तरुण सागर: जानें, कौन होते हैं दिगंबर जैन, कैसा होता है इनका जीवन?

जानें- दिगंबर जैन क्या होते हैं. किस तरह रहते हैं, क्या और कैसे खाते हैं?

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दिगंबर जैन मुनि तरुण सागर दिगंबर जैन मुनि तरुण सागर

प्रियंका शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 01 सितंबर 2018,
  • अपडेटेड 3:37 PM IST

दिगंबर जैन मुनि तरुण सागर का शनिवार को सुबह निधन हो गया. 51 साल की उम्र में उन्होंने अंतिम सांस ली. उन्हें पीलिया हुआ था. जैन मुनि अपने प्रवचनों के लेकर चर्चा में रहते थे. कई दिनों से वे पीलिया से जूझ रहे थे, जिसके चलते उन्हें काफी कमजोरी हो गई थी. बता दें, जैन मुनि ने इलाज कराने से भी इनकार कर दिया था.

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जैन मुनि तरुण सागर एक दिगंबर मुनि थे. एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था- मैं नग्न रहता हूं और दिगंबर अवस्था में रहता हूं. दुनिया को ये समझना जरूरी है कि दिगंबर मुनि आखिर होता क्या है?

जानें- कैसे होते हैं दिगंबर मुनि

जैन धर्म दो भागों में बंटा हुआ है. दिगंबर और श्वेतांबर. एक वो जो सफेद कपड़े पहनते हैं और वो जो निर्वस्त्र होते हैं. जो निर्वस्त्र होते हैं वह दिगंबर  है. कहा जाता है इस धर्म में लोगों को भोजन हाथ में ही लेकर करना होता है.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार जब दिगंबर मुनि बूढ़े हो जाते हैं और खड़े होकर भोजन नहीं कर पाते हैं तो इस अवस्था में ये लोग अन्न- जल का त्याग कर देते हैं. बता दें, इस धर्म में खाना खड़े होकर खाना इस धर्म की खासियत मानी जाती है. मान्यता ये भी है कि इस धर्म के लोग जमीन के नीचे उगने वाली सब्जियां नहीं खाते हैं ये केवल उन्हीं सब्जियों का सेवन करते हैं जो जमीन के ऊपर उगती है.

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कैसे रहते हैं दिगंबर मुनि

दिगंबर जैन मुनियों का मानना है कि उनके मन-जीवन में खोट नहीं इसलिए तन पर लंगोट नहीं है. उनका मानना है आम लोग कपड़े पहनते हैं लेकिन दिगबंर मुनि चारों दिशाओं के कपड़ों के रूप में पहन लेते हैं. उनका कहना है दुनिया में नग्नता से बेहतर कोई पोशाक नहीं है. वस्त्र तो विकारों को ढकने के लिए होते है. जो विकारों से परे है, ऐसे शिशु और मुनि को वस्त्रों की क्या जरूरत है.

कैसे होती है दिगंबर जैन मुनि की दीक्षा

दिगंबर जैन मुनि दीक्षा के लिए वस्त्रों का पूर्ण त्याग, दिन में एक ही बार शुद्ध जल और भोजन का सेवन, सर्दी में भी ओढ़ने-बिछाने के कपड़ों का त्याग का पालन किया जाता है. जैन धर्म में दीक्षा का अर्थ है समस्त कामनाओं की समाप्ति और आत्मा को परमात्मा बनाने के मार्ग पर चलना.

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