के प्रभावशाली नेताओं को चुनाव लड़ने के लिए तैयारी में जुट जाने का संकेत भी दे दिया है. पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, सुदर्शन भगत, समीर उरांव, सुनील सोरेन, अरुण उरांव, दिनेश उरांव, आशा लकड़ा, लुईस मरांडी, शिवशंकर उरांव, गीता कोड़ा, बड़कुंवर गागराई, ताला मरांडी के साथ ही सीता सोरेन को भी उम्मीदवार बनाए जाने की चर्चा है.

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सामूहिक नेतृत्व का फॉर्मूला

सत्ताधारी गठबंधन की ओर से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ही सीएम के लिए चेहरा होंगे लेकिन बीजेपी सीएम फेस घोषित करेगी, इसकी संभावनाएं नहीं है. पार्टी किसी नेता को सीएम फेस घोषित कर चुनाव मैदान में उतरने की बजाय कई राज्यों में आजमाए अपने सामूहिक नेतृत्व के फॉर्मूले को लेकर ही चुनाव में जाएगी. बड़े नेताओं को चुनाव लड़ाने, सीएम फेस घोषित नहीं करने से गुटबाजी पर लगाम लग जाती है और हर गुट अपने नेता को सीएम बनाए जाने की उम्मीद के साथ जीत के लिए मेहनत करता है. इससे आसपास की सीटों पर भी असर पड़ता है.

आदिवासी समाज से जुड़े मुद्दों को धार देने की तैयारी

संसद के हालिया मॉनसून सत्र के दौरान झारखंड की गोड्डा सीट से बीजेपी के सांसद निशिकांत दुबे ने आदिवासी सीटों के लिए बीजेपी के अभियान की टोन सेट कर दी थी. निशिकांत दुबे संसद में आदिवासी समाज की कुल आबादी में घटती भागीदारी, आदिवासी बाहुल्य इलाकों में बांग्लादेशी घुसपैठियों की समस्या और बदलती डेमोग्राफी को लेकर झारखंड की सरकार पर हमलावर नजर आए. बीजेपी ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा को सह प्रभारी बनाकर भी ये संकेत दे दिए थे कि चुनाव में घुसपैठ और बदलती डेमोग्राफी का मुद्दा वह जोरशोर से उठाएगी.

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AJSU से गठबंधन

आदिवासी वोटर्स के बीच अपनी सियासी जमीन मजबूत करने की कोशिश में जुटी बीजेपी ने चुनाव कार्यक्रम के ऐलान से पहले ही यह साफ कर दिया है कि पार्टी ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) के साथ गठबंधन कर चुनाव मैदान में जाएगी. हिमंत बिस्वा सरमा ने आजसू प्रमुख सुदेश महतो से मुलाकात के बाद इस बात का ऐलान कर दिया है. सुदेश महतो आदिवासी समाज से जुड़े मुद्दों को लेकर हेमंत सरकार के खिलाफ मुखर है. ऐसे में बीजेपी की रणनीति आदिवासी समाज के ही एक बड़े नेता और दल के जरिये जेएमएम को उसकी मजबूत आदिवासी पिच पर घेरने की है.

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आदिवासी वोट की ताकत कितनी

झारखंड की गिनती आदिवासी बाहुल्य राज्यों में होती है. सूबे की कुल आबादी में आदिवासी समाज की भागीदारी करीब 26 फीसदी है. 82 सदस्यों वाली झारखंड विधानसभा की 81 सीटों के लिए चुनाव होते हैं. सूबे की 28 विधानसभा सीटें आदिवासी समाज के लिए आरक्षित हैं. 2019 के झारखंड चुनाव की बात करें तो बीजेपी इन 28 में से महज दो सीटें ही जीत सकी थी. लोकसभा चुनाव में आदिवासी लैंड में खाली हाथ रही बीजेपी की ये रणनीति कितना कमल खिला पाती है, ये देखने वाली बात होगी.

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